हे बुद्धिजीवी, बुरहान वाणी इज नॉट कश्मीर वाणी

 

Kashmiri Terrorist Burhan wani

जानते हैं कश्मीर और शर्मा जी के लौंडे में क्या कॉमन है? दोनों से आपका कोई खास लेना-देना नहीं पर जब भी वहां कुछ होता है डिस्टर्बेंस आपके घर में भी महसूस होती है. जब से होश संभाला है तब से ही कश्मीर में सिर्फ बवाल ही सुन रहा हूँ. कोई कवि कश्मीर के लिए बोले थे कि धरती पर स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है. आये दिन वहां कोई न कोई आतंकवादी जन्नत जाने को तैयार रहता है या वहां के लोगों और फौजियों को भेजना चाहता है. मुझे पक्का यकीन कवि महोदय का मतलब इस तरह के स्वर्ग से तो नहीं था. (आप समर्थक ‘बुदरुक’ ध्यान दें कि यहाँ कवि का मतलब कुमार विश्वास नहीं हैं. उन्हें ट्वीट पे बधाई मत देने लगना. 😛 दुनिया में और भी कवि पहले और बाद में हुए हैं जिन्होंने ‘अलग-अलग टाइप’ की कवितायेँ लिखी हैं)

इससे पहले कि कुछ और लिखूं, उन तमाम बुद्धिजीवियों और सेकुलरों को एडवांस में धन्यवाद् जो कहने वाले हैं कि अब ये ‘हिंदी वाले ब्लॉगर’ भी कश्मीर पे लिखेंगे.

दरअसल मुझे कश्मीर पे कुछ लिखना, कहना या समाधान नहीं देना है पर इन दिनों जिस तरह से सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया में बुद्धिजीवी हमें ये बताने में लगे हुए हैं कि ‘कश्मीर’ एक समस्या है जिसे भारत को छोड़ देना चाहिए या आज़ाद कर देना चाहिए उसे सुन के एक बार को तो लगता है कि बात तो सही है. रोज का बवाल होने से अच्छा मरने दो इसे, जाने दो. पर क्या ये वाकई सही है? ये बुद्धिजीवी जब भी कुछ कहते हैं न, मेरे कान खड़े हो जाते हैं और मेरे अंदर ACP प्रद्युम्न जग जाता है और मैं इन बुद्धिजीवियों पर शक करने लगता हूँ. इस शक को दूर करने के लिए मैंने अपने जैसे कुछ फुद्दुजीवियों से चर्चा करी और जो एक बात समझ में आई वो ये कि भाई तुम कश्मीर छोड़ दोगे पर कश्मीर तुम्हें नहीं छोड़ेगा.

इस बार कश्मीर का मुद्दा बुरहान वाणी के मरने के बाद उठा है. इस सबसे ताजा वाले बवाल में हजारों लोग उसके जनाजे में गए. कुछ बुद्धिजीवियों ने इस भीड़ का भी जिक्र करके भी कहा कि अगर बुरहान की मौत पर इतना जनसैलाब है तो कुछ बात तो जरूर है और इसी बहाने उन्होंने सरकार को, फौज को दोषी बना दिया. (सुना है कुछ ने ऐसा बोल के अपने NGO की फंडिंग पक्की कर ली). सर-देसाई जी तो बुरहान को भगत सिंह बना गए, ये अलग बात है कि इसके बाद उनके हिस्से में सिर्फ गालियाँ आई.

बुद्धिजीवियों की बात को सिर्फ ये कह के बंद करना चाहता हूँ कि Burhan Wani is not Kashmir Wani. इस बात को समझने के लिए ये कुछ पॉइंट हैं जो एक आम हिन्दुस्तानी की तरफ से लिख रहा हूँ और उम्मीद करता हूँ कि बुद्धिजीवी संज्ञान लेंगे. 😉

आजाद कश्मीर: ये वाला कंसेप्ट सुनने में मस्त है, पर क्या सही है? कश्मीर आजाद होना चाहता है या एक तबका वहां इस्लामिक राज्य स्थापित करना चाहता है? दी लल्लनटॉप पर बुरहान की माँ का बयान पढ़ा कि उनका दूसरा बेटा भी काफिरों से लड़ते हुए इस्लामी निजाम के लिए शहीद हुआ. जी हाँ, आप सही पढ़ रहे हैं. कश्मीर की आजादी का यही अर्थ है जिसे पाकिस्तान अपने मकसद के लिए हवा दे रहा है. आखिर ऐसी कौन सी आज़ादी है कश्मीर की, जिसमें कश्मीरी मूल के पंडितों की ही जगह नहीं? उन्हें पहले बाहर फेंका और अब आज़ादी की बात. हाँ मुझे पता है कि ज्ञानी लोग यहाँ इंदिरा गाँधी और 1990 कि कहानी लायेंगे पर उन सब के बावजूद क्रक्स यही है कि जिस कश्मीर को आजाद करने की बात कर रहे हैं उसी की आबादी के एक बड़े हिस्से को वहां से भगा रखा है. कश्मीर को वैसे भी धारा 370 के तहत विशेषाधिकार मिले हुए हैं, वो कम हैं क्या?

पाकिस्तानी आतंकवाद: एक बुद्धिजीवी ये कह दे कि एक बार हमने कश्मीर छोड़ा तो पाकिस्तानी आतंकवाद हिंदुस्तान में ख़तम हो जायेगा. कश्मीर दीजिये, फिर वो खालिस्तानियों को जगायेगा. क्या खालिस्तानी ये नहीं मानेंगे कि हिंसा से उन्हें भी अलग देश मिल जायेगा? क्या पाकिस्तान खालिस्तान के बाद और आगे पैर नहीं पसारेगा? अगर कह सकते हो नहीं तो जाने दो कश्मीर.

हिन्दू-मुस्लिम एकता: ये वैसे ही एक किताबी शब्द है हमारे यहाँ जो कभी भी एक अफवाह पर एकता के टुकड़े टुकड़े कर देता है. क्या एक भी बुद्धिजीवी ये कह सकता है कि अगर कश्मीर अलग हुआ तो उसका रिएक्शन देश भर में दंगे के रूप में नहीं होगा? जब कश्मीर आज़ाद नहीं तब ‘काफिरों’ को मार कर भगाया जा रहा है, जिस दिन आज़ाद हुआ उस दिन जो बचे-खुचे ‘काफ़िर’ हैं उनके साथ क्या सलूक होगा ये बताने की जरूरत नहीं. क्या आपको नहीं लगता कि उस परिस्थिति का रिएक्शन पूरे देश में होगा?

फौजी अत्याचार: ये एक बड़ी कहानी आती है कश्मीर से. क्या लगता है कि किसी फौजी को मजा आता है लोगों को मारने में? वो भी आपके हमारे जैसे इन्सान हैं, उन्हें भी वैसा ही फील होता होगा जैसा हमें होता है. जब बुद्धिजीवी किसी टीवी स्टूडियो में फौज को गरिया रहे होते हैं उस समय कोई आतंकी लैंड माईन बिछाकर, AK 47 से निशाना साधे कश्मीर को सच में ‘स्वर्ग’ बनाने की तैयारी कर रहा होता है. जिस आतंकवादी घटनाओं और आतंकियों को आप अख़बारों में पढ़ते हैं उनसे उनका रोज का सामना होता है. उनकी भी दिक्कतें हैं कि एक कश्मीरी आतंकी को पनाह दिए होता है. वो पकड़ें तो कैसे? गेहूं के साथ घुन तो पिसेगी ही साहब ऐसी परिस्थिति में.

और हाँ ये न भूलें कि इन पत्थर फेंकने वाले हाथों को पिछले साल डूबने से बचाने न गिलानी आया था, न भारत की बर्बादी वाले नारे और फेसबुक पोस्ट लिखने वाला उमर खालिद. उस समय यही फौजी थे जिन्होंने इन पत्थर फेंकने वाले कश्मीरियों को बचाया. फौजी का धर्म हिन्दू-मुस्लिम नहीं, देश होता है. उसने हमेशा अपना धर्म निभाते हुए देश और देशवासी को बचाया है चाहे वो आतंकी को गोली मारकर हो या बाढ़ से बचा कर.

कश्मीरी पैरोकार: ये कौन लोग है जो कश्मीर की आज़ादी के नेता बने हुए हैं? जो आये दिन भारत को कोसने और पाकिस्तान से समर्थन मांगते हैं? वही गिलानी जो दिल्ली में इलाज कराता है, वही उमर खालिद जो JNU में पढता है, लाहौर या इस्लामाबाद में पढने नहीं जाता. वही गिलानी जिसके बच्चे विदेशों में सेटल हैं पर आम कश्मीरियों के बच्चों को स्कूल में नहीं जाने देता.

हमारे देश में टूरिज्म से शहर के शहर बसे हैं और लोगों की आमदनी है पर कश्मीर सबसे खूबसूरत होकर भी टूरिज्म से महरूम है. गिलानी को फर्क नहीं पड़ता साहब, रोटी तो उस शिकारे वाले को नहीं मिलती जो डल झील में बैठा है.

हम आम हिन्दुस्तानियों को कश्मीर समझ आये न आये, उसका समाधान पता हो न हो पर ये पता है कि जिस दिन कश्मीर को खुल्ला छोड़ा वो सांड बन जायेगा और उसकी सींगो का शिकार सब होंगे.

अप्रिय बुद्धिजीवियों, आपको मालूम हो न हो पर आज दो ही तरह के कश्मीरी मुस्लिम खुशहाल जिन्दगी बिता रहे हैं:
पहले – जो कश्मीर छोड़कर नौकरी करने हिंदुस्तान के बाकी हिस्सों में जा पहुंचे.
दूसरे – जिन्होंने पत्थर फिकवाने का ठेका लिया हुआ है.

…बाकि बिचारे तो सिर्फ पत्थर फेंकने और आतंकियों के जनाजे में जाने को रह गए हैं.

इसलिए दिमाग खोलो और जोर से बोलो – जय हिन्द


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Burhan Wani is not Kashmir Wani

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One thought on “Burhan Wani is not Kashmir Wani

  1. सही कहते हो सर कश्मीर की आजादी कोई समाधान नहीं है लेकिन राष्ट्र”भक्तोँ” और बुद्धिजीवियों के बीच की भी एक केटेगरी होती है जिसमे शामिल हम जैसे देशद्रोही फुद्दुजीवियो को लगता है कि अगर झगड़ा बाप और बेटे में हो तो समाधान के लिए बाप को ही पहल करना पड़ेगा ना। बेटा अगर नादान हो तो क्या उसे घर से निकाल देते हैं या जान से मार देते हैं…

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