अन्ना हजारे और रामदेव से जुड़े नौ सवाल और उनके जवाब

 

डिस्क्लेमर: ये लेख में लिखी सभी बाते लेखक के निजी विचार है| इस लेख के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या भाजपा का हाथ नहीं है और न ही मेरा कोई राजनीती में उतरने का छुपा हुआ एजेंडा है|

जबसे भ्रष्टाचार और जन लोकपाल बिल के लिए अन्ना हजारे और बाबा रामदेव्  ने आन्दोलन / अनशन प्रारंभ किया है तभी से बहुत से सवाल भी उठ रहे हैं अलग अलग वर्ग के लोगो द्वारा| इस वर्ग में सिर्फ मीडिया, राजनीतिज्ञ ही नहीं आम जनता भी शामिल है|  सब किसी न किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर सवाल उठाये जा रहे है| किसी को सरकार से हमदर्दी है, किसी को अन्ना से, किसी को रामदेव से. किसी को दोनों से, तो किसी को किसी से नहीं| मैंने अभी तक जितने भी सवाल सुने है उनमे से जो सबसे सामान्य सवाल निकलते है, आइये एक बार उन पर  चर्चा करते है|

इस चर्चा से पहले अपने सारे पूर्वाग्रह, अपनी विचारधारा चाहे वो हिंदूवादी है, इस्लामिक है, सेकुलर है साम्राज्यवादी है या साम्यवादी है, उनको थोड़ी देर के लिए त्याग दीजिये| सिर्फ एक विचारधारा को दिमाग में रखते है और वो है – राष्ट्र, राष्ट्रहित और राष्ट्र के नागरिक सर्वोपरि| कुछ  अंग्रेजीदां लोगो को राष्ट्र शब्द से तकलीफ हो सकती है इसलिए वो सुविधानुसार इसे बदल कर कंट्री पढ़ सकते है| आइये अब एक एक सवाल उठाते है और उसके बारे में बात करते है:

– पहला सवाल: कैसे आप अन्ना हजारे की तुलना महात्मा गाँधी से कर सकते है?

हमारे देश में आन्दोलन का जनक महात्मा गाँधी को माना जा सकता है| उन्होंने अहिंसात्मक रूप से आन्दोलन किये और देश के सभी वर्ग के नागरिको को उसमे जोड़ा| महात्मा गाँधी में ही वो क्षमता थी की समाज के व्हाइट कॉलर लोग भी स्वतंत्रता संग्राम में साथ जुड़े| उसके बाद शायद ही कोई नेता (जे.पी. को छोड़कर) ऐसा कर पाया हो| गाँधी ने ये सब बिना किसी राजनैतिक महत्वाकांक्षा के राष्ट्र हित के लिए किया|

अन्ना हजारे भी कोई राजनैतिक व्यक्ति नहीं है| जन लोकपाल बिल से पहले उन्होंने अपने गाँव के लोगो के बहुत काम किया, वो भी बिना किसी राजनैतिक महत्वाकांक्षा के| उन्होंने जन लोकपाल बिल का विषय उठाया और समाज के सभी वर्गों ने उन्हें समर्थन दिया| क्या किसी अन्य नेता में ये क्षमता है की वो सभी वर्गों के लोगो का समर्थन ले सके| इस तरह का समर्थन सिर्फ अन्ना ने जुटाया| अगर आप मानते है कि गाँधी बहुत महान थे और अन्ना उनके १०% ही है, पर क्या कोई और गाँधी के १% भी है?

 

– दूसरा सवाल: भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई को “क्रांति” कैसे कह सकते है? ये कौन सी क्रांति हो गयी? 

क्रांति होती क्या है? जहां तक मेरी समझ है क्रांति का अर्थ है की परिवर्तन के लिए आम आदमी सड़क पर उतरे और संघर्ष करे| जन लोकपाल बिल में और क्या हुआ है? आम आदमी मुद्दे को लेकर सामने आया है|  फिर भी आपको लगता है की क्रांति कुछ और होती है तो मान लेते है| पर ये बताईये की क्या आपको 1977 के बाद का कोई जन आन्दोलन याद है जिसमे आम आदमी बिना किसी राजनैतिक नेतृत्व के सडको पर आया? एक भी नहीं| अगर कोई आन्दोलन चला भी तो उसमे मात्र राजनितिक दल और उसके कार्यकर्ता शामिल थे, आम आदमी नहीं|

1977 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है की एक गैर राजनितिक व्यक्ति ने व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाई है और उसका समर्थन हर वर्ग के लोगो ने किया है| इमरजेंसी के दौरान छात्रो ने मुख्य भूमिका निभाई थी पर इस बार हर वर्ग का आदमी साथ है| वैसे हमारी युवा पीढ़ी को तो 1977 के बारे में भी नहीं पता होगा|  बस यही वजह है इसे क्रांति कहने की क्योकि हमने और तो कुछ देखा ही नहीं|

 

– तीसरा सवाल: बाबा रामदेव इस मुद्दे को क्यों उठा रहे है? उन्हें तो योग सिखाना चाहिए|

पहले ये तय करिए की तकलीफ किस बात से है? बाबा रामदेव से या फिर इस भ्रष्टाचार के मुद्दे से? अगर मुद्दे से ही तकलीफ है तो बात करना बेकार है| अब रामदेव की बात करते है| रामदेव भी इस देश के नागरिक है और उन्हें भी देश से सम्बंधित विषय उठाने का अधिकार है| अगर रामदेव राजनीती भी करना चाहते है तो कम से कम सही मुद्दा उठा कर तो राजनीती कर रहे है, हमारे नेताओ की तरह बेसिर पैर की राजनीती तो नहीं| और अगर रामदेव राजनेता ही बन गए, तो उन्हें राजनेता बनाना या न बनाना हम आम जनता के हाथ में है|

अब अगर आप कहे की रामदेव को सिर्फ योग सिखाना चाहिए तो इस आधार पर तो हमें कई राजनेताओ को व्यवस्था से हटाना पड़ेगा| कपिल सिब्बल खुद राजनीती में आने से पहले वकालत करते थे और इस बात को बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ है| अगर योग सिखाने वाले को योग, वकील को सिर्फ वकालत ही करनी चाहिए और राजनीती में नहीं आना चाहिए तो फिर किसे राजनीती में आना चाहिए? इस आधार पर राजनीती में आने के लिए सिर्फ वो लोग रह जाते है जिनका परिवार राजनीती में रहा है या फिर हम अपराधियों को राजनीती में आने को कह सकते है| क्योकि योग गुरु को योग सिखाने को तो कहा जा सकता है पर अपराधी को अपराध करने को नहीं|

 

– चौथा सवाल: रामदेव एक एजेंडा के तहत ऐसा कर रहे है|

मान लेते है की रामदेव एक एजेंडा के साथ इस विषय को उठा रहे है, पर विषय तो ठीक है| मैं मानता हु की रामदेव द्वारा ये मुद्दा उठाना काफी हितकर है| अन्ना हजारे ने इस आन्दोलन की शुरुआत की और करीब ६००० लोगो ने जंतर मंतर पर इकट्ठे होकर उनका साथ दिया| इस बात को तो आप मानेंगे ही की रामदेव देश की लाखो की जनता को अपने साथ लेकर चल सकते है| और रामलीला मैदान में हुआ भी यही, एक लाख से अधिक लोग रामदेव के आह्वान पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध इकट्ठे हुए| जहां अन्ना हजारे ने पढ़े लिखे शहरी तबके में भ्रष्टाचार  के मुद्दे को लेकर जागृति जगाई, वहाँ रामदेव बाबा ने ग्रामीण और कस्बाई जनता के बीच इस विषय पर जागृति उत्पन्न की है| इसीलिए मेरे जैसे व्यक्ति जो सिर्फ व्यवस्था में सुधार चाहते है उनको बाबा रामदेव को लेकर कोई समस्या नहीं है| और जब तक रामदेव लोकतान्त्रिक तरीके से विषय उठाएंगे उनको समर्थन मिलता रहेगा, अगर उन्होंने कुछ गलत किया तो ये भारतीय जनता कब दरकिनार कर देती है पता भी नहीं चलता| भाजपा का हाल देख सकते है आप| इसलिए दोस्तों रामदेव क्या धंधा करते है, योग सिखाते है, को भूलकर  हम लोग मूल विषय पर ध्यान देते है|

 

– पांचवा सवाल: रामदेव रामलीला मैदान से क्यों भागे?

रामदेव अनशन स्थल से भागे, न की आन्दोलन से| अस्पताल में भरती हुए रामदेव का अनशन चालू था| हर आन्दोलन एक रणनीति के तहत चलता है| रामदेव की रणनीति होगी की गिरफ्तार नहीं होना, और इसके पीछे उन्होंने परिस्थितियों का आंकलन किया होगा| जिस तरह सरकार ने रामलीला मैदान में बल प्रयोग किया, उस हिसाब से मुझे लगता है रामदेव का निकलना ठीक था| इतिहास में बहुत से उदहारण है जहां वीरों ने युद्ध मैदान छोड़ा, ताकि दुबारा आक्रमण कर सके| इसलिए ये कहना की महात्मा गाँधी कभी गिरफ्तार होने से नहीं डरे, रामदेव क्यों डरे, गलत है| वैसे भी गाँधी के पीछे आन्दोलन को संभालने वाले बहुत थे, रामदेव के पीछे नहीं|

 

– छठा सवाल: अन्ना और बाबा के आन्दोलन को सत्याग्रह कहना गलत है|

क्यों भाई? सत्याग्रह पर कोई कॉपीराइट है क्या? सत्याग्रह का अर्थ जो महात्मा गाँधी ने दिया था वो था की आम आदमी द्वारा सत्य / अपने हक़ के लिए अहिंसात्मक रूप से अपना विरोध प्रदर्शन| इन दोनों के आन्दोलन में ऐसा ही तो था, भरष्टाचार और काले धन के प्रति आम आदमी ने अहिंसात्मक रूप से अपनी मांग रखी|

 

– सातवाँ सवाल: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रामदेव के आन्दोलन के पीछे है|

तो क्या ये गुनाह है? हिंदुस्तान (अंग्रेजीदां और सेकुलर लोग इण्डिया पढ़े) में किसी भी संगठन को हक़ है की वो किसी को भी समर्थन दे| हमारे देश में तो लोग पाकिस्तान को भी समर्थन दे देते है, अरुंधती रॉय भारत विरोधी गुट की सभा में आज़ाद कश्मीर की वकालत कर देती है, फिर संघ तो राष्ट्र से जुड़े मुद्दे पर समर्थन दे रहा है| 

जो संघ के इस आन्दोलन से जुड़ने को साम्प्रदायिक समझते है, उन्हें बता दूँ की ये आन्दोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध है, राम मंदिर के लिए नहीं|  अगर संघ ही इस आन्दोलन को पीछे से चला रहा है तो क्या बिना काले धन की समस्या के ही चला पा रहा है?

वैसे इस बात को किसी ने प्रचारित नहीं किया कि रामदेव के आन्दोलन को मुस्लिम नेताओ का भी समर्थन प्राप्त था और वो भी स्टेज पर बैठे हुए थे| 

 

– आठवाँ सवाल: महात्मा गाँधी ने भी बहुत अनशन किये जो प्रभावी रहे, अन्ना और रामदेव के अनशन सरकार पर दबाव क्यों नहीं डाल पा रहे?

सबसे पहले तो महात्मा गाँधी ने जितने भी अनशन किये वो देशवासियो को अपनी बात मनवाने के लिए| उनका उद्देश्य लोगो में एकता थी, आन्दोलन को उनके दिखाए रस्ते पर ही चलते रहने की थी| गाँधी ने एक भी अनशन ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध नहीं किया| करते तो वो भी रामदेव की तरह प्रताड़ित किये जाते|

– नौवां सवाल: क्या सिर्फ अनशन और सड़क पर उतरना ही रास्ता है? और कई तरीके है| ये आन्दोलन सिर्फ सरकार पर दबाव उत्पन्न करने को किये जा रहे है|

जो और तरीको की बात करते है उन्हें और तरीके सुझाने भी चाहिए| आपको बता दू की लोकपाल बिल का पहले का प्रस्तावित स्वरुप बहुत नर्म था और उसे भी संसद में कई बार पेश किया गया, और वो बिल पास नहीं हुआ| तो अब जो बिल का प्रस्तावित स्वरुप है क्या वो संसद में पास हो पायेगा? काले धन को लेकर अगर विधेयक लाया भी जायेगा तो पास तो संसद में ही होना है न, पास ही नहीं होगा|

दरअसल हमारा लोकतान्त्रिक ढांचा सिस्टम को ज्यादा समर्थ बनता है, आम आदमी को नहीं| आपको बिलकुल भी हक़ नहीं है की आप देश के दो सर्वोच्च पद प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का चुनाव कर सके| अगर आप उन्हें चुन ही नहीं सकते तो आप उन्हें अपने प्रति जवाबदार कैसे बना सकते है? ओबामा जिस तरह से अमेरिकी जनता को प्रत्यक्ष रूप से जवाबदार है, उस तरह से हमारे प्रधानमंत्री नहीं|

आपके पास कोई हक़ नहीं की आप राजनितिक पार्टियों को कह सके या मजबूर कर सके कि अच्छे 

प्रत्याशी उतारो| पार्टी कैसे भी प्रत्याशी को उतारे चाहे वो अपराधी ही क्यों न हो, आपके पास सिर्फ 2 ही उपाय है, या तो वोट दीजिये या मत दीजिये| अगर आपका चुना प्रत्याशी काम नहीं करता तो आपके पास 5 साल इंतज़ार करने के अलावा कोई चारा नहीं है|

हमारा सिस्टम ऐसा है की इसमें कोई भी ऐसा आदमी प्रधानमंत्री बन सकता है जिसे 1% जनता भी पसंद नहीं करती| मनमोहन सिंह की अक्षमता का उनके तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने से कोई सम्बन्ध नहीं है| वो कुछ नहीं तो राज्यसभा से चुन कर आ जायेंगे और आप कुछ नहीं कर पाएंगे|

एक और दुविधा – मान लीजिये की वर्तमान सत्ताधारी दल अच्छा काम नहीं कर रहा परन्तु आपका एम्.पी. जो उसी पार्टी का है, अच्छा काम कर रहा है तो आप अगले चुनाव में क्या करेंगे? आप अपने अच्छे प्रतिनिधि को जो उसी पार्टी का है जिताएंगे, ऐसा करके आप फिर उसी पार्टी को सत्ता में लायेंगे, या फिर इस प्रतिनिधि को हराएंगे और एक ऐसे व्यक्ति पर दांव लगायेंगे जिसका पता नहीं काम करे या न करे|

इसलिए अब सिर्फ काला धन ही विषय नहीं है| समय है दबाव बनाने का और पूरी व्यवस्था को बदलने का| और इस व्यवस्था को बदलने के लिए मै हर आन्दोलन का समर्थन करूँगा, चाहे उसे रामदेव चलाये, गिलानी चलाये या सोनिया गाँधी|

अन्ना हजारे और रामदेव से जुड़े नौ सवाल और उनके जवाब

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