एक फिल्म आई थी जिसमें एक पात्र थे दुग्गल साहब जिसका रोल कादर खान निभा रहे थे. दुग्गल साहब के ब्रेन में एक ब्लड क्लॉट था वो क्लॉट जहाँ घूम जाता दुग्गल साहब के शरीर का वो अंग काम ना करता और दुग्गल साहब कभी अंधे तो कभी बहरे बन जाते. इस सोशल मीडिया के युग में हर घटना हर खबर एक क्लॉट है जिसमें से कुछ खत्म हो जाते हैं तो कुछ घूम जाते हैं. इधर क्लॉट घूमा उधर सोशल मीडिया पर सब दुग्गल साहब बन जाते हैं.

Padmavati controversy

सोशल मीडिया के दुग्गल साहब अंधे और बहरे तो पहले से हैं इसलिए मौके-बेमौके हम लोग कभी अर्थशास्त्री तो कभी रक्षा विशेषज्ञ, कभी पर्यावरण विशेषज्ञ तो कभी वेदों के ज्ञाता बन जाते हैं. आजकल दुग्गल साहब इतिहासकार हैं और इस बार इतिहासकार बनाने वाले क्लॉट का नाम है पद्मावती.

मैं प्रायः उन मुद्दों पर लिखने से बचता हूँ जहाँ मेरी समझ ज्यादा नहीं इसलिए अर्थशास्त्र और उसके बाद मैनेजमेंट का विद्यार्थी होने के नाते इतिहास से जुड़े इस मसले पर लिखने से बचता रहा पर एक गलत चीज का विरोध भर कर देने से जो बहस मित्रों से शुरू हुई उससे लगा कि वहां टुकड़ों में लिखने की बजाय सोचा एक साथ मामला यहाँ शेयर करूँ.

सबसे बड़ा जो मुद्दा निकला वो था इतिहास से छेड़छाड़ का. अब इस पर गुस्सा होना जायज है. अब लड़की से छेड़छाड़ तो की जा सकती है पर इतिहास से कैसे? वो भी उस इतिहास से जिसकी क्लास में हम में से अधिकतर सोते रहते थे. मैंने जब पहली बार पद्मावती से सम्बंधित तब पोस्ट किया था जब करणी सेना वालों ने दीपिका की नाक काटने की धमकी दी थी. मुझे दीपिका ऐसे ही ज्यादा पसंद नहीं फिर नाक-कटी हुई तो बिलकुल पसंद नहीं आएगी इसलिए पूछ डाला कि ऐसी कौन सी बहादुरी दिखा रहे हैं जिसमें औरत की नाक काटी जाती है? मैं एक गर्व से भरपूर राजपूत नहीं हूँ पर इतना जानता हूँ कि कितना भी असहमत हो जाऊं, मैं किसी महिला को ऐसा नहीं कह सकता.

एक अनजान राजपूत बंधू युद्ध पर जा रहे थे और रास्ता भटक कर मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर पहुँच गए और लिखे कि जब तुम मुजरा करते थे तब हम लड़ रहे थे. मैं इन्हें जानता नहीं पर मेरे दरवाजे पर लड़ाका राजपूत आया था और मैं वीरों का अपमान नहीं करता, सोशल मीडिया वीरों का तो बिलकुल भी नहीं. जो उम्र थी उस हिसाब से तो कारगिल के समय भी पालने में ही होंगे इसलिए मैंने सिर्फ इतना पूछ दिया कि भैया कौन सी जंग का रास्ता भटक के यहाँ आ गए. इतिहास की मुझे समझ नहीं पर थोड़ा बहुत जब मैं क्लास में जगा होता था तो सुना था कि कई मौकों पर ऐसे राजा लोग भटक गए थे. खैर कोई भी रास्ता भटक सकता है पर वीर को जीपीएस शायद मिल गया और मुझे जवाब देने की बजाय मैदान से भाग लिए. क्यों भागे ये मैं जानता हूँ पर वीर का पब्लिक में अपमान नहीं, कुछ मौकों पर वीरों को भाग जाना चाहिए. मेरे कई राजपूत मित्र नाराज़ हो गए हैं और मुझे भी पोस्ट हटा लेनी चाहिए थी पर मैंने पोस्ट इसलिए नहीं हटाई क्योंकि उसमें ऐसी कोई असभ्य भाषा नहीं जैसी ऊपर बताये वीर कर रहे थे. हाँ तर्कों से आप सहमत या असहमत तो हो सकते हैं और होना भी चाहिए.

मैं देश के बहुत से हिस्सों में नौकरी या पढाई के सिलसिले में रहा और करीब से सब जगह की संस्कृति देखी और लोगों को समझा. गौर फरमाएं कि मैंने लोगों को समझा उनकी जातियों को नहीं. हमारे देश में सबसे बड़ी दिक्कत है कि हम सामने वाले के सरनेम के आधार पर उसे मापने लगते हैं. मेरा सरनेम ऐसा है कि बहुत सी जातियों में पाया जाता है क्योंकि ये सरनेम काम के आधार पर दिया गया था पर लोगों ने इस जाति से जोड़ लिया. राजस्थान में पढ़ा और बढ़ा हूँ तो वहां भी राजपूत मित्र मुझे जाट समझ कर मुझसे पहले ही एक दूरी बनाते हैं. मीडिया और पब्लिशिंग में काम करता हूँ तो यहाँ लोग मुझे बंगाली समझ कर केमोन आचेन पूछ लेते हैं. कोई राजपूत समझ लेता है और मेरे अपने गृह राज्य में तो खैर लोग जानते ही हैं.

एक बार मेरी ही जाति के किसी ने आरक्षण की मांग पर कुछ लिखा और मैंने आरक्षण का विरोध किया और चट से जवाब आया कि तुम तो जाट हो तुम्हें तो आरक्षण मिल चुका है अब हमारा तो विरोध करोगे ही. तर्क का स्थान था ही नहीं क्योंकि सामने वाले ने मेरा तर्क नहीं, मेरा सरनेम पढ़ा. अपने इस सरनेम की वजह से मैंने कई लोगों के व्यवहार को अलग-अलग रूप में देखा और अपने अनुभव के आधार पर सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि जैसे ही किसी की जाति उसके साथ जुड़ती है वैसे ही उसका विवेक फ्लाइट पकड़ के निकल लेता है और इसलिए मैं अब अक्सर हंसी मजाक वाले मुद्दे को छोड़ दें तो अपनी जाति किसी गंभीर चर्चा में बताने से कतराता हूँ. अपनी जाति मैं जान बूझकर यहाँ नहीं लिखना चाहता क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे लिखे को मेरी जाति से जोड़कर देखा जाये.

पद्मावती के मामले भी हम तर्क नहीं जाति और राजनैतिक विचार देख लड़ रहे हैं. एक मित्र ने कहा कि हम राजपूत कट्टर नहीं इसलिए तुम लिबरल लोग ये लिख पा रहे हो. मुझे कुछ मित्रों ने भक्त और संघी का तमगा दिया हुआ है और भक्तों ने लिबरल और सहिष्णु का. मैं इनमें से किसी भी केटेगरी में फिट नहीं होता. संघ की कई बातें पसंद हैं पर और 2019 में वोट भी मोदी को ही दूंगा, पर मैं संघी नहीं. लिबरल और सहिष्णु कतई नहीं पर किसी भी हाल में कट्टर और असहिष्णु भी नहीं हूँ.

दरअसल हम ऐसे समाज में है जहाँ हम चाहते हैं कि आप एक पक्ष में कूद जाएँ और उस पक्ष के सही गलत सबका समर्थन करें. हमें हर चीज ब्लैक एंड व्हाइट में ही देखनी है क्योंकि उस स्थिति में दिमाग का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता और सुविधा होती है. लेकिन ब्लैक एंड व्हाइट अक्सर एक दूसरे में मिलते हैं और ग्रे बनता है. यही ग्रे सच्चाई है. मैं इसी ग्रे हिस्से में रहता हूँ. उदाहरण देना चाहूँगा. हिन्दू हूँ और गाय को हम पूजते हैं और मैं मानता हूँ कि गोहत्या बंद हो. ये पूरा ब्लैक एंड व्हाइट है. अब कुछ लोगों ने मेरी भावना का सहारा लेकर गोरक्षा का धंधा शुरू किया और किसी की हत्या कर दी. मैं इंसान हूँ और धर्म के नाम पर इंसान की हत्या को स्वीकार नहीं कर सकता. मैं मेरे धर्म के नाम पर, मेरे नाम पर, किसी और को इसलिए राजनीती नहीं करने दे सकता क्योंकि मैं गाय को पूजता हूँ. यहाँ पर एक गाय को पूजने वाला हिन्दू गोरक्षा के नाम पर हत्या करने वाले का विरोध करता है और ये परिस्थिति ब्लैक एंड व्हाइट नहीं है, ये ग्रे एरिया है जो हम समझ नहीं पाते और रियेक्ट करते हैं.

पद्मावती वाले मसले में भी मैं उसी ग्रे एरिया में हूँ और अपने राजपूत मित्रों से सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ  कि इस मुद्दे को सबसे पहले अपनी जाति से हटाकर देखें. आपको पूरा हक़ है फिल्म पद्मावती के विरोध करने का पर वो विरोध तार्किक होना चाहिए. किसी ने भी अभी तक फिल्म नहीं देखी है और सुनी सुनाई बातों पर रियेक्ट कर रहे हैं. ये तय करिए कि विरोध जाति की वजह से कर रहे हैं या तथ्यों पर. दूसरी और महत्वपूर्ण बात किसी को अपने नाम पर राजनीती तो न करने दीजिये. जब हम किसी संगठन की गलत बातों का विरोध इसलिए नहीं करते क्योंकि वो अपनी जाति का है या किसी ऐसे मुद्दे पर बोल रहा है जिससे हम सहमत हैं तो हम उस संगठन को जाने-अनजाने हमारा प्रतिनिधि बना देते हैं. ये स्थिति किसी भी समाज के लिए खतरनाक है. यदि आप इनका विरोध नहीं करेंगे तो वही होगा जो होता आया है, लोग आपके सरनेम से आपको आंकेंगे और आपके बारे में वही सच मानने लगेंगे जो इन तथाकथित समाज के ठेकेदारों ने बना दिया है.

यदि मैं गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी करने वाले आदमी का विरोध नहीं करता तो कल को वो मेरे धर्म का ठेकेदार बन जायेगा जो मुझे स्वीकार नहीं. राजपूत भी ऐसे ही एक संगठन की (उनके हिसाब से) सही मामले पर गलत चीज का समर्थन देंगे तो धीरे-धीरे वो संगठन समाज का चेहरा बन जायेगा उसी तरह जिस तरह आतंकवाद इस्लाम का चेहरा बन गया है. और मैं जानता आप ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं कर पाएंगे.

इन परिस्थितियों के चलते इस बहस में वो मुद्दा गायब हो गया जो मैंने उठाया था और मामला राजपूत अस्मिता का बन गया. भैया, विरोध करो अगर फिल्म गलत है तो पर याद रखो इतनी हल्का इतिहास नहीं तुम्हारा कि तुम एक एक्ट्रेस की नाक काट कर वीरता दिखाओ. पद्मावती सही है या गलत मुझे नहीं पता पर किसी महिला के लिए अपशब्द कहना गलत है ये मैं जानता हूँ और अगर आप उसका समर्थन करेंगे तो माफ़ी चाहूँगा दोस्त, आपके इतिहास और वीरता का सम्मान आप अपने हाथों से ख़त्म कर रहे हैं.  बस आज इतना ही. जय हिन्द.

 

पद्मावती: दुग्गल जी आज इतिहासकार हैं

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3 thoughts on “पद्मावती: दुग्गल जी आज इतिहासकार हैं

  1. बहुत हि खूबशुरती से पक्ष व विपक्ष दोनों का मत व्यक्त किया अति पर्सन्निय अभिव्यक्ति
    1.दरअसल हम ऐसे समाज में है जहाँ हम चाहते हैं कि आप एक पक्ष में कूद जाएँ और उस पक्ष के सही गलत सबका समर्थन करें.
    2.मैं इंसान हूँ और धर्म के नाम पर इंसान की हत्या को स्वीकार नहीं कर सकता.

  2. चौधरी साब मैं भी यही बात करता हूँ तो लोग समझते हैं कि मैं संघी हूँ या कांग्रेसी लेकिन इस बात को मानने के किये तैयार ही नही कि ग्रे एरिया भी होता है और आप किसी आदमी संगठन या मुद्दे पर सहमत हैं तो उसमें भी कुछ बातें आप नही मानते और अगर बोलते हैं तो आप दुश्मन नही हो जाते बल्कि अपनी बात कहने के अधिकार का उपयोग कर रहे हैं। राजनितिक पार्टियों की सभी बातों से अगर सहमत हो जाएं तो आप एक अच्छे वोटर बन सकते हैं लेकिन नही मानने पर आप सिर्फ विरोधी नही हो गए हैं। सिर्फ जाति और प्रदेश या धर्म के नाम पर देश के असली मुद्दों को किनारे करके आप तरक्की नही कर सकते।

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