October 29, 2010 | In: student-politics
तीस मार खां
Written by Naveen Choudhary on October 29, 2010 – 5:36 am -तीस मार खां
कॉलेज में थे तो हम लोग नए लेकिन मैं फर्स्ट इयर में ही अपने कॉलेज से एम्.पी. का चुनाव जीत चुका था और साथ में ही एक ग्रुप में रहने की वजह से भी लोग हमें जानने लगे थे| कॉलेज में पहली धाक हमारी बनी एक अचानक हुई घटना या यु कहे दुर्घटना से|
हम लोगो के एग्जामिनेशन फॉर्म भरे जा रहे थे| हम सभी दोस्त फॉर्म जमा करने की लाइन में हुए थे| बीच – 2 में कभी कोई घुसने की कोशिश करता तो चिल्लाने लगते की ओ ताऊ, लाइन में आ जा| इसी तरह मस्ती करते बाते होते लाइन आगे की तरफ खिसकती जा रही थी और कुछ ही देर में हमारे ग्रुप का नंबर भी आ गया| मेरे साथी ने अपना हाथ खिड़की की तरफ बढ़ाया ही था की एक हट्टे कट्टे से लड़के ने साइड से आकर अपना हाथ खिड़की में फॉर्म के साथ घुसा दिया| मेरे साथी ने कहा – ओ भाई, कहाँ? उसने उसे बिलकुल ही अनसुना करते हुए कहा – सिंह साहब, ये फॉर्म जमा करो|
मेरे दोस्त को इस पर गुस्सा आ गया और बोला – अबे ओए, बीच में कहाँ घुसा जा रहा है, देख नहीं रहा लाइन है| सुनते ही उस लड़के ने मेरे दोस्त की गर्दन पकड़ कर उसे झटका देते हुए कहा – तो लाइन में खड़ा रह, मैंने मना किया है क्या? मैंने उस लड़के को गौर से देखा, गंगानगरी स्टाइल का कुरता पजामा पहना हुआ हट्टा कट्टा सा, घुटा हुआ सर और मुह में गुटका| शक्ल से ही टिपिकल अड़ियल जाट लग रहा था| अब भाई जैसा भी लगे, हम लोगो के होते हुए हमारे दोस्त को हाथ लगा दे, ऐसा कैसे हो सकता है? बस पीछे लाइन में से ही हम लोग भी चिल्ला पड़े – ओ नेता, समझ नहीं आ रही क्या बात? सुनते ही वो जाट भी सनक पड़ा| पीछे मेरे पास आकर खड़ा हो गया और कहता है – मन्ने समझाएगा तू.. समझा भाई.. के समझाएगा? साला दूर से जितना हट्टा कट्टा दिख रहा था उससे कही ज्यादा पास से लग रहा था और डरावना भी| गुटके का महक उसके बदन से आ रही थी| मेरी धड़कने थोड़ी तेज हो गयी और मैं कुछ सेकंड के लिए चुप हो गया और उसे देखता रहा|
उसने फिर मेरे को बोला – के हो गया भाई, साँप सूंघ गया के? ये कहते – 2 ही उसने मेरे कंधे पर हाथ रख के मुझे पीछे की तरफ धक्का दे दिया| मैं थोड़ा सा डरा होने के साथ गुस्से से भरा हुआ था, उसके मुह से गुटके की महक भी मुझे काफी इरिटेट कर रही थी| जैसे ही उसने धक्का लगाया, मैंने आव देखा न ताव और कस के दे मारा एक तमाचा उसके गाल पे| अपने स्कूल के दिनों में भी मैं तमाचा किंग था, जहाँ किसी से बहस हुई नहीं की मैं उठा के एक तमाचा जड़ देता और उसके बाद मेरे दोस्त सँभालते रहते थे|
यहाँ भी यही हुआ, जैसे ही उसने मेरे तमाचे के जवाब में अपना हाथ उठाया पीछे से उसे जयंत ने पकड़ लिया| पकड़ते ही मैंने उसके 2 और लगा दिए| कुछ भी कहो लड़का था वो तगड़ा| हमारा जयंत भी अच्छा खासा था और उसने एक झटके में खुद को जयंत से छुड़ा लिया और जवाबी हमला कर दिया| बस इसके बाद वो अकेला और हम 7-8 लोग उस पर पिल पड़े| जिस स्पीड से उसके हाथ चल रहे थे उससे ये तो साबित हो गया था की ये उसका रोज का काम है| शुरू के 1-1.5 मिनट तो वो हम सब पर भारी पड़ा लेकिन 7-8 के आगे कितनी देर टिकता| मैंने हमेशा फिल्मो में देखा था की 7-8 विलेन एक हीरो की पिटाई करने की कोशिश करते है और बाद में अकेला हीरो उनको पीटता है| पर ये असली जिंदगी थी और इसलिए कहानी भी उलटी| यहाँ एक विलेन को 7-8 हीरो पीट रहे थे| 5-7 मिनट ये ड्रामा चला और खिड़की के पास ग्राउंड का पूरा हिस्सा धूल से भर गया| इसके बाद काफी सारे जो दर्शक थे हिम्मत करके बीच बचाव को आ गए और जैसे तैसे उस जाट को हमसे छुड़ाया|
जाट छूटते ही बोला की यही रुको, मैं बताता हू तुम्हे| सालो तुमने धारीवाल पर हाथ उठाया है, अब तुम्हारी लाशें उठ्वाऊंगा यहाँ से| हमारे मीणा साहब ने ये सुनते ही उसके पिछवाड़े पर एक लात और जमा दी और बोले भाग मादर**
जैसे ही हम वापस खिड़की पर फॉर्म जमा कराने आये, अंदर बैठे सिंह साहब बोले – बेटा फॉर्म बाद में जमा कराना, अभी तो भागो वर्ना बहुत पिटोगे| धारीवाल था ये, छोडेगा नहीं तुम लोगो को| हमारे डेढ़ पसली के बना जी शेखावत साहब इस पर भड़क उठे| पूरा फ़िल्मी डाइलोग दे मारा – हुकम हम राजपूत है, किसी के बाप से नहीं डरते, आने दो साले को, उसकी माँ ** देंगे| सिंह साहब भी समझ गए की पत्थरो से माथा मार रहे है, बोले तुम्हारी मर्जी बना जी| (बना शब्द राजस्थान में राजपूत समुदाय के युवक एक दुसरे को इज्जत से बुलाने को करते है)
मेरे को कितना भी गुस्सा आया हो, काफी जल्दी ठंडा हो जाता है और मेरा लोजिकल दिमाग काम करना शुरू कर देता है| मुझे लगा की हम तो कॉलेज में नए है, इसलिए सिंह साहब की बात मान लेनी चाहिए| मैंने सबको कहा की फॉर्म कल जमा करेंगे, चलो कैंटीन में चलते है|
हमने कैंटीन में जाकर चाय का आर्डर दिया और फिर हम बाहर आकर खड़े हो गए| कैंटीन के साथ ही प्लेग्राउंड था और उसके पीछे कॉलेज का हॉस्टल| मैंने देखा की हॉस्टल के बाहर काफी सरे लड़के खड़े है हाथ में डंडे, लोहे के सरिये लेकर| हॉस्टल वालो का रोज का काम था बस वालो से लड़ना झगडना और बाद में उसकी बस के काँच सरियों से तोड़ देना| मैंने जयंत को कहा आज फिर चल दिए ये लोग फिर किसी को फोड़ने चल दिए| देखा तो ये सब हॉस्टल से बाहर जाने की बजाय कॉलेज की तरफ ही आ रहे है| इतने में वोही जाट धारीवाल भी उस झुण्ड में दिखा, अपने हाथ में एक नंगी तलवार लिए वो एक स्कूटर के पीछे बैठ कर कॉलेज की तरफ चल पड़ा| उसे तलवार के साथ देखते ही मेरे और जयंत के होश उड़ गये| हमारे मुह से एक साथ एक ही शब्द निकला – भागो| हमारे पास एक स्कूटर, एक हीरो पुक, और बना जी जीप थी| बना जी की जीप भी राजस्थान के शाही इतिहास की तरह उतनी ही पुरानी थी| शुक्र है बना जी की जीप कभी पुरातत्व विभाग वालो ने नहीं देखी वरना उसे हेरिटेज घोषित कर देते|बना जी की बोले जीप में बैठो| यु तो बना जी की जीप कभी एक बार में स्टार्ट नहीं होती पर उस दिन हो गयी| इसके बावजूद किसी ने भी जीप में बैठने का खतरा मोल नहीं लिया| हम 4 लोग जयंत के स्कूटर पर और 3 मुकेश की हीरो पुक पर बैठ कर और बना जी अपनी जीप में वहाँ से भागे|
शाम को हमने पता लगाने की कोशिश की कि ये लड़का था कौन? हमारे छात्र परिषद के एक नेता जो मेरे राजनीतिक सलाहकार भी थे उनको बोला| वो पता करके आये और बोले सालो और कोई नहीं मिला था तुम्हे लड़ने को| वो बहुत बड़ा गुंडा है, उस पर कई सारे मुक़दमे भी दर्ज हो रखे है| जमीन पर कब्ज़ा करने वालो के काम करता है वो| किसी कि सुनता नहीं| अब हमारी फटी, कि गुरु अब करेंगे क्या? उसको जाके बोल दे कि भैया सॉरी, गलती हो गयी, आप तो हमारे बड़े भाई हो| पर बिना गलती माफ़ी मांगना मेरे और जयंत के सिद्धांत के खिलाफ था| बना जी जो उसकी ईट बजाने वाले थे वो भी एकदम चुपचाप बैठ गए|
अब एक ही तरीका बचा था हमारे पास और वो था कि हम यूनिवर्सिटी के छात्र संघ अध्यक्ष को पकड़े| छात्र संघ अध्यक्ष भी एक राजनीतिक परिवार से संबद्ध था, बड़ा गुंडा था| यूनिवर्सिटी का पहला जाट अध्यक्ष होने के नाते उसे जाट नेता भी मान लिया गया था| राजस्थान में जाट राजपूत की आपस में बनती नहीं और इससे पहले के अध्यक्ष या तो ब्राह्मण थे या राजपूत| और ब्राह्मणों का झुकाव भी राजपूतो की तरफ ज्यादा था| इस सारे परिदृश्य में महेंद्र चौधरी ने अध्यक्ष बन के जाट छात्रों में काफी सम्मान कायम कर लिया था|
पर हमारी समस्या और गंभीर थी| महेंद्र चौधरी चुनावो में हमारी पार्टी का विरोधी था और हमारे कॉलेज में हमने उसकी मिटटी खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी| अब उससे बात किस मुह से करे? ऐसे में हमारी मदद को हमारे कॉलेज के एक और जाट नेता भारत सिनसिनवार सामने आया| भारत हमारे कॉलेज के अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था पर हार गया था| वो थोडा शरीफ जाट था इसलिए हमने उसे नैतिक तौर पर चुनाव में समर्थन दिया था| भारत ने कहा की वो महेंद्र चौधरी से बात करेगा| उसने बात की और महेंद्र चौधरी हमारी मदद करने को मान गया| पर उसकी एक शर्त थी की जब छात्र संघ की बजट मीटिंग हो तो मैं उसे समर्थन दू| छात्र संघ का बजट एम्.पी. लोगो के वोट से ही पास होता था| यु तो एम्.पी. के चुनाव में कोई पार्टी से नहीं लड़ता लेकिन पार्टियाँ अपने कार्यकर्ताओ को चुनाव लड़ने को कह देती है| इस बार छात्र परिषद के बहुत सारे सदस्य एम्.पी. बने थे| महेंद्र चौधरी को चिंता थी की कही वो लोग बजट पास होने में रूकावट डालेंगे| मैं इस सौदे के खिलाफ था| मेरे राजनीतिक सलाहकार राजेंद्र पारीक जी ने कहा की तू एक काम कर, अभी हां कर दे| एक बार बचो, फिर देखते है| बजट तो वो जैसे तैसे पास करवा ही लेगा, फिर कौन सा उसे याद रहेगा की तूने उसे समर्थन दिया या नहीं| और अगर समर्थन देना भी पद गया तो अभी तू पार्टी में भी नया है एक दिन के लिए उसके साथ हो भी गया तो कुछ नहीं होगा|
मरता क्या न करता| हमारे पास और कोई चारा नहीं था| मैंने इस सौदे को हां कह दी| उसी दिन रात को महेंद्र चौधरी ने धारीवाल को और हमें आमने सामने बुला के बिठा दिया| धारीवाल तो मुझे देखते ही मारने को दौड़ा पर उसे लोगो ने रोक लिया| वो किसी तरह हमें छोड़ने को तैयार ही नहीं था| आखिर में महेंद्र चौधरी ने कड़ाई से उसे कहा की एक बार कह दिया की इन लडको को कोई कुछ नहीं कहेगा तो नहीं कहेगा| अब अगर तुने या किसी और ने भी इनसे कुछ भी कहा तो उससे मेरी निजी दुश्मनी हो जायेगी| इस बात ने काम किया और धारीवाल शांत हुआ| पास आकर बोला, चल जा ऐश कर और हा सालो तुम सब ऐसे ही इकट्ठे रहना| कोई तुम्हारा कुछ नहीं उखाड पायेगा|
अगले दिन हम कॉलेज पहुचे और धारीवाल भी| नजरे मिली, पास आये और मुस्कुरा कर निकल गए| लोगो ने देखा की कुछ नहीं हुआ, और इसके साथ ही हमारा के.वी. स्कूल का आया हुआ ग्रुप पूरी तरह से कॉलेज में हिट हो गया| उसके बाद के 2 सालो में हमारे खिलाफ कभी भी कोई आवाज नहीं उठी| अंदर से हमारी क्या हालत हुई थी ये तो हम ही जानते है मगर बाहरवालो की नजर में हम शेर थे| शायद ऐसी ही किसी परिस्थिति में आये हुए आदमी को तीस मार खां कहा जाता है|
वैसे कहते है की बुराई का रास्ता ठीक नहीं होता| धारीवाल की गुंडागर्दी के बावजूद उसकी पहुच की वजह से उसे हॉस्टल से नहीं निकाला गया| वार्डेन भी उसे समर्थन देते थे| कुछ समय बाद धारीवाल ने हॉस्टल में ही एक छात्र की सरियों से पीट पीट कर हत्या कर दी| इन दिनों धारीवाल आजीवन कारावास की सजा काट रहा है| कहते है जब कोई बड़ा जमीन का मसला होता है तो धारीवाल पेरोल पर बाहर दिखता है और मसले सुलझ जाते है|



7 Responses to तीस मार खां
Jitu
October 29th, 2010 at 6:38 am
Naveen ji… kabhi ham milein… toh zara aapnein apaan aage karr dijiyega. Ham bhii paanv chukar dhanya ho jayein. Aise tees maar khaan ka se ham pehle kabhii mile nahin.
Baba Naveenand kii Jai!!
Jitu
October 29th, 2010 at 6:39 am
* apnein paanv
chandan
October 29th, 2010 at 6:54 am
Sahi hai sirji, college ki yadein taaza kar di aapne. Dubara campus jaane ka aur purane adawat ko hawa dena ka mann kar raha hai….
Waise Bana Ji kya kar rahe hai aajkal aur unki jeep kaisi hai?
aman
October 29th, 2010 at 7:01 am
well written naveen ji…
was pleasure reading it..!!
safdar
October 30th, 2010 at 5:00 am
RAAJNEETI kafi kuch seekhati hai….. zindagi ka yeh ek aur rang dikha gayi aap ko…… well written, remind me of my college dayzzz…….
Rakesh Rai
November 7th, 2010 at 5:20 am
very well written..bhai
love ur talent!! keep it up up.:)
tez
September 13th, 2011 at 7:25 pm
न्यु के कर रे थे बावले भाई