जेल यात्रा

 

जून का महीना. सुबह 7.30 का समय. फोन की घंटी बजी और कुछ सेकंड के बाद पापा की आवाज़ आई “नवीन, तुम्हारा फोन”. फोन उठाया तो छात्र संगठन के जयपुर प्रभारी दूसरी तरफ थे. बोले – नवीन जी, नमस्कार. परीक्षाए समाप्त हो गयी? मैंने कहा- जी हां. अब छुट्टियाँ. वो बोले – फिर नवीन जी, अब वापस से संगठन के काम में लग जाइये. आज वाइस-चांसलर के खिलाफ आपके कॉलेज में धरना है. 10 बजे पहुच जाइये, अपने साथियो के साथ.

मैंने, अपने दोस्तों जयंत और रितेश के साथ फिल्म देखने जाने वाला था. मैने दोनों को फोन किया और कॉलेज पहुचने को कहा. कॉलेज पहुचे तो पता चला की वाइस-चांसलर राज्यपाल (गवर्नर) से मिलने गए है अभी – अभी.

ओह, मैं बताना भूल गया. मैं उन दिनों एक राष्ट्रीय छात्र संगठन के साथ जुड़ा हुआ था. और हमारा संगठन उन दिनों विश्वविद्यालय के कुलपति के खिलाफ आंदोलन चलाये हुए था. ये आंदोलन काफी लंबा चला था और बाद में कुलपति को हटाया भी गया था. कुलपति पर काफी भ्रष्टाचार के आरोप थे और उनके राज में काफी धांधलियाँ हुई, नियुक्तियों से लेकर परीक्षा परिणामों तक. उनके समय में विश्वविद्यालय में राजनैतिक हस्तक्षेप भी काफी बढ़ गया था.

जैसे ही कुलपति के गवर्नर हाउस जाने की खबर आई, हमारे वरिष्ठ नेता ने तय किया की हम गवर्नर हाउस पर प्रदर्शन करेंगे और धारा 144 तोड़ेंगे. ये योजना हमें उस वक़्त नहीं बताई गयी. हमें कही और चलने का नाम लेकर गए और सिविल लाइन पहुच कर ही बताया गया की योजना क्या है. कुछ दिनों पहले छात्र नेताओ ने ऐसा करके गिरफ़्तारियाँ दी थी और उन्हें शाम तक छोड़ दिया गया था. उस समय मेरी परीक्षाए चल रही थी इसलिए मै उसका हिस्सा नहीं था. ऐसा हो चुका था पहले इसलिए दर भी नहीं लगा. मै पहले 1-2 आंदोलनों में हिस्सा ले चुका था पर कोई भी इस स्तर का नहीं था इसलिए मै काफी उत्सुक था देखने को की आज होता क्या है.

हम लोग अलग-अलग 2-3 लोग करके चलने लगे और राजभवन (गवर्नर हाउस) के सामने आकर इकट्ठे होकर गेट पर हमला बोल दिया. पिछली बार हमारे कुछ नेता धक्का मुक्की में अंदर पहुच गए थे. इस बार सुरक्षा काफी ज्यादा थी. हमें इकट्ठा होते देख बहुत तेजी से गार्ड्स ने गेट बंद कर दिया. हमने कुलपति के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी. 3-4 मिनट के अंदर पुलिस की जीप पहुच गयी. उन लोगो ने हमें हटाने की कोशिश शुरू कर दी. उन दिनों राज्य सरकार उसी पार्टी की थी जिससे हमारा संगठन जुड़ा हुआ था. इस चीज का प्रभाव हमेशा पुलिस पर होता है. इसलिए पुलिस ने हमपर डंडे नहीं चलाये बल्कि हमें हटाने की कोशिश की. अगर यहाँ सरकार दूसरी पार्टी की होती तो अब तक लाठीचार्ज शुरू हो गया होता.

हमारे नेता चाहते थे की पुलिस लाठीचार्ज करे किसी भी तरह ताकि अगले दिन ये मुद्दा अखबारों में ज्यादा उछले. इसलिए हमारे कुछ वरिष्ठ नेताओं ने पुलिस अधिकारियों के साथ धक्का मुक्की शुरू कर दी. डीएसपी साहब के तो स्टार इस खीचातानी में उतर गए. इस पर भी पुलिस वालो ने डंडे नहीं चलाये. उन्होंने 2-3 जिप्सिया और जीप मंगवा ली और हम सब को पकड़ कर उसमे डालना शुरू किया. हर बार यही होता है, पुलिस पकडती है और कुछ घंटे में छोड़ देती है या कई बार शहर के बाहर छोड़ आती है. फिर आप पैदल आते रहिये.

हमारे कई साथी गिरफ़्तारियाँ होते देख वहा से खिसक लिए, पर हम ग्रुप के साथ ही रहे. हम भी गिरफ्तार हुए और हमें पास के थाने में ले जाया गया और एक बड़े हॉल में बंद कर दिया गया. हम 40-45 लोग वहा गए थे पर गिरफ्तार 21 ही हुए. बाकि के मौका देख कर वहाँ से भाग निकले. थाने पहुच कर हमने इंस्पेक्टर को कहा की हमें फोन कर लेने दे. पर वो सारे अपने साथ हुई बदसलूकी से काफी गुस्से में थे और हमें फोन करने की इज़ाजत नहीं मिली. उन दिनों मोबाइल फोन नहीं हुआ करते थे. हम लोग जब भी ऐसा कुछ बड़ा करते तो कुछ लोग जो परदे के पीछे से संगठन को संभाले हुए थे वो आकर छुडवा लिया करते थे. इस बार हमारी ये योजना अचानक ही बनी थी इसलिए किसी को भी पता नहीं था की हम लोग कहा है और क्या हुआ. और ये पुलिस वाले हमें किसी को बताने भी नहीं दे रहे थे. हमने एक हवलदार को कुछ पैसे देकर कहा की बाहर जाकर फोन करके सूचना दे दे. वो भी कमीना निकला, उसने फोन नहीं किया और बोला की कह दिया है जी.

दिन भर तो काफी मस्ती में निकला पर जैसे जैसे शाम होने लगी हमें चिंता होने लगी की अब होगा क्या? हम तीनो दोस्तों को छोड़ कर बाकि सब मस्त थे. होते भी क्यों नहीं, अधिकतर या तो होस्टल में रहते थे या काफी बड़े छात्र नेता थे. उनके लिए ये सब बढ़िया ही था क्योकि पब्लिसिटी अच्छी मिल जाती.  

शाम 6 बजे के करीब एक खूबसूरत सी लड़की आई थाने में. जिस कमरे में हम सब बंद थे, उसी की तरफ बढती दिखी. उसको हमारी तरफ आते देख कर बहुत सारे तथाकथित राष्ट्रवादी और सिद्धांतप्रिय नेताओ की आह निकल गयी.

लड़की अंदर आई. वो CJM (megistrate) थी. थानेदार साहब ने उसे एक रजिस्टर दिया. उसने उसमे से हम सब के नाम पुकारे. उसके बाद कहा – “Send to JC”. और चली गयी..

हमारे नेता लोग खुश. कहने लगे चलो भाई JC हो गयी. कुछ दिन ऐश करे. हम तीनो दोस्त समझ नहीं पाए की JC है क्या? पूछा तो जवाब मिला “जयपुर सेंट्रल”. मैंने कहा ये क्या है? इस सवाल पर मेरे वरिष्ठ साथी हसने लगे जैसे मैंने पूछ लिया हो की मेलोडी इतनी चोकलेटी क्यों है? जवाब मिला “JC माने जयपुर सेंट्रल जेल”..

सुनते ही हम तीनो एकदम सकते में आ गए. हमारे घर पर हमारी इस छात्र राजनीति से जुड़े होने के बारे खास कुछ पता नहीं था. हमारी समझ में नहीं आ रहा था की क्या करे?

कुछ समझते तब तक पुलिस का नीले रंग वाला ट्रक आ चुका था और हम लोगो को उस ट्रक में भर दिया गया. ट्रक चलने के साथ हमारी उम्मीद टूटने लगी और हम काफी डर गए थे. डर जेल जाने का नहीं था बल्कि इस बात का था की घर वालो को क्या कहेंगे. जैसे ही ट्रक चला तो हमारे नेताओ ने नारे लगाने शुरू कर दिए “ये दीवाने कहा चले, जेल चले भाई जेल चले.” आमतौर पर मै ऐसे मौको पर खूब मस्ती करता था और इस सबका हिस्सा होता था, पर आज इस जेल के चक्कर में ये सब कुछ खराब लग रहा था.

सेंट्रल जेल पहुचने के साथ हमारी उम्मीद बिलकुल टूट चुकी थी. समझ नहीं आ रहा था की अब क्या करे? हमें कहा गया की हम अपने घर फोन कर सकते है. हम तीनो में से किसी की भी हिम्मत नहीं थी की अपने घर पर फोन करे. अब समस्या ये की फोन नहीं करेंगे तो घरवाले रात भर ढूंढते रहेंगे. फिर हमने अपने एक दोस्त को फोन करके बता दिया. ज्यादा बात नहीं करने दी गयी इसलिए सिर्फ इतना बता पाए की हम जेल में है. चिंता मत करना, कोई बड़ी बात नहीं है.. सुनते ही दोस्त भी सन्न रह गया. बोला तुम्हारे घर पर क्या बोलू? मैंने कहा “तू देख ले”

हम सबको एक बैरक में भेज दिया गया. जैसे ही हम अंदर पहुचे, कई सारे मोरो की आवाज आ रही थी. मोर की आवाज ऐसी लग रही थी जैसे वो हमारा स्वागत करता हुआ कह रहा है “आओ आओ”..

और यहाँ से शुरू हुई हमारी ३६ घंटे की जेल यात्रा. जेल के अंदर क्या हुआ और कैसा रहा हम कैसे छूटे इसके लिए पढ़िए अगला भाग “जेल में वो 36 घंटे” का.

जेल यात्रा

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5 thoughts on “जेल यात्रा

  1. OMG Naveen kitne chapters hai tumhari life main…very interesting…waiting for another one…Baba Naveenanand ko samajhna mushkil hee nahin namumkin hai…:)

  2. Awesome!!! Unbelievable!! mujhe samjh nahi arha kahun akya apne Boss ki bahaduri ke is kisse par…but seriously, I Liked it sir!! Thumps up!

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