Terrorism has no religion?

 

Terrorism has no religion. ये सुना सुना सा लग रहा है ना? हर दूसरे तीसरे महीने किसी आतंकी हमले के बाद यही ब्रह्म-वाक्य सुनने को मिलता है. जो उस हमले में मरता है न भैया, एक बार उसकी फैमिली के सामने जाके ये बोलना. आतंकवाद का धर्म पता लगे न लगे, जूतों के सारे ब्रांड पता लग जायेंगे.

कल जब से ढाका कि खबर पढ़ी कि जो लोग कुरान की आयतें नहीं सुना पाए उन्हें चुन-चुन कर मार दिया है तबसे दिमाग भन्नाया पड़ा है. अबे, मास्टर हो क्या तुम हमारे जो तुमको आयतें सुनाये. जरा सोचो संस्कृत के मास्साब गीता के श्लोक का भावार्थ न सुनाने पर छड़ी की जगह बन्दूक ले लिए होते तो क्या होता?

कल इस खबर से गुस्सा होकर आतंकियों और उनकी सोच पर कुछ कटाक्ष डाल दिए और पर वो न हुआ जिसकी उम्मीद थी. बहुत सारे मुसलमान बंधुओं ने कमेन्ट किये, मुझे लगा था कि आतंकियों को गाली देंगे, घटना का विरोध करेंगे. पर नहीं ऐसा नहीं था. जिन सेंसिबल मुस्लिमों को मैं जानता हूँ वो चुप रहे. ये जो आये इनमे कुछ तो इन घटनाओं को जस्टिफाई करने लगे और कुछ कहते है कि इस्लाम को क्यों बदनाम कर रहे हो. किसी ने भी घटना पर दुःख नहीं जताया बल्कि ये कह डाला कि अमेरिका जिम्मेदार है क्योंकि हथियार तो उन्होंने बेचे है. इस लॉजिक के हिसाब से हर ट्रक एक्सीडेंट के बाद ट्रक ड्राईवर को नहीं रतन टाटा को जिम्मेदार ठहरा देना चाहिए, ट्रक तो उनकी कम्पनी ने बेचा था. इतने के बाद भी आप पूछ रहे हैं कि हम पर इल्जाम क्यों?

How world see islamic terrorism

मैं इंतजार करता रहा पर एक भी ऐसा खुदा का बंदा नहीं आया जो ये कहे कि भाई ये बहुत गलत हुआ और इस्लाम के नाम पर इन जैसों आतंकियों को अपनी रोटी नहीं सेकने देंगे. आज एक बंधू ने ऐसा लिखा है पर इनबॉक्स में, कमेंट बॉक्स में नहीं. कमेन्ट बॉक्स में या तो लिखने से डरते हैं या अपनी कौम के सामने लिबरल दिखना नहीं चाहते. एक-दो ने कमेन्ट में हल्की-फुल्की कोशिश की भी तो ये लिखा कि रमज़ान के पाक महीने में तो ऐसा नहीं करना चाहिए था. क्यों भाई, बाकी महीनों में आसमान से अंगारे गिरते हैं कि जिसे चाहो उसे मारो.

अच्छा, उससे भी मजेदार ये तर्क आता है (फिर से इनबॉक्स में) कि हमने जो कुरान पढ़ी उसके मतलब और जो उनने (आतंकियों ने) कुरान पढके मतलब निकाला उसमें फर्क है. भाई, बॉल आपकी, बैट आपका, बॉलर-बैट्समैन सब आपके, पर रन-आउट होने गालियाँ मुझे. क्यों भाई? अरे मियां फर्क है तो मिटाइए न. आप लोग और आपके धर्मगुरु ही मिटायेंगे न ये फर्क, आप ही समझायेंगे न उनको कि ये हत्या, आतंक इस्लाम नहीं उसके खिलाफ है. हमें तो रत्ती भर पता नहीं कुरान शरीफ का. अगर हमें कोई बच्चा ‘मा फलेषु कदाचन’ का अर्थ माँ फल देगी बताएगा तो उसे करेक्शन हम ही कराएँगे न. उसे गलत तो नहीं सीखने देंगे. उसकी गलती को गीता पर हमला समझ कर जस्टिफाई तो नहीं करेंगे न?

मतलब सारी खिचड़ी आप पकाएं और मुंह जलने पर हम शिकायत भी न करें?

ये जो आतंकी ‘जिहाद’ का जिक्र करते हैं न और तुम चुपचाप टीवी पर सुन लेते हो वही दिक्कत है. ‘जिहाद’ का जिक्र जिस समय किया गया होगा उस समय वो जरूरी रहा होगा और उसकी परिभाषा रही होगी. कहा तो हमें भी कृष्ण ने था कि शस्त्र उठाओ और अधर्मियों का नाश करो. उस समय कहा था, समय बदल गया है और परिस्थितियां भी. जानते हो हमने हथियार क्यों नहीं उठाये? क्या है न कि हम लोग थोड़े सेंसिबल हैं और हर चीज को बिना सोचे-समझे उठा कर नहीं चल देते. अब अधर्मियों के लिए हमारे फौजी काफी है.

islamic terrorism

जो लोग बोलते हैं न Terrorism has no religion, ये दरअसल शुतुरमुर्ग होते हैं और ये शुतुरमुर्ग भी 2 तरह के होते हैं. पहले थोड़े मासूम होते हैं और इसलिए ऐसा बोलते हैं कि उनके किसी मुस्लिम दोस्त को बुरा न लग जाये. दूसरे जो होते हैं वो होते तो महा-माद*** हैं पर इस मायावी दुनिया में बुद्धिजीवी – वामपंथी पत्रकार – राजनीतिज्ञ – सेक्युलर  कहलाते हैं. ऐसा नहीं है कि ये लोग सौहार्द्र बनाये रखने के लिए ये लोग आतंकवाद को धर्म से नहीं जोड़ते.  तथाकथित सेक्युलर राजनीतिज्ञों का क्या स्वार्थ है ऐसा करने में, ये भी मैं ही बताऊँ क्या? कब तक उनके वोट बैंक बन कर लोगों का खून बहाते रहोगे?

हंसी मजाक बहुत हुआ. मुद्दे पर आते हैं. जानते हो अभी दुनिया भर में कैसा माहौल है? लोग डरने लगे हैं दाढ़ी और जालीदार टोपी वाला आदमी देखकर. अभी ट्विटर पर मोहम्मद आमिर का नाम ट्रेंड कर रहा था और पहला ख्याल मुझे यही आया कि अब किसने कहाँ अटैक किया. डरते-डरते ट्रेंड पर क्लिक किया तो देखा कि कोई क्रिकेटर था. क्रिकेटर देख के उतनी ही राहत मिली  जितना सिगरेट पीने के बाद पापा को स्मेल नहीं आने पर मिलती है.

और ये जो तुम offend हो जाते हो न इस्लामिक आतंकवाद सुन या पढ़कर इसके जिम्मेदार तुम खुद हो. इतना कुछ हो चुका मेरे इर्द-गिर्द कि जब किसी टोपी पहने बच्चे को भी देखता हूँ तो मेरे दिमाग में मैथ्स का प्रोबेबिलिटी वाला चैप्टर घूमने लगता है. मैं सोचने लगता हूँ कि कितनी प्रोबेबिलिटी है कि ये बच्चा आने वाले समय में ‘इन्सान बनेगा’, ‘Sympathiser बनेगा’ या ‘टेररिस्ट’ ही बन जायेगा. जानता हूँ, मेरी ये सोच बहुत घटिया है और मुझे अपनी इसी सोच से घिन्न भी आती है पर क्या इस सोच के लिए मैं अकेला जिम्मेदार हूँ या तुम बराबर के शरीक हो?

Islamic-terrorism-list

दुनिया में लोग इस एक घटना के बाद आतंकवाद को इस्लामिक आतंकवाद (Islamic Terrorism) नहीं बोलने लगे हैं. हमले पर हमले, इतने हमले कि गिनती नहीं पता. और तुम लोग आतंकवाद को ये कह कर जस्टिफाई कर रहे हो कि हथियार तो अमेरिका बेचता है. जिनको तुम जस्टिफाई कर रहे हो वो क्या 3 साल का बच्चा है जिसे अमेरिका ने पत्थर देकर कहा – “जा बेटा, सामने वाले के सर पर मार के आ” और वो मार आया. मुझे इन आतंकी घटनाओं से भी ज्यादा तकलीफ इन घटनाओं का जस्टिफिकेशन देती हैं और उस घटना कि निंदा को जो तुम इस्लाम कि निंदा से जोड़ देते हो, वही लोगों को यकीन दिलाती है कि आतंकवाद का धर्म तो होता है. मैं ऐसा नहीं हूँ और न ऐसी सोच बनाना चाहता हूँ कि आतंकवाद का धर्म होता है, पर तुम ऐसी बातें करके मुझे सोचने पर मजबूर करते हो.

आप तब तक इस्लाम से आतंकवाद का धब्बा नहीं हटा सकते जब तक कि फराज़ जैसे लोग तारिशी के लिए उठ खड़े न हो. आज आपको एक फ़राज़ नहीं, करोडो फ़राज़ कि जरूरत है. एक आतंकियों के विरोध में खड़ा हो, कुछ आतंकियो का समर्थन करें और बाकी चुप रहें. ऐसे में तो भैया वही होगा जो हो रहा है. अभी भी टाइम है जब शांतिप्रिय मुस्लिमों को साथ खड़े होकर इन आतंकियों को बताना चाहिए कि – अरे ओ, चल साइड हो.

मुझे पता है पढ़ के बुरा लगा होगा पर उसके लिए कोई सॉरी नहीं है. इसीलिए लिखा था. मैं आम इंसान हूँ – मुझमें वो सारे इमोशन है जो इन्सान में होती है. मुझे गुस्सा आता है, डर लगता है, रोना आता है, प्यार आता है. वो सारे इमोशन आते हैं जो इन्सान को आते हैं इसलिए जब तक कोई जिहाद के नाम पर या कुरान की आयत न सुनाने के नाम पर दूसरों को मारता है तो मुझे लगता है कि आतंकवाद का धर्म होता है. एक इमोशन मिसिंग है मेरे में, वो है पॉलिटिक्स. जिस दिन आ जाएगी न मैं भी कहूँगा – Terrorism has no religion

Note:  हास्य लिखता हूँ पर आज गुस्सा हूँ इसलिए जैसा लिखा है वैसा झेल लेना, गोलियां झेलते ही हो, उतनी तकलीफ तो नहीं ही देगी. वैसे भी मेरे जैसे लोग गुस्सा ही तो जाहिर कर सकते हैं, लिख ही सकते हैं.

Terrorism has no religion

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16 thoughts on “Terrorism has no religion

  1. A post that i read on SM is scary. Sharing it.

    They did in Dhaka.. a city, 25 minutes away from Kolkata! They were in Hyderabad a day before that, NIA busted it luckily. India may not be lucky again. ISIS is not far!

    Call me scaremonger, but They are here, between you ! Roaming freely in Gurgaon, eating with you in Delhi, working out in Bangalore, planning in Noida, shopping fancy stuffs in Mumbai ! May be in your neighbourhood.

    It is scary, But let’s sketch out a picture. You are in ‘Big Chill bakery’ of Khan Market, Delhi or sitting in Parsi cafe ‘Soda Bottle Opener Wala’ in Cyber Hub, Gurgaon. The young, presumedly educated chaps enters into the cafe with familiar neighbourhood faces. Suddenly they ask you to kneel down, and you realised that, Oh! You have become hostage!

    No scope for Girls, as they have to die by default, because No Burka! Few minutes later, they start identifying the remarks whether you are actually a Muslim or not? How? “Can you recite the verses of Qoran?” will be their second question after asking your surname! And what next.. Show your circumcised Penis?

    Obviously, You know your time is up. But No! It is not so simple, They will not shoot you. Ever wondered why they eat only ‘Halaal’ or bully every food chain to serve ‘Halaal’ compliant items? Halaal is considered to be pristine in Qoran.

    They will slice your nerves slowly-peacefully, They will Halaal you, while reciting “AllahuAkbar” which means Allah is the ONLY God ! Vessels will push all the Blood in open following Bernoullie Theorem. You will attain Peace finally, after some resistant, like a chicken.

    At last your soul will get the answer why it is known as Peaceful Religion! Amen.

  2. Read a post on SM today. It is scary but a real situation. Serves as an alert to all well healed gentry who relaxingly opine that under this vigilant Govt.nothing will happen.But a threat is alwayslurking round the bend. Sharing it here:

    They did in Dhaka.. a city, 25 minutes away from Kolkata! They were in Hyderabad a day before that, NIA busted it luckily. India may not be lucky again. ISIS is not far!

    Call me scaremonger, but They are here, between you ! Roaming freely in Gurgaon, eating with you in Delhi, working out in Bangalore, planning in Noida, shopping fancy stuffs in Mumbai ! May be in your neighbourhood.

    It is scary, But let’s sketch out a picture. You are in ‘Big Chill bakery’ of Khan Market, Delhi or sitting in Parsi cafe ‘Soda Bottle Opener Wala’ in Cyber Hub, Gurgaon. The young, presumedly educated chaps enters into the cafe with familiar neighbourhood faces. Suddenly they ask you to kneel down, and you realised that, Oh! You have become hostage!

    No scope for Girls, as they have to die by default, because No Burka! Few minutes later, they start identifying the remarks whether you are actually a Muslim or not? How? “Can you recite the verses of Qoran?” will be their second question after asking your surname! And what next.. Show your circumcised Penis?

    Obviously, You know your time is up. But No! It is not so simple, They will not shoot you. Ever wondered why they eat only ‘Halaal’ or bully every food chain to serve ‘Halaal’ compliant items? Halaal is considered to be pristine in Qoran.

    They will slice your nerves slowly-peacefully, They will Halaal you, while reciting “AllahuAkbar” which means Allah is the ONLY God ! Vessels will push all the Blood in open following Bernoullie Theorem. You will attain Peace finally, after some resistant, like a chicken.

    At last your soul will get the answer why it is known as Peaceful Religion! Amen.

  3. ये बात अगर धर्म के ठेकेदारों को यूहीं समझ अा जाए, तो Satire में समाझाने की नौबत ही न अाए…

  4. Look u can’t say a normal Muslim is responsible is for terrorism …..we have no part in this …..killing an innocent is like killing the whole humanity in islam .. n a real Muslim is the one from whose tounge n hands the others r safe …. terrorism is a problem because if misinterpretation of islam …mostly muslims condemn terrorism (me too)…but the attitude of such good Muslims has somewhere became like they’ll keep blaming us even as we have no part so they have started ignoring the linking n don’t come to confront the linkage. …go to a Muslim area in ur city now n get a survey done of whether terrorism is good or not (if u r afraid then keep the disguise of a Muslim only )…U’LL FIND OUT THE TRUTH …. U HAVE decided on the basis of comments of only some stupid Muslims on FACEBOOK n u don’t knw the ground reality tht most of the Muslims CONDEMN TERRORISM……

  5. Hi Bilal, I would like to quote a piece again from the blog:
    आप तब तक इस्लाम से आतंकवाद का धब्बा नहीं हटा सकते जब तक कि फराज़ जैसे लोग तारिशी के लिए उठ खड़े न हो. आज आपको एक फ़राज़ नहीं, करोडो फ़राज़ कि जरूरत है. एक आतंकियों के विरोध में खड़ा हो, कुछ आतंकियो का समर्थन करें और बाकी चुप रहें. ऐसे में तो भैया वही होगा जो हो रहा है.

    Sometime back an organization tried to counter islamic terrorism with saffron terrorism. Pragya Thakur was arrested for the same. Have you seen any hindu justifying her (except from those who are assoicated with the organization). Their motive ended at same time. Muslims need to wake up and raise voice now because it is badly harming them. It will make everyone else unite against the muslims and we will have a world war like situation. Islamic terrorism from islamic countries had not only disturbed India or America but the whole world.

    I have not decided on the basis of ‘only’ the facebook comment. Even if I talk about that then none of regular sensible muslim followers commented on it, but they do if anything is for Modi (and do sensibly). These guys are quiet and the 100s who are talking are defending terrorism. Still you want me believe that there is no soft corner for terrorists.

  6. Just now read opinion of Mr Bilal. Implicitly himself he is admitting that going a muslim area just to know opinion and mind set of fellow community members can lead you trouble, disguised yourself as a muslim. How cute.

    By the way, he still did not ponder his opinion that if most of Muslims CONDEMN TERRORISM, where are they.

    What as a common see is large gathering at yakub menon funeral, getting hurt by for unknown reasons and create rucksacks.

    How many times such good muslims come forward and take an open stand. In my entire life I have not seen such phenomenon.

    Ask your self an honest question, why Indian army does not have an Muslim Regiment.

  7. Bhai i know mostly Muslims should stand n Condemn the terrorism publically …. n i think there is less probability to find out comments of most Muslims on internet as yaar if u see in india mostly Muslims have worse economic conditions (economic conditions k there r various reasons )so they aren’t connected to internet .ye aap b agree kroge …unke liye pet paalna b muskil hota .. ab jo bachte unme se kch faaltu support krte terrorism ko on Internet n kch mere typ n IRRFAN KHAN k typ terrorism ko condemn krte through social media. …. Bhai tum kisi sensitive area me baat kiye hoge Muslims se …. normal areas me baat kroge toh pata chalega less than 5 % support terrorism …. n ye PREJUDICESD baate MAT bolo yr ki MOSTLY Muslims terrorism ko defend krte ..aap sirf kch logo ki opinions ko interpolate krke le rhe decisions.sirf 1 percent 2 percent krte honge ..krwa hi lo na aap yaar survey pta chal jaega ….n if u r writing a public blog u shud be sure about the facts u publish to bhai krwa lo pta chal jaega ……

  8. N disguise wali baat pe I wasn’t afraid ..mujhe oata kch nai hoga …. I said in case the surveyer is afraid …

  9. Au agar TERRORISM ka religion ISLAM hota toh terrorist Islam me sbse jyada Sacred place pe bombing nai krte ….It is the same place (Madina) from where the Islam has spread out …

  10. Bahut hi badhiya likhaa hai Naveen ji. Ravish waale posts se bhii badhiyaa. Aur main sau fee sadi aapse sehmat hoon. Jab tak musalmaan log, bhaari jamaat mein, aatankwaad ke khilaaf awaaz nahin uthaayeinge, tab tak ye silsilaa zaari rehega.

    BTW… suna hai Faraz bhii aatankwaadi hi thaa. Uske Dada Bangladesh ke kisi bade paper ke maalik hain. Aur unhone Faraaz ke hero hone ki khabar, media mein plant karwaayi thii. Woh maara gaya kyunki usko Quraan ki aayatein nahin aatiin thiin.

    Main oopar comment padh rahii thii. Ab Amreeka ke saath saath musalmaan ki economic condition ka vaasta de rahe hain log?? Woh ye nahin jaante… ki jitne terrorist Dhaka mein maare gaye hain… saare ke saare economically rich background se hain aur ache ache univerity ke students the?? Unke liye kyaa justification hai?

    Agar hai bhii… toh justification kyon? Jab tak muslims aise justification dete raheinge, unki aad mein anya muslims terrorist bante rehenge.

    Economic condition, education, inme se kuch bhii zimmedaar nahin. Ye sab Hinduon ke liye bhii same hota hai.

    Sirf aur sirf Islaam jimmedaar hai. Agar apne majhab se ye dhabba hataana hai.. toh Quraan ki jo aayatein kaafiron ko maarne ke liye kehtiin hian, un aayaton ko Quran mein se phaad fenko. Hadith ki jo hidaayantein apne se anya logon ko gair-insaani tareeke se sulook karne ki salaah deti hai, un hidaayaton ka khandan karo. Islam mein Reforms laao.

    Agar ye sab nahin kar sakte… toh saare justifications manghadant aur bekaar hain. Tab dosh tumhaare Quraan ka yaa US ki bandook ka nahin. In logon ki mentality ka hai. Simple.

    Mere ghar mein agar mera beta meri beti se badsulooki karega.. toh meri jimmedaari hai ki main usey do chapat lagaaun. Main apne padosi ko doshi nahin theheraati.

    Jinka majhab hai… uski gandagi saaf karne ki jinmmedaari unki hi hai.

    Warna dete raho fake justification… Islam is a religion of peace. Aur ye religion of peace, most peaceful month mein, most peaceful tareeke se… 36000 logon ka sar kalam karr gaya. That is the number of death in the month of Ramzaan in 2016.

    So much for the religion of peace and terror has no religion.

  11. meri mummy muslim hai or papa rajput hai unki love marrige hui hai meri mummy ne muje kabhi bi dharm ke naam par kisi se bahas karna nahi sikhaya jab mene mummy jo bola ki dekh dhaka mai kya ho raha hai tab mummy ne bola ki kutte saale inki vajah se unko bi galiya sunni padegi jinko is news k baare m bi ni pta hoga or main hindu hi lagaata hu school collage mai par na mai papa se nafarat karta hu na mummy se to muje hindu muslim dono ache lagte hai bas

  12. नविन जी, मैं जैसे जैसे लेख पढ़ रही थी वैसे वैसे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे आपने हर इंसान के मन की भड़ास उंडेल दी हो।
    जब तक हर मुस्लिम धर्मगुरु और हर मुस्लिम नेता ऐसी घटनाओ की निंदा नहीं करते या अपने समाज को शिक्षित करने में आगे नहीं आते ताकि इन लोगो को सही-गलत की समझ आए, तब तक हम ये नहीं कह सकते कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।

  13. धन्यवाद ज्योति जी. समस्या यही है कि मुस्लिम समाज के अछे लोग आगे आने से डर रहे है.

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