कन्हैया कुमार,  तुम कॉन्डोम न हो जाना

 

प्यारे कामरेड कन्हैया,

ये कोई ओपन लेटर टाइप नहीं है, पर वैसा सा ही समझ लो. तुम तक पहुंचे न पहुंचे, पर सोचे लिख लेते हैं. देखो, यूँ तो हम कोशिश करेंगे कि सिर्फ मुद्दे की बात लिखें पर व्यंग्य लिखने वाले आदमी है, दो-चार शब्द आ जाएँ तो इग्नोर कर देना. पर्सनल अटैक भी नहीं करना चाहूँगा तुम पर, पर अब बात निकलेगी और थोडा पर्सनल हो जाऊं तो ‘भूल चूक लेनी देनी’ समझ लेना. वैसे मैं जानता हूँ तुम मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करोगे.

JNU_Kumar_2761078gतुम तो हीरो बन गए हो, तुम्हें अब सब जानते हैं. कल तक कुछ चैनल तुम्हारे अंडरवियर का रंग भी बता देंगे. मेरे साथ ऐसा है नहीं तो मुझे आगे बढ़ने से पहले अपना इंट्रो खुद ही देना होगा. तुम में और मुझ में कुछ समानताएं हैं और असमान तो बहुत कुछ है. मैं भी तुम्हारी तरह बिहार के एक गरीब परिवार से आता हूँ जो मेहनत करके अब एक मुकाम पर है. मैं भी तुम्हारी तरह छात्र राजनीती में था, आज से 17 साल पहले यूनिवर्सिटी का चुनाव भी लड़ा था. फर्क इतना सा है कि जब मैं चुनाव लड़ा तब मैं वाकई स्टूडेंट था 21 साल का. मेरी यूनिवर्सिटी में छात्र नेता छात्र ही होता है (25 साल से नीचे), शादी या बाप बनने की उम्र में पीएचडी करने वाला नहीं. पीएचडी में भी एनरोल किया था, पर पूरा नहीं किया. अगर करता तो 25-26 साल की उम्र तक पूरी कर चूका होता, क्योंकि मेरे लिए मुफ्त कुछ नहीं था. तुम्हारी उम्र तक आते आते तो मैं महीने का 4000 टैक्स दे रहा था ताकि कहीं कोई नेता उस पैसे से घूस खा सके और कहीं कोई गरीब बच्चा फ़ेलोशिप पा सके.

खैर मुद्दे पर आते हैं. तुम तो यूँ ही कई दिनों से ख़बरों में हो पर कल से तुम्हारे छूटने के बाद मीडिया में हिस्टीरिया ऐसा फैला कि तुम्हारा भाषण न देख पाने का मुझे मलाल रहा. अब देखता कैसे, मुझे तो काम करके कमाना है ताकि टैक्स दे सकूँ और कुछ गरीब छात्रों की पढाई में मेरा भी योगदान हो. आज मौका मिला तो विडियो देखा. मजा आया, क्या मजा ले ले कर बोले, क्या चुटकी ली, क्या सरकार पर बरसे, कैसे तुमने बताया कि तुम्हारी गिरफ़्तारी इसलिए हुई कि देश से गरीबी न हटे, भुखमरी रह जाये, वेमुला से ध्यान हट जाये. सुना था कि तुम अपने भाषण की वजह से जीते थे इसलिए भी सुनने में इंटरेस्ट था पर तुम्हारा भाषण बिल्कुल सलमान की फिल्म की तरह निकला. उसमें मसाला तो बहुत था पर कंटेंट मिसिंग था जिससे पता चले कि जिन मुद्दों से तुम्हें आज़ादी चाहिए उन पर तुम्हारे पास आईडिया क्या है. पर कोई बात नहीं, जब अपने खर्चे पर नून तेल का इंतजाम करोगे तो ये आइडियाज भी आ जायेंगे.

जिस तरह सरकार जनता का ध्यान इधर उधर करके मुद्दे से ध्यान हटाती है वैसे ही तुम भी ये बात पूरी तरह उड़ा गए कि ये सारा मामला तुम्हारी विचारधारा का नहीं, देश विरोधी नारे लगाने का था. तुम्हारी बात मानता हूँ कि तुमने देश विरोधी नारे नहीं लगाये, पर ये भी पूरी तरह से सच है कि जिस सभा में ये सब हुआ वहां तुम थे और चूँकि तुमने भाषण भी दिया था तो तुम उस कार्यक्रम से जुड़े हुए भी थे. अध्यक्ष होने के नाते तुम्हारे पास ये क्षमता थी, औरों से कहीं ज्यादा कि तुम उन्हें रोक पाते पर तुमने ऐसा नहीं किया क्योंकि तुम उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा कर रहे थे. उस स्वतंत्रता की रक्षा करते टाइम तुम JNU के बाहर की जनता की भावनाओं को भूल गए जिन्हें पता भी नहीं कि कोई उनके टैक्स के पैसे पर ‘भारत की बर्बादी’ का गीत गा रहा है.

अपने भाषण में कहा की JNU की ABVP बाहर की ABVP से ज्यादा रैशनल है. यकीन मानो, ठीक इसी तरह JNU के बाहर की दुनिया JNU से ज्यादा रैशनल है. वो सब देखती और समझती है. उसने ये भी देखा कि कैसे देश विरोधी नारे लगे, कैसे सरकार ने इसका राजनीतिकरण किया, कैसे फर्जी ट्वीट पर बयान आया और कैसे देश विरोधी नारे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम दिया गया. कुछ नहीं छूटा, सब देखा. कल तुम्हारे छूटने के बाद सबने तुम्हें सुना भी, इसलिए नहीं कि तुम नए गाँधी हो, इसलिए कि हम ज्यादा रैशनल है और सबको सुनते हैं. कोर्ट ने माना है कि तुम प्राथमिक तौर पर दोषी नहीं दिखते, इसलिए आज शक होने के बावजूद तुम्हें निर्दोष मानते हैं, ना कि तुम्हारे साथियों की तरह कोर्ट को ही जुडिसियल किलिंग का दोषी मानते हैं.

तुमने कहा कि JNU के साथ लोग इसलिए खड़े हैं क्योंकि JNU सही को सही और गलत को गलत कहता है. मैं इंतज़ार करता रहा कि कब तुम कहोगे कि उमर खालिद और उसके साथियों के नारे गलत थे, पर तुम सरकार को गरीबी बढ़ाने के लिए कोसने में इतने व्यस्त थे कि भूल गए कि असली मुद्दा ही यही था. यूँ भी उमर खालिद के बारे में कहना आसान नहीं क्योंकि तुमने अगर साथ दिया तो झूठे साबित हो जाओगे, अगर कहा कि नारे उसने लगाये तो वो बयान हो जायेगा. अगर तुम वाकई भारत के खिलाफ उठने वाली आवाज़ के विरोध में हो तो इस तरह से सेफ क्यों खेलना? क्यों नहीं यहाँ पर भी खुलकर सामने आना? वैसे आज एक और इंटरव्यू में देखा कि तुम कोर्ट में मामला होने के नाम पर इसपर बोलने से साफ़ बच निकले, पर मेरे दोस्त आज जो तुमने कोर्ट के डंडे के बाद कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भी कुछ सीमायें है, काश वो 9 फरवरी को कह के खालिद को रोक लिया होता तो आज न मोदी, न स्मृति और न राहुल किसी को भी JNU के नाम पर राजनीती करने का मौका न मिलता.

आज तुमने ये भी कहा कि तुम्हें न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है, तो मेरे भाई ये भरोसा अफज़ल गुरु वाले फैसले पर क्यों नहीं? तुम उस सभा में थे और वहां भाषण भी दिया गया था जिसमें अफज़ल की सजा को जुडिसियल किलिंग कहा था. जिस डेमोक्रेसी की तुम बात कर रहे हो, जिस संसंद में लड़कर तुम हक़ मांगना चाहते हो, उसी संसद पर, उसी डेमोक्रेसी पर इस अफज़ल गुरु ने हमला किया था. आज तुमने कहा कि तुम अफज़ल को आदर्श नहीं मानते. तुम्हारे इस बयान में यूँ तो मुझे कोर्ट की फटकार का असर दिखा, पर फिर भी अच्छा लगा. हमारे लोगों पर हमला करना न तो डेमोक्रेसी है, न ही अभिव्यक्ति. ये मर्डर है, वैसा ही जैसा पश्चिम बंगाल में तुम्हारी विचारधारा के विरोधियों का होता आया है.

तुमने कहा कि सौ बार सूरज को चाँद कहने से वो चाँद तो नहीं हो जायेगा, वही चीज मैं भी तुमसे कहना चाहता हूँ. सौ बार भारत की बर्बादी जैसे नारे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहने से वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं हो जायेगा और न ही अफज़ल गुरु शहीद कहलायेगा. देश के रैशनल नागरिक के लिए ये दोनों बातें देशद्रोह ही हैं.

तुमने कहा कि देश में बहुत खतरनाक प्रवृति जन्म ले रही है. तुमने आधी बात कही, पूरा करना भूल गए, वो मैं कर देता हूँ. देश के खिलाफ नारे लगाना और फिर उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सही साबित करना एक खतरनाक प्रवृति है. अगर तब भी सही साबित न हो तो सरकार बनाम अभिव्यक्ति बनाना उससे भी ज्यादा खतरनाक. तुम और कुछ मीडिया वाले भी अभी यही कर रहे हो. तुम अब जब संविधान में आस्था जताने लगे हो और हीरो भी बन चुके हो तो कोशिश करना कि इस तरह की खतरनाक प्रवृत्तियों का तुम हर तरफ से विरोध करो. उनका भी करो जो विरोधी को पाकिस्तान भेजते हैं और उनका भी जो पाकिस्तान में कश्मीर मिलाना चाहते हैं.

तुमने कहा कि जेल में तुमने बहुत कुछ सीखा. मैंने आज तुम्हें सुना तो लगा वाकई जेल जाना तुम्हारे लिए अच्छा रहा, इसलिए नहीं कि तुम हीरो बन गए बल्कि इसलिए कि तुम्हे अब वो सब दिख रहा है, और तुम हर उस बात को बोल रहे हो जो अब तक मिसिंग थी. मुझे अच्छा लगा तुम्हारा डेमोक्रेसी में यकीन करना. करना भी चाहिए क्योंकि तुम जेल भेजे गए थे, वर्ना तुम जिस विचारधारा से आते हो उसमें इतिहास रहा है की जो विरोध करे उसे जेल में मत भेजो, जान से मार दो. बंगाल और केरल प्रत्यक्ष प्रमाण है. मुझे अच्छा लगा कि जेल से आने के बाद तुम्हें आज दिख रहा है की देश में कितनी भुखमरी और गरीबी है, कितने किसान मर रहे हैं. क्योंकि तुम पहले देख न पाए जिस विचारधारा के तहत तुम गरीबी हटाने के जनता की चुनी सरकार का विरोध कर रहे हो, उसी विचारधारा की सरकार के 30 साल तक होने के बावजूद पश्चिम बंगाल आज भी देश के उन राज्यों में है जहाँ सबसे ज्यादा गरीब लोग रहते हैं.

तुमने कहा कि भारत से नहीं, तुम भारत में आज़ादी मांग रहे हो. अरे भाई हमारे यहाँ तो इतनी आज़ादी है की आधा बांग्लादेश आजाद होकर यहीं घूम रहा है और कभी कभी पाकिस्तानी भी समुद्र के रस्ते मुंबई तक आ जाते हैं. भारत की बर्बादी के नारे लगाने वालों से हमें इसलिए परेशानी होती है क्योंकि समुद्र के रास्ते से जो मुंबई आते हैं उन्हें मदद ऐसे ही कुछ नारे लगाने वालों से मिलती है. अगर तुम्हें वाकई भारत में आज़ादी चाहिए तो सिर्फ गरीबी से ही नहीं, विचारधारा के नाम पर होने वाली हत्याओं से भी आज़ादी मांगो, मांगो आज़ादी वामपंथ या दक्षिणपंथ के नाम पर गरीबों के बेवकूफ बनाने से, मांगो आज़ादी जातिवादी आरक्षण से. वो मांगो जो हर आम आदमी को हक़ दिलाये न कि वो जो विचारधारा के आधार पर उल्लू बनाये. हर आदमी अपने तरीके से समाज के लिए काम करता हैं. मैं प्रोडक्टिविटी लाकर जीडीपी बढ़ाने में मदद करता हूँ, टैक्स देता हूँ. ये मेरा तरीका है, तुम अपनी पसंद का कोई और तरीका अपनाओ और दो समाज को अपनी तरफ से कुछ. लाओ ऐसा आईडिया जो सालों से कोई कामरेड नहीं लाया. अगर लाया होता तो तो आज भी दुनिया में इतने गरीब न होते और तुम्हारी विचारधारा के सबसे ज्यादा समर्थक होते. जो भी तरीका अपनाओ, जो भी आईडिया लाओ, भाई बस ये याद रखना कि भारत की बर्बादी के नारे से और नक्सलवाद से, न तो गरीबी हटेगी और न किसान का भला होगा.

मुझे पता है कि तुम्हें या तुम्हारे JNU के कई साथियों को मेरी लिखी बातें बकवास लगेंगी. लगनी भी चाहिए क्योंकि तुम इसे हमारे खरचे पर afford कर सकते हो. वैसे मुझे भी तुम्हारी ये वामपंथी विचारधारा समझ नहीं आती क्योंकि जिस जिस देश ने अपनाया डूब गया. इसमें प्रोडक्टिविटी है नहीं, और जब सत्ता आती है तो वो गरीब के लिए तुम नारे लगाते हो उसी को तुम बाकि पार्टियों की तरह भूल जाते हो. बिलकुल वैसे ही, जैसे तुमने कहा कि तुम अपनी ‘गरीब माँ’ से 3-3 महीने तक बात करना भूल जाते हो. वैसे तुम कैसे 3-3 महीने अपनी माँ से बात नहीं करते? जब तुम अपने गरीब परिवार का हाल तक नहीं पूछ पाए, तो जिन गरीबों के लिए तुम नारे लगाते हो उनको क्या पूछोगे? मुझे तो हर हफ्ते पापा को फ़ोन करके बोलना होता था – End money, send money क्योंकि हमारी सिर्फ फीस में सरकार का योगदान था. जैकेट का खर्च हमें खुद उठाना होता था क्योंकि वो किसी मेरे जैसे टैक्सपेयर की जेब से नहीं आता था.

Kanhaiya Kumar Speech in JNU
Red Condom & Saffron Condom greeting each other

ऊपर मैंने जो लिखा उसमें नया कुछ नहीं. तुम्हारी आइडियोलॉजी नई नहीं, देश में गरीबी नई बात नहीं. वामपन्थ ने दुनिया भर में बकैती के अलावा कुछ किया नहीं ये भी सबको पता है और तुम्हें भी. फिर ऐसा क्या है कि ये सब अलग-अलग पार्टी वाले राजनीतिज्ञ और मीडिया के एक सेक्शन जो तुम्हारी विचारधारा के उलट नीरा राडिया जैसों के साथ मिली रही है वो तुम्हें लेकर कल से बिछे पड़े हैं? ये सब तुम्हें लेकर  इतने आह्लादित इसलिए है क्योंकि कन्हैया कुमार, तुम कॉन्डोम हो. कॉन्डोम के दो काम होते हैं – पहला संक्रामक बीमारी रोकना, और दूसरा आती हुई प्रोडक्टिविटी को रोकना और प्रोडक्टिविटी रोकते हुए भी मजा देना. एक बार जब प्रोडक्टिविटी रुक गयी और मजा आ गया फिर वो कॉन्डोम को फेंक दिया जाता है. आज विपक्ष के पास कोई चेहरा नहीं जो किसी तरह सरकार का सकारात्मक विरोध कर सके. तुम एक टेम्पररी सोल्यूशन दिख रहे हो जो काम काज भी रुकवाएगा और मजा भी देगा.

तुमने कहा कि कुछ मीडिया वाले उधर से पाते हैं. तुम्हारी ये बात उतनी ही सच है जितनी ये कि कुछ मीडिया वाले इधर से भी पाते हैं. जो उधर से पाते हैं, वो तुम्हे गलत दिखायेंगे, doctored विडियो दिखायेंगे, और जो इधर से पाते हैं वो तुम्हारे नाम पर गलत को सही साबित करेंगे, राजनैतिक विरोध की खातिर आतंकवादियों के भी गले लगेंगे. अभी तुम्हारे को वो सब राजनेता समर्थन दे रहे हैं जिन्होंने इस देश को गरीबी और भुखमरी से आजादी नहीं मिलने दी. वो तुम्हारे साथ खड़े हो कर उस चीज से आजादी मांग रहे है जो उन्हीं का दिया हुआ है. मीडिया जो इधर से पाता है, वो राजनेताओं के behalf पे गरीबी के नारे से सुर में सुर मिलाके तुम्हें नया हीरो बनाये हुए है. हवा में गरीबी से आज़ादी के नारे लगाना अलग है और वाकई उसके लिए सीरियस आइडियाज लेकर काम करना अलग. अब जब तुम कॉन्डोम बन ही गए हो तो एक सलाह है – बनना है तो संक्रामक बीमारी रोकने वाले कॉन्डोम बनना न कि बाकि वामपंथियों की तरह प्रोडक्टिविटी रोकने वाले. डॉटेड कॉन्डोम बनना कि फील आये, वर्ना बकैती तो सालों से गरीबी के नाम पर होती ही आई है.

तुमने ही कहा था हम भारतीय भूलते बहुत जल्दी हैंअगर तुम मीडिया और राजनीतिज्ञों के हाथों कॉन्डोम बन गए तो याद रखना कि तुम्हे भूलने में ज्यादा टाइम नहीं लगेगा. और तो और जो तुम कॉन्डोम बने तो कल ज्ञान देव आहूजा को गिनती बढाकर 3001 करनी पड़ जाएगी.

जाते जाते एक और बात – इन्कलाब जिंदाबाद (यकीन मानो, इसमें लाल सलाम से ज्यादा ताकत है)

तुम्हारा टैक्सपेयर भारतीय साथी जिसे भारतवासी होने पर गर्व है.

कन्हैया कुमार, तुम कॉन्डोम न हो जाना

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38 thoughts on “कन्हैया कुमार, तुम कॉन्डोम न हो जाना

  1. satik hai aapka title “kanhaiya kumar is condom”

    jab tk news media leaders ko mja aata rhega mja lete rhege

    aur fir fek dege usi JNU k dustbin me

  2. हास-परिहास की फुहार में क्या चुटीला व्यंग्य लिखा है तुमने इस उदीयमान बाल केजरीवाल पर! आज इस बाल-कन्हैया की कई राजनीतिक पार्टियों वाली यशोदाएँ भी हाजिर हो गई! पर देखना है कन्हैया की अल्टीमेट मैया कौन होगी? टीवी बालाएँ रुपी कई गोपिकाएँ भी है..कौन सी राधा उसकी आजादी की बंसी पर झूमी चले आएगी! कन्हैयाजी कहिन के अगले एपिसोड का इंतजार है!

  3. Piggybacking के तात्पर्य को भी बौना साबित किया, मानसिक दिवालियेपन की शिकार,बाएं बगल वालों ने.देखते हैं adoption के बाद कौन बगल झांकेंगे ये!

  4. एक खटने वाले भारतीय की तरफ से लल्ला को सटीक सन्देश!

  5. Incredibly expressed.. Mr.Naveen, u have beautifully voiced our sentiments, Ur thoughts should be given a nationalised platform n we will not hesitate to back Ur voice. These people r actually misusing the freedom we have been bestowed upon by the constitution, a compartive approach should be taken by them to look how much freedom we njoy in our country.. Why go far just look through the fellow country of China, one word against the state, n u would not be able to utter next, well just for a suggestion the law of the country should be made stringent enough on certain values n ethics, which in no circumstance can be compramised… I think like other cases, Supreme Court again needs to give a landmark judgement like Keshvananda Bharti

  6. very intelligent,analytical and to the point. Media need such boosters like Kanhya, Hardik but their shelf life is very short agar kuchh content hoga to aage jayega nahi to kuchh samay bad kisi dustbin mein bhi nazar nahi aayaga. I will say keep it up!!

  7. You nailed it … comparison to condom is most apt for guy like this. And these condoms should be punched from all side of body and thrown. Bloody bilateral Lal salaam fake promoter going against India !!

  8. ek dam sateek jawab bharat ke aam aadmi ka achchha laga padhkar, ummid h kanhaiya bhi jarur padhega aur sochega

  9. Thanks for your praise dear. Your abusive comment proves I touched the right chord. Happy to know as that was the motive. My introduction says “So happy to say my native is India” and that looks Ch**** to you so I can understand from where you are coming. Your quoted name “Afraid of RSS” & your objection with my introduction as Indian proves that RSS claims right.

  10. आप बिल्कुल सही है, सर।
    युवा को ख़ास करके छात्रों को भटकाया जा रहा है, शायद इसका कारण ये है की दलित और किसान के बाद सबसे बड़ा वोट बैंक हम युवा ही है।

  11. Super se v uppar article.

    In his Bhashan-baji, Mr. K… is not saying that
    1) what court told to him?
    2) was he, really, arrested for fighting poverty?
    3) what has he done till now to eradicate poverty except BHASHAN-BAJI?
    4) why is he not attacking congress for poverty coz congress was in power for most of time?
    5) is RSS behind poverty of India?
    6) why is he not saying anything about his other friends’ acts?
    7) why is he not talking about that particular incident?

  12. Very well written.You should express this on a public platform. Not many can articulate it as well as you have done it.Freedom of speech cannot be taken for granted and expecially NOT AT ALL to speak against India…

  13. Ye sale pata nhi kaha se paida ho jate hai.. desh ko bewkoof banane k alawa kuch nhi ata enhe.. agar itni he chinta hai garibi ki tho PhD chod koi naukri kar rahe hote beta aur kamse kamse apni family ko garibi se nikalte.. kam se kam ek family tho garibi se upar ho jati aur ek aur kanaiya ko free education de rahe hote.. en logo ko free ki itni adat lag jati hai ki faltu bakwas k alawa kuch nhi sujhta.. ese logo ko sirf mukey ki talash hoti hai.. ye tho sabhi samjhte hai ki ese logo ko agar desh ki ya desh ki garibi ki fikr ho rahi hoti tho desh ketni pragati kar leta.. jase hamare kejriwal ko thi 2 saal pehle.. family itni garb hai aur enhe netgiri chadi hui hai.. desh k bare me soachne se pehle apne ghar ki halat ke lia kar aur prove kar ki koi mehnat ka kaam kar sakta hai aur fir ye bakwas karna. Don’t mind take it under “freedom of speech”..

  14. Mr kanahiya se accha us bikhari ko manta hu din raat bhukha payasa rhta aur ho sakta h wo bhukh se maar bhi jaye lekin wo na to desh virodhi nare lagata h aur na hi ase logo ka samarthan krta h… Wo sadak pe rhne Wala bikhari ise jayada desh bhakti rakhna h.. Man me.. Jay hind

  15. “पीएचडी में भी एनरोल किया था, पर पूरा नहीं किया. अगर करता तो 25-26 साल की उम्र तक पूरी कर चूका होता”
    — haan, maine bhi ek baar gym join kiya tha. Hafte bhar mein jaana chhod diya, warna 2 mahine mein aaraam se 6 pack bana leta. Khayali pulao pakane ke paise thodi lagte hain.

    A PhD is not studies, it is a proper job. A PhD candidate is expected to make an original contribution to the knowledge base of the world. The candidate is finding answers (and sometimes questions) that no one in the world knew before. This research becomes available to the university for a cost of pennies, if compared to the cost of research in outside industry. Having original contributions and papers brings better funding and attracts better talent to a university. And every successful country needs thought leaders as much as military might.

    bachi baat roj roj paise ginaane ki, kal se roj aapke breakfast/lunch/dinner ke waqt aapko tweet karunga – enjoy your food from my tax-funded subsidies on fertilizer and lpg.

    I don’t think you understand how taxation works. Kanhaiyya and friends also pay taxes on food, clothes, transportation, books, entertainment. People pay tax and the government decides where the money is to be spent. Unless you had specifically sent some extra taxes for JNU, you have no reason to expect it to be applied according to your wishes. That line of argument is totally moot.

  16. I am happy that after reading me several times you are also trying to be witty. Appreciate. Though I don’t understand why you are so afraid of everything. Be original, and don’t be afraid of that. Coming to your points:

    1. An average student completes PG at the age of 22-23 and you get 3 years + 2 years (extension) to complete that full time job, which means an average student can finish his Phd max by 27-28 years of age. Intelligent ppl like Kanhaiya who boast of being in JNU should definitely finish in mentioned time until unless that want to enjoy the ‘Free’ fellowship which can also get extended for 5 years. & I don’t want to comment on the quality of the research. We all know the fact.

    2. Thanks for telling me that my breakfast is funded by your tax money. Though your writing style says you are not even earning, still I believe you and trust me you are feeding me by your tax money and I am feeding you from my tax money. Hisab barabar. & One more I already gave up my LPG subsidy, so it 1-0 now. 😉 One more thing, thanks for following me on twitter.

    3. Being student of Economics and a management professional, I definitely know how taxation works and interestingly that was my research subject too. I am not reminding everyone about the tax paid by me or my fellow citizens. Kanhaiya & his fellows need to remind this when they start taking it for granted. This is very similar to the situation when a parents says to child – Tum par itna paisa kharch karte hai, or tum aise marks late ho.

    So this was answer to what you said. Now coming to my point which you don’t have answer. Do you know what strongest point Kanhaiya supporters made on this post till now? It’s same like yours. They are asking me – khali tum hi tax dete ho kya? You know why? Because ppl with communist mindset are mentally bankrupt and they ensured that countries who follow that also become bankrupt. You must have heard about USSR. This is the reason they are unable to defend Kanhaiya on any other point. There are some more ppl who are in favour of Kanhaiya not because they communist, because they are anti government and happy to support anyone whoever critices the existing government. Now the support is based on oppose only, how can I expect a strong logical counter from them?

    Once again, be original, come forward and debate. Don’t hide like communists. Best wishes to you.

  17. Agreed. Just because we pay tax foes not give us a right to expect JMU students to toe our line. Going by that logic all Ms and MLAS should seek our permission before speaking as they enjoy all sorts of subsidies paid from the taxes we pay.

  18. Not expecting anyone to follow our line Pankaj. Just want them to not create atmosphere against the country within the country. That’s it. They are free to chose their ideology. And, if any MP/MLA talks bullshit, they are criticised in similar way. Remember Digvijay singh, Yogi Adityanath, they are got criticised for their idiotic speeches.

  19. It’s just game of words.truth lies beyond these things.everyone is busy in doing one’s duty for it’s deity..that’s all

  20. Superb will be a tiny word for this article. SARGARBHIT. Wonderfully taken all issues which are mind soothing reply for all of us lovers of India and a fantastic blow on anti nationals.

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