आरक्षण

 

आरक्षण – पहली बार इस शब्द में वास्ता पड़ा जब मैं सातवीं-आठवीं क्लास में पढ़ा करता था. मंडल आयोग की सिफारिशों के विरोध में यूनिवर्सिटी के छात्रों ने उग्र प्रदर्शन किये थे, तोड़ फोड़ हुई, कुछ छात्रों ने आत्मदाह कर लिया और ऐसी ही बहुत सी ख़बरें थी जो धुंधली सी याद है. इन दंगों के कारण शहर के सारे स्कूल लगभग महीने भर बंद रहे थे. अभी जब एक बार फिर ये मुद्दा गर्म है तो दो लोगों के किस्से याद आ गए जिनको मैं जयपुर से जानता हूँ.

किस्सा 1:

राजस्थान यूनिवर्सिटी से सन 2001 में मैं इकोनॉमिक्स में MA कर रहा था. मेरे साथ मेरा एक मित्र अनुराग वशिष्ठ और उसका एक मित्र नन्दलाल मीणा हुआ करता था. अनुराग का मित्र इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि वो उसी का दोस्त और पडोसी था, मेरे लिए सिर्फ क्लासमेट था पर अनुराग का दोस्त होने के नाते ठीक-ठाक बातचीत हो जाया करती थी. हमारे डिपार्टमेंट के हर बच्चे के MA के बाद दो टारगेट पक्के थे – नेट की परीक्षा पास करना और सिविल सर्विसेज की परीक्षा देना. बाकी सब कैरियर आप्शन सेकेंडरी थे. जब MA का रिजल्ट आया तो एक अनुराग निराश था क्योंकि सिर्फ 0.5% कम रह जाने से वो नेट की परीक्षा में बैठने को क्वालीफाई नहीं कर रहा था. वो एक अच्छा स्टूडेंट था पर नेट के लिए 55% होने जरूरी हैं. निराश नन्दलाल भी था क्योंकि वो भी 0.5% कम रह जाने से वो नेट की परीक्षा के लिए क्वालिफाइड नहीं था. फर्क इतना था की जहाँ अनुराग के लिए जनरल कास्ट होने के नाते 55% का क्राइटेरिया था वहीँ नन्दलाल के लिए 50%. दोनों हताश थे तो यहाँ घर वाले आगे आये. एक मिडिल क्लास नौकरीपेशा फॅमिली से आने वाले अनुराग को उसके पिताजी ने कहा की बेटा आगे जहाँ और भी है, बाकी परीक्षाओं की तैयारी कर. नन्दलाल के घरवालों ने भी उसे यही कहा और उसका हौसला बढ़ाने के लिए उसे एक महिंद्रा बोलेरो गिफ्ट कर दी. नन्दलाल उस महिंद्रा बोलेरो में बैठ कर सिविल सर्विसेज की परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग जाता था और अनुराग कभी टेम्पो में तो कभी पापा का स्कूटर लेकर MBA की कोचिंग में.

मैं भी नौकरी के सिलसिले में जयपुर छोड़ चुका था. 4-5 साल तक क्लासमेटस की ख़बरें मिलती रही फिर सब अपने में बिजी हो गए. अनुराग भी सेटल हो गया था, पर नन्दलाल कहीं भी किसी भी परीक्षा में सफल नहीं हुआ. घरवालों ने उसकी हिम्मत बंधाये रखने को स्कार्पियो गिफ्ट कर दी.

Reservation snatched talent from country
Reservation snatched talent from country

अनुराग अभी एक मल्टीनेशनल में ऑफिसर है और इन हिंदुस्तान के बाहर पोस्टेड है. कुछ समय पहले जब इंडिया आया तो मिला. यूँ ही क्लासमेटस की चर्चा करते हुए मैंने नन्दलाल के बारे में पूछ लिया. पता चला बस अभी 3 साल पहले वो पंजाब नेशनल बैंक में इकोनॉमिस्ट की पोस्ट पर नियुक्त हो गया है. 2 बोलेरो, 1 स्कार्पियो, 1 वैगन R, 3 कोठियों और कुछ एकड़ जमीन के मालिक नन्दलाल को उसके जातिगत पिछड़ेपन और शोषित वर्ग से आने के कारण न सिर्फ क्वालिफिकेशन में 5% की छूट थी बल्कि उम्र में भी 5 साल उसके पास ज्यादा थे. अक्सर सोचता हूँ कि क्या नन्दलाल वाकई पिछड़ा है? क्लासमेट था, इसलिए इकोनॉमिस्ट होने पर सवाल नहीं उठाना चाहता.

किस्सा 2:

जयपुर में ही घर के पीछे की तरफ एक भैया रहा करते थे, नाम था संतोष झा. जब पहली बार मिला उनसे तो मेरी उम्र 20-21 साल होगी और उनकी 25-26 साल. ग्रेजुएट संतोष झा बिहार के एक गरीब ब्राह्मण परिवार से थे. गाँव में इतनी ही जमीन थी कि सबका पेट भर जाये तो ही काफी. जाहिर सी बात है कि घरवालों के पास इतने पैसे होने का सवाल ही नहीं उठता कि उन्हें किसी शहर में भेज कर कम्पटीशन की तैयारी करवाएं, तो संतोष भैया जयपुर आ गए एक रिश्तेदार के पास. यहाँ आकर इलेक्ट्रिक फिटिंग का काम सीखा और लोगों के घर में, फैक्ट्रीज में जहाँ काम मिला करते गए. 8-10 साल के बाद कुछ पैसे जोड़कर 50 गज जमीन खरीदी और एक छोटा सा घर बना लिया. बच्चों को जितना हो सकता था उतना बेहतर पढ़ाने की कोशिश करने लगे. बेटे पढने में सुपर इंटेलीजेंट तो नहीं पर अच्छे थे. बड़े बेटे का इंजीनियरिंग में एडमिशन हो गया. लोन वगैरह लेकर उसकी फीस जमा करायी, उसे सारी सुविधाएँ दी, पर किस्मत धोखा दे गयी. 2 साल पहले संतोष भैया का आकस्मिक देहांत हो गया. बड़ा बेटा इंजीनियरिंग के फाइनल इयर में था और पहली समस्या खर्चे उठाने की आ गयी. रिश्तेदारों ने मिल कर तय किया की बच्चे की पढाई नहीं रुकनी चाहिए, एक बार वो निकल जाये तो परिवार संवर जायेगा. पर किस्मत जब मार मारती है तो हर तरफ से मार मारती है. संतोष भैया के बेटे का परीक्षाओं के समय पैर टूट गया. उस समय उसके एक दोस्त ने काफी मदद की. उसका दोस्त एक RAS अफसर का बेटा था. अपनी स्विफ्ट डिजायर में रोज इसे लेकर परीक्षा दिलाने ले जाया करता था. कुछ दिनों पहले फ़ोन आया था संतोष भैया के बेटे का. कह रहा था कि आगे के लिए कुछ गाइड करो, कहीं नौकरी नहीं मिल रही. घर की हालत ख़राब है, सब मुझ पर ही उम्मीद लगाये बैठे हैं. मैं उसकी बातें सुन रहा था, अलग लाइन में हूँ इसलिए हौसला बढ़ाने के अलावा और ज्यादा कुछ नहीं कर सकता था.

आरक्षण का हक़दार कौन?

अब जब कभी भी जाति के आधार पर आरक्षण मांगने को लेकर आन्दोलन होते हैं मुझे समझ नहीं आता कि आरक्षण का असली हक़दार है कौन? SUV में बैठकर आरक्षण मांगने वाले और iphone से उस आन्दोलन की तस्वीरें शेयर करने वाले, या संतोष झा और उनके बेटे जैसे लोग?

Say no to reservation
Time to abolish caste based reservation

मैं सामाजिक स्तर पर सबके बराबर आने का समर्थक हूँ और सहमत हूँ कि उस समय में पिछड़ी जातियों को आगे लाने के लिए आरक्षण देना जरूरी था. परन्तु आज के परिप्रेक्ष्य में चीजें बदल गयी हैं. आज जो बात सीधी-सीधी मुझे सामने दिखती है वो ये है कि आरक्षण का लाभ सिर्फ वही उठा रहा है जो आर्थिक आधार पर सक्षम है, न कि वो जिसे इसकी वाकई जरूरत है. नन्दलाल जैसे आर्थिक आधार पर समृद्ध लोग 10-12 साल स्कार्पियो में घुमते हुए कम्पटीशन देते रह सकते हैं और उनके बाद उनके बच्चे इस आरक्षण का लाभ लेंगे. अगर यही संतोष झा ब्राह्मण न होकर शोषित जाति का होता तो भी उसके हालात में बहुत फर्क नहीं आता. उसके लिए सबकुछ उतना ही कठिन होता.

असली शोषित आज की तारीख में वो है जो आर्थिक रूप से कमजोर है चाहे वो किसी भी जाति का क्यों न हो. हो सकता है आप कहें की जनाब गाँव में जाकर देखिये अब भी जातिगत आधार पर भेदभाव है. मैं इस पर भी इतना ही कहूँगा कि जिसके साथ आज भी जाति के आधार पर भेदभाव हो रहा है एक बार उसकी आर्थिक स्थिति का आंकलन जरूर करें.

Reservation will increase community clashes
Reservation will increase community clashes

समय है जब जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा हो. अगर अब भी हमने आरक्षण को आर्थिक आधार पर न किया तो गरीब गरीब ही रह जायेंगे और अमीर चाहे वो किसी जाति के हों और अमीर होते रहेंगे. इनको देखते हुए हर बार कोई न कोई जाति आरक्षण मांगने के लिए सड़कों पर उतरेगी और दंगा करके न सिर्फ देश का नुकसान करेगी बल्कि सामाजिक सोहार्द्रता को ख़तम कर देगी. जब समाज में जाति के आधार पर टकराव होता रहेगा तो आरक्षण की मूल भावना जो सबको एक स्तर पर लाने की थी वो कहाँ बचेगी?

जाते जाते आपको बता दूँ की संतोष झा के बेटे को जिस RAS के बेटा अपनी गाड़ी से परीक्षा दिलवाने ले जाता था, वो भी पिछड़ी जाति या शोषित समाज से आता है. आरक्षण की बदौलत संतोष झा के बेटे से कम नंबर लाने पर भी उसकी RSEB में असिस्टेंट इंजिनियर के रूप में सरकारी नौकरी लग गयी है. सुना है जल्दी शादी होने वाली है और गिफ्ट में एक SUV मिलने वाली है. सतोष झा का बेटा अभी भी परिवार की बेसिक जरूरतों को पूरा करने की कोशिश कर रहा है. अनुराग शायद ही वापस भारत आएगा क्योंकि उसके टैलेंट की कद्र बाहर ज्यादा हो रही है.

 

आरक्षण

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3 thoughts on “आरक्षण

  1. Please specify the details for Santosh’s Jha’s son education – which branch, which year pass-out etc, may be someone who’s in similar field can help him.

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