#MeToo & by both genders

 

मैं शर्मा सर के घर इंग्लिश की ट्यूशन के लिए 5 से 6 बजे के बैच में जाता और वो 6 से 7 बजे के बैच में। बड़ी मेहनत से उसे गर्लफ्रेंड बनाया। ‘बड़ी मेहनत से’ इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं केंद्रीय विद्यालय का था और वो महारानी गायत्री देवी (MGD) स्कूल की। जयपुर के रहने वाले लड़के जानते हैं MGD स्कूल क्या चीज है और बाहर वाले ये समझ लें कि ‘जो जीता वही सिकंदर’ फिल्म में जो फर्क आमिर खान के स्कूल और पूजा बेदी के स्कूल में था वही फर्क जयपुर में केंद्रीय विद्यालय और MGD में है ।  

ट्यूशन पढ़ने के बाद मैं सर के घर के कोने पर एक पेड़ के सहारे अपनी साइकिल लगा कर उसका इंतज़ार करता। 7 बजे वो निकलती और अपनी लूना पर बैठ कर चल देती। मैं भी अपनी साइकिल की पैडल पर पैर मारता और उसके पीछे चल देता। कुछ दूर जाके वो लूना धीरे करती और मैं उसके बगल में आ जाता। वहां से हम बातें करते हुए उसके घर की गली के बाहर तक जाते और फिर मुस्कुरा के एक दूसरे को बाय बोलकर अपने-अपने घर को निकल जाते।

एक दिन इसी तरह मैं पेड़ से पीठ टिकाये कोने में खड़ा उसका इंतज़ार कर रहा था। एक 65 – 70 साल का आदमी हिलता डुलता हुआ आया और मेरे से चिपकता हुआ आगे बढ़ गया। मुझे लगा कि उसने मेरे गुप्तांग को छुआ है। वो हिलता-डुलता आया था और बूढा था तो मुझे लगा कि गलती से टकरा गया होगा। वैसे भी 6:50 हो चुके थे और उसका बैच छूटने वाला था इसलिए मेरे पास इस सब पर ध्यान देने को वक़्त भी नहीं था।

मैं कोने से झांक कर देख रहा था कि वो निकली या नहीं कि मेरे कंधे से कोई टकराया और उसका हाथ मेरी कमर पर। मैं घूमा तो वही बूढा मेरे से लगभग चिपका खड़ा था। मेरे मुड़ते ही वो फिर हिलता डुलता आगे बढ़ा और उसके आगे बढ़ने के साथ उसका हाथ इस बार मेरे गुप्तांग पर थोड़ा ज्यादा घूमा। मेरे शरीर में सिहरन दौड़ उठी पर बूढा आगे बढ़ चुका था। एक मिनट भी नहीं गुजरा कि वो बूढा फिर से हिलता डुलता आया। इस बार उसका छूना मैंने अच्छे से महसूस किया था इसलिए उसे आते देख मैं सतर्क हो गया। वो बूढा फिर मेरे करीब आया और उसने पेंट के ऊपर हाथ फिराया और मेरा दिमाग सुन्न। नैनोसेकन्ड भर में उसने मेरे गुप्तांग को पकड़ लिया। मैं एकदम भन्ना उठा और मैंने उस बूढ़े को कंधे से पकड़ कर धक्का दिया और वो सड़क पर गिर पड़ा।  मुझे गुस्से आया और मैं उसे मारने आगे बढ़ा। इधर वो गिरा और उधर बैच के बच्चे बाहर आ चुके थे। बूढ़े ने मुझे आते देखा और दूसरी तरफ बच्चों को। वो सड़क पर लेटे-लेटे ही मुझे देख चिल्लाने लगा – “मार डाल्यो रे, म्हने मार डाल्यो।”

उसका चिल्लाना सुन कर बैच के लड़के उसे उठाने आ गए। सड़क से गुजर रहे एक दो लोग भी रुक गए। मैं चुपचाप अपनी साइकिल उठा कर निकलने ही लगा पर लोगों ने मुझे रोक लिया और पूछा कि क्यों मार रहा हूँ इस बूढ़े आदमी को? मैं क्या कहता? मैं कुछ कहने की स्थिति में नहीं था। उस बूढ़े के चेहरे पर अपनी हरकत पर पछतावा नहीं था पर मेरे लिए ये बताना शर्मिंदगी का विषय था कि उसने मुझे किस गन्दी तरह से छुआ। मैं बच्चा नहीं था 16 – 17 साल का था, अपनी बात कह सकता था पर कह नहीं पाया। कुछ था भीतर जो मुझे बोलने नहीं दे रहा था।

इस कोलाहल से एक-दो घरों के लोग भी निकल आये और मैं चारों तरफ से घिर गया। मैंने झिझकते हुए सिर्फ इतना कहा कि मेरे से बार-बार टकरा रहा था। ये सुन कर लोगों ने जवाब दिया – “इतना बूढा आदमी है, गलती से टकरा गया होगा। शर्म नहीं आयी धक्का मारते हुए। टक्कर लग भी गयी तो घिस गए क्या तुम?” उसकी गलती के लिए मैं शर्मिंदा किया जा रहा था। पर इतना काफी नहीं था, वहां रहने वाले एक आदमी ने मुझे देखा और कहा – “ये… ये तो लफंगा है, रोज यहाँ खड़ा लड़की का इंतज़ार करता है और फिर उसके पीछे-पीछे साइकिल पर जाता है।”

जी हाँ, मैं जो थोड़ी देर पहले एक ठरकी की ठरक का शिकार था वो अब लफंगा घोषित किया चुका था। ऐसे मसलों में शिकायत करने वाले का चरित्र हनन लड़की या लड़का देख कर नहीं किया जाता बल्कि ये देख कर किया जाता है कि शिकायत करने वाला कौन है? उसकी उम्र क्या है? उसकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति क्या है?  वो क्या करता है? क्या खाता है? क्या पहनता है? एक और इज्जतदार व्यक्ति ने मेरी उम्र के सारे लड़कों को लुच्चा घोषित करते हुए कहा – “आजकल के इन लौंडों में तमीज कहाँ? बड़े बुजुर्गों की इज्जत करने की जगह धक्का-मुक्की करते हैं।”

गहमा-गहमी बढ़ गयी और किसी ने शर्मा सर को बता दिया। वो भी बाहर आ गए और मुझे वहां से छुड़ा कर घर भेजा। वो वहीं खड़ी थी। उन इज्जतदार लोगों ने उसे भी घूरा और उसके बैच वालों ने भी। बस किसी ने कुछ सीधे-सीधे कहा नहीं उसे। वो चुपचाप अपनी लूना स्टार्ट करके चली गयी और ३ दिन बाद ही ट्यूशन पर वापस आयी।

शर्मा सर ने मेरा बैच बदल दिया और पापा को भी घटना बताई। उनका फोकस मेरे और बूढ़े आदमी के बीच हुई झड़प से ज्यादा ये बताने में था कि मैं  उस लड़की के लिए चक्कर काटता हूँ। उस लड़की ने भी उस दिन के बाद कभी मुझसे बात नहीं की क्योंकि उस दिन के बाद से उसका भाई उसे लेने और छोड़ने के लिए आने लगा। किसी ने मुझसे ये पूछने की जहमत नहीं उठाई और ना ही किसी ने ये समझने की कोशिश की एक नरम मिजाज का हंसमुख लड़का जिसका कोई बदतमीजी करने का रिकॉर्ड नहीं उसने एक बूढ़े को इस तरह धक्का क्यों मारा।

मैं सिर्फ शर्मिंदा हुआ हर जगह, पर किसी को बता नहीं पाया कि उस बूढ़े ने मेरे साथ क्या किया और मैंने क्या महसूस किया। पापा या शर्मा सर को बताना छोड़िये, मैं तो अपने जिगरी दोस्तों को भी नहीं बता सकता था क्योंकि उसके बाद वो मेरा मजाक उड़ाते। मुझे आज भी दुःख है कि मैंने उस समय किसी को इस बारे में नहीं कहा।

आज इतने सालों के बाद इस घटना का जिक्र कर रहा हूँ क्योंकि बहुत सी महिला मित्रों के #MeToo वाले अपडेट देख कर काफी बुरा लगा, इसलिए नहीं कि हम नहीं जानते कि ऐसा होता है और होता ही रहता है साथ ऐसा हुआ, बल्कि इसलिए कि हमारे करीबियों को तकलीफ थी तो न हम देख सुन सके और न कभी उन्होंने हम पर इतना भरोसा किया कि हमें वो बेझिझक ये सब बता सकें। आज जब सुन रहे हैं तो सोशल मीडिया पर। हम सबको हमेशा डर था कि जिम्मेदार हमें ही ठहराया जायेगा या मजाक उड़ाया जायेगा।

पर मेरी बात यहाँ ख़त्म नहीं हो रही। यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment) के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए जो Me Too का कैंपेन चलाया गया वो ट्रेंड बन गया और जब सोशल मीडिया पर कोई ट्रेंड चलता है ना तो फलाना-वाद, ढिकाना-वाद वाले उस बहती गंगा में हाथ धोने को कूद पड़ते हैं और कब हाथ धोते-धोते अपना पिछवाड़ा धो लेते हैं पता नहीं चलता।  ये फलाना-वाद, ढिकाना-वाद वाले अपने एजेंडा के चक्कर में असली मुद्दे को छोड़ उसे कुछ और रंग दे देते हैं। मैं इस बारे में कुछ और कहूं उससे पहले एक और आपबीती का जिक्र यहाँ करना चाहूंगा जो इसी साल मैंने झेला। इस बार ये ये उत्पीड़न सीधे तौर पर यौन उत्पीड़न तो नहीं था पर स्टाकिंग थी। जो मानसिक पीड़ा मैंने झेली है उसे बयान करना मुश्किल है।  

#MeToo stories

इसी साल फरवरी के महीने में यूनिवर्सिटी के दिनों की एक क्लासमेट फेसबुक पर टकराई। कई सालों तक उसकी कोई खबर न थी तो अचानक यूँ मिलने पर मैसेंजर के जरिये बातों का सिलसिला चल पड़ा और पुराने दिनों और साथियों को याद किया गया। उन्हें याद करके थोड़ी चुगली की गयी, थोड़ा हंसा गया और उन ‘लल्लू टाइप’ बच्चों के बहुत अच्छी पोस्ट पर पहुँच जाने पर आश्चर्य भी जताया गया।  

दो दिन ऐसे टुकड़ों में बात करते गुजरे।  तीसरे दिन से मुझे फेसबुक पर रोज के 300 से ज्यादा नोटिफिकेशन आने लगे जिसमें उसने मेरी पोस्ट या फोटो को लाइक किया था या कमेंट किया था। थोड़ा अजीब था पर शुरू में उतना नहीं लगा। दिन में वो मेरे पोस्ट और फोटो लाइक करती और शाम को व्हाट्स एप्प पर मेरे लिखने की और मेरी फोटोग्राफी की तारीफ करती। अगर मेरा लिखा कुछ समझ नहीं आता उस विषय के बारे में पूछती। हफ्ते भर के अंदर ही स्थिति ये थी हर 15-20 मिनट में उसका मैसेज आया होता चाहे फेसबुक पर या व्हाट्स एप्प पर। मेरे लिए इसे झेलना थोड़ा मुश्किल हुआ और मैंने उसे इग्नोर करना शुरू किया पर ये तरकीब काम नहीं कर पायी क्योंकि अगर मैंने उसे जवाब नहीं दिया तो वो कॉल करती। अगर कॉल नहीं उठाया तो तब तक कॉल करती जब तक मैं उठा नहीं लेता।

मैं यूनिवर्सिटी के दिनों में फंक्शन में गाना गा लेता था, उसे वो याद था। उसने रोज मुझे गाने व्हाट्स एप्प पर भेजने शुरू किये और पूछने लगी कि कैसा लगा। मैं व्हाट्स एप्प पर आयी फोटो भी नहीं देखता तो 5 मिनट का गाना सुनना तो संभव ही नहीं था। जब उसे पता लगा कि मैं उसके भेजे गाने नहीं सुनता तो फ़ोन करके मुझपर गुस्सा होने लगी और कहा – “इतना चुन-चुन कर गाने डाउनलोड करके भेजती हूँ कि तुम्हें पसंद आये और तुम…” मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या कहूं।  

ये सब अब असहनीय था। मैं स्वभाव से सौम्य हूँ और अक्सर लोगों को रूखा बोलने से कतराता हूँ पर यहाँ पर मुझे वो रुख अख्तियार करना पड़ा। मैंने उसे समझाया कि ये सब ज्यादा हो रहा है और ठीक नहीं है। उसने पलट कर मुझसे पूछा – “मैं दोस्त हूँ, तुमसे बात करना चाहती हूँ, इसमें क्या गलत है? तुम्हें कोई प्रपोज किया क्या मैंने? तुम्हें रिलेशन बनाने को बोला क्या? तुम्हें अपनी बीवी को छोड़ने को बोला क्या? सिर्फ बात करने को ही तो कहती हूँ।” उसको मैंने समझाया कि मेरे और भी दोस्त हैं और तुमसे ज्यादा अच्छे और पुराने दोस्त हैं पर मैं किसी से इतनी बात नहीं करता और ना ही मेरे पास और उनके पास इतना समय है कि दिन में घंटों बात करते रहें।

मेरी बात सुन उसने कसम खाई कि वो तब तक मुझसे बात नहीं करेगी जब तक मैं उसे फ़ोन नहीं करूँगा। मैंने राहत की सांस ली पर उसकी कसम नेताजी के वादे से भी कम टाइम तक टिकी। उसने अगले दिन मुझे एक फोटो कोलाज़ भेजा जिसमें फेसबुक से डाउनलोड करके मेरी फोटो को उसने अपनी फोटो के साथ लगाकर भेजा। मेरी जिस तस्वीर में मेरी बीवी या बेटा साथ में थे उन्हें क्रॉप कर दिया। मैंने ध्यान दिया कि उसने मेरी कोई ऐसी फोटो लाइक नहीं की है जिसमें मेरी बीवी या बेटा साथ में हैं। मैंने हर जगह से उसे ब्लॉक किया तो उसने मेरे ऑफिस का नंबर ढूंढ कर मुझे ऑफिस में फ़ोन करना शुरू किया और धमकाया कि मेरी हिम्मत कैसे हुई उसे ब्लॉक करने की।

मैं एक अजीब सी स्थिति में फंस गया था। एक पुरानी क्लासमेट से अच्छे से बात करना इतना भारी हो सकता था मैंने सोचा नहीं था। ऑफिस का प्रेशर और ऊपर से ये सब। मैं रात को फ़ोन स्विच ऑफ नहीं करता पर उन दिनों करने लगा। इतना ज्यादा मैं परेशान हुआ कि रात को ठीक से सो नहीं पाता और अगली सुबह बिन पिए सिर भारी रहता। मैं अपनी इस दिक्कत से कैसे निकलूं ये समझ नहीं आ रहा था। आप कोई कदम उठायें तो यहाँ पर आप दोषी माने जायेंगे क्योंकि समाज का एक हिस्सा तो पुरुष को लम्पट घोषित करने पर तुला है और मेरे जैसे हर किसी से खुल के मजाक करने वाले आदमी पर ऐसा इल्जाम लगाना काफी सुविधाजनक भी था।  

खैर कहानी और लम्बी है पर उसे यहीं रोकते हैं। खास बात ये है कि इस बार मैं चुप नहीं रहा और मैंने अपने दोस्तों से बात की और सबकी सलाह से कुछ कदम उठाये जिसने मुझे उस डेढ़ महीने के ट्रॉमा से बाहर निकाला।

इस वाकये को बताने से पहले मैं बात कर रहा था फलाना-वाद, ढिकाना-वाद वालों की। ट्रेंड बहती नदी की तरह होता है जिसमें फलाना-वाद, ढिकाना-वाद वाले जब घुसते हैं तो नदी में जमा कचरे की तरह एक रूकावट बन कर उस नदी की धारा को किसी और तरफ मोड़ देते हैं। नदी से रास्ता बदल कर निकली धारा अक्सर नाला बन कर रह जाती है और यहाँ भी ऐसा ही हो रहा है। यौन उत्पीड़न के खिलाफ शुरू हुए सोशल मीडिया के इस आंदोलन को इन फलाना/ढिकाना वाद वालों ने धीरे-धीरे पुरुषों को कोसने वाला आंदोलन बनाने की कोशिश शुरू कर दी हैं। अंततः परिणाम वही होगा जो होता आया है।

मेरे एक मित्र मोहित ने कल लिखा था – “बात सौ बातों की एक ये है कि हर चीज़ की तरह ये मेरे और आपके वॉल पे बहुत से पोस्ट्स के बीच एक पोस्ट बनके रहने वाला है। और इसी लिए इसे ‘trend’ कहते हैं। ये आया है… unfortunately, जाने के लिए। अंत गंभीर और sincere रखना ज़रूरी होता है।”

जी हाँ अंत को गंभीर रखना जरूरी होता है और उसके लिए जरूरी होता है सच का सामना करना और मुंह खोलना। हम जब तक समस्या को नारी पुरुष के नजर से देखते रहेंगे समस्या की जड़ में नहीं पहुंचेंगे क्योंकि न सारे पुरुष एक से होते हैं और न सारी महिलाएं। उत्पीड़न का शिकार जितनी महिलाएं होती हैं उससे शायद कुछ कम होते हों पर पुरुष भी यौन उत्पीड़न के शिकार होते हैं। दिक्कत ये है कि हम मुंह नहीं खोलते और समस्या पर हमला नहीं करते। जब मुंह  खोलते भी हैं तो एक दूसरे  पर इल्जाम लगाने को। महिलाएं जहाँ कभी-कभार सोशल मीडिया के जरिये इन मुद्दों को उठा लेती हैं वहीं पुरुष को समझ नहीं आता कि कहना क्या है? कहीं मुंह खोलने से उसी पर आरोप तो नहीं लगेंगे?

आज दिल किया कि सिर्फ अपने तक न रखूं और बोलूं।  Here I declare – #MeToo, and by both genders. जी हाँ उत्पीड़न का शिकार मैं भी हुआ और पुरुष और औरत दोनों के हाथों।  मैंने अपने साथ घटी दोनों घटनाओं से एक ही चीज सीखी कि बोलो, मत सोचो कोई क्या कहेगा। अगर तुम्हारे साथ कुछ गलत हो रहा है तो बोलो।  

 

#MeToo, and by both genders

Post navigation


3 thoughts on “#MeToo, and by both genders

  1. Well written Naveen, came here from my old friend Kishore’s Fb wall, here is my post on FB which has so many responses by men too as both abusers and abused, this isn’t about gender, its about power and silencing.

    https://www.facebook.com/psharmarao/posts/10215164120242272

    As you said above we do not ask the abuser to prove him/herself innocent but the abused to prove the other one guilty that’s such a huge burden, also this notion that all elderly are respectable is such a wrong perception and must be changed.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *