June 3, 2010 | In: student-politics

जेल में वो 36 घंटे

Written by Naveen Choudhary on June 3, 2010 – 12:28 pm -

जेल में वो 36 घंटे

 

पिछले भाग “जेल यात्रा” में आपने पढ़ा की हम कैसे जेल पहुचे.. अब आगे..

फोन करने के बाद हम सबको एक बहुत बड़े से दरवाजे में बने हुए छोटे से दरवाजे से अंदर भेज दिया गया. जेल में बहुत सारे मोर थे. जैसे ही हम अंदर पहुचे, कई सारे मोरो की आवाज आ रही थी. मोर की पिहू ऐसी लग रही थी जैसे वो हमारा स्वागत करता हुआ कह रहा है “आओ आओ”.

हमें एक बैरक में भेजा गया उस बैरक के बाहर लिखा हुआ था “नशा मुक्ति गृह”. सही था, हम सब राजनीती के नशे में थे. बैरक एक बहुत ऊंची चारदीवारी अंदर थी. यहाँ भी एक बड़ा दरवाजा था जिससे हम अंदर दाखिल हुए. चारदीवारी के अंदर खुला सा छोटा मैदान था उसके बीच में बैरक थी और एक तरफ गुसलखाने बने हुए थे. वहा पहले से कुछ कैदी थे जो बैरक के बाहर उसी चारदीवारी के अंदर घूम रहे थे. बैरक में 2 बड़े कमरे थे. एक कमरे में 20-25 आदमी सो सकते थे. हम लोगो को एक कमरा दे दिया गया. दुसरे कमरे में और कैदी थे. ये सभी कैदी नशीले पदार्थो के सेवन या बेचने के आरोप में बंद थे. कुछ कैदी चोरी के आरोप में भी थे.

अंदर हम लोगो को अल्युमिनियम की प्लेट, कटोरी और मग पकड़ा दिए गए. फिर एक बड़ी सी टोकरी में बहुत सारी रोटियाँ और एक बड़े भगोने में काली दाल आई. हमने वही खाना खाया. जेलर साहब का हमारे संगठन के प्रति झुकाव था इसलिए हमें रोटियां पूरी तरह से पकी हुई मिल गयी. बर्तन धोने के लिए भी उन्होंने बाकि के कैदियों को कह दिया.

इसके बाद हम सबको लाइन में खड़ा करके गिनती की गयी और अपने सेल में भेज दिया गया. अंदर एक कम्बल, और 2 चादर रखी हुई थी. उसी को जमीन पर बिछा कर हम सो गए. इतने सारे लोग उस एक कमरे में थे. एक तो गर्मी का मौसम ऊपर से इतने लोग, कमरे में उमस बढ़ गयी थी. हमारा दरवाजा बाहर से बंद कर दिया गया था. एक छोटा सा वाशरूम भी अंदर था, जिसके नल में पानी नहीं आता था. सोचो रात को किसी का पेट खराब हो जाये तो क्या करेगा.  

जेलर साब ने कैरम बोर्ड अंदर भिजवा दिया था. हमारे सारे बड़े नेता उधर व्यस्त हो गए. उन्हें देख कर तो लग रहा था की वो लोग पिकनिक पर आये हुए है. हम चिंता में मग्न होकर सोने की कोशिश करने लगे. पर जमीन पर सोना, गर्मी और इन सबका शोर. नींद ही नहीं आ रही थी. यही सोचते रहे की घर पर क्या हो रहा होगा क्या कर रहे होंगे. पापा के तो गुस्से का कोई ठिकाना ही नहीं होगा, माँ रो रही होगी… यही सोचते हुए पता नहीं कब आँख लग गयी.

सुबह 5 बजे सीटी की आवाज से नींद खुली. देखा तो 2 जेल कर्मचारी खड़े है. उन्होंने हम सब को बाहर बुलाया और एक बार फिर सबकी गिनती हुई. ब्रश करने के लिए तो कुछ था नहीं, इसलिए नीम की टहनियाँ तोड़ कर उनका दातुन बनाया गया. दातुन के बाद एक बड़े भगोने में रंगहीन, कम दूध वाली पतली सी चाय आई. साथ में थे चने. हमारे हॉस्टल में रहने वालो को तो ये चाय बहुत ही अच्छी लगी पर मेरे लिए आधी कप चाय पीना भी दूभर हो गया. एक तो गन्दा स्वाद, ऊपर से अल्युमिनियम के मग. कुल मिला के सुबह की चाय पीने का माहौल ही नहीं बना.

एक बड़े नेता रात से ही मुझे देख रहे थे. इन दिनों वो हमारे शहर के उप-महापौर (डेपुटी-मेयर) है. उन्होंने कहा की देख बेटा, तू कोई अपराधी तो है नहीं. तो तू चिंता क्यों कर रहा है. घर पर जो होना है वो तो तेरे छूटने के बाद ही होगा. ये जेल नहीं है, पिकनिक समझ इसको. आज हम लोग छूट जायेंगे. तब तक ऐश कर. यहाँ जो लोग है, वो सब यूनिवर्सिटी के बड़े नेता है. सबसे बाते कर, छात्र राजनीती में आया है तो इसका मजा ले. परेशान मत हो.

उनकी बातो का बहुत असर हुआ मुझ पर. सही है, अब घर पर जो होना है वो तो बाद में ही होगा. ये अनोखा अनुभव है. तो मुझे इस मौके का फायदा तो उठाना ही चाहिए. बाद में जो होगा तब देखेंगे. वो दिन है और आज का दिन है, मैंने कभी भी अपनी जिंदगी में आने वाले समय की चिंता में आज खराब नहीं किया. मै आज को जीता हू.

इन 21 लोगो में सिर्फ हम 3 ही छोटे बच्चे थे जो कॉलेज के थे. बाकि सब यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले बड़े नेता थे. इन सबके नाम अखबार में अक्सर छपा करते थे. मै इन सब से बात करने में हिचकिचाता था. मेरे अंदर इतना ज्यादा आत्मविश्वास नहीं हुआ करता था. मुझे लगता था ये सब बड़े लोग है, मै इनसे क्या बात करूँगा. पहले जब भी हम लोग इकट्ठे होते थे तो मै अपने समवय से ही बात किया करता था या फिर संगठन मंत्री से जो हमें इस संगठन में लाये थे. खैर मैंने 1-2 से बात करनी शुरू की तो सब ने अच्छे से बात की. मुझे बातचीत के दौरान ही पता चला की मेरे बारे में ये लोग काफी कुछ जानते है, और मुझे मेरे कॉलेज के प्रभावशाली और दबंग छात्रों में गिनते है. मेरी और जयंत की हमारे कॉलेज में सुनी जाती थी पर उसके बारे में सब जानते ये हमें नहीं पता था. दरअसल एक मारपीट की घटना हुई थी कॉलेज के शुरुआती दिनों में. उस घटना से हमारा केंद्रीय विद्यालय से आया ग्रुप चर्चा में आया था. मै और जयंत उस ग्रुप के मुखिया थे इसलिए हम दबंगों में आ गए. उस घटना के बारे में फिर कभी बताउंगा.

मैंने देखा की ये सभी छात्र नेता भी हम तीनो से घुलना मिलना चाहते थे. किसी भी राजनैतिक दल में असली राजनीती तो दल के भीतर ही चलती है. एक दुसरे को काटना, अपने समर्थक पार्टी में बढाना, प्रभावशाली लोगो को अपने साथ रखना ही इन सब का उद्देश्य होता है. मेरे कॉलेज में हमारा संगठन कमजोर हुआ करता था. चुनावो में इनको कई बार कॉलेज में घुसने ही नहीं दिया जाता था प्रचार के लिए. हम लोगो ने जब से कमान संभाली हमारे कॉलेज की, तब से स्थिति काफी अच्छी थी. यही वजह थी सभी नेता चाहते थे की हम उनके साथ जुड जाये.

कुछ चीजे बड़ी साफ़ होने लगी थी. मुझे खुद अपनी इस स्थिति का अंदाजा नहीं था. मेरा आत्मविश्वास बढा. मुझे अब मजा आने लगा इन सबके साथ. मै जो एक घंटे पहले तक सहमा दुबका हुआ सा अपने २ दोस्तों के साथ ही था, वो अब सभी के साथ हसी मजाक कर रहा था. घर की चिंता भूल चुका था.

थोड़ी देर में दीर्घशंका की स्थिति उत्पन्न हुई. मै टायलेट गया, वो इतना गन्दा था की पूछो मत. मै वापस आ गया. वैसे भी थोड़ी देर में तो छूटने ही वाले थे. करीब 8 बजे सुबह हमारे पास खबर आई की हमारा संगठन हमें कुछ दिन जेल में ही रहने देना चाहता है ताकि सरकार पर दबाव और बढ़ाया जा सके. इधर मेरे पिताजी भी जेल आये थे, और जेलर से मिलकर वापस चले गए.

फिर 1 घंटे बाद खबर आई की मेरे पिताजी ने मेरे संगठन वालो पर भारती भवन से दबाव डलवाया है की लडको को छुड़ाओ वर्ना मै अपने बेटे के लिए अलग से जमानत करवा दूँगा. मेरे पिताजी बड़े शिक्षाविद है और उन्हें बहुत सारे नेता, मंत्री और अधिकारी जानते है. इस घटना से भी उस ग्रुप में मेरी पूछ और बढ़ गयी क्योकि मेरे पिताजी को संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी जानते थे. हमारे संगठन का परोक्ष रूप से संचालन तो भारती भवन (संघ का दफ्तर) ही करता था. 

दोपहर का खाना आ चुका था, पर मैंने खाया नहीं. सुबह फ्रेश न हो सकने के कारण खाना खाने की हिम्मत नहीं पड़ी. उम्मीद थी की 1-2 घंटे में जमानत तो हो ही जानी है इसलिए अब जो भी खाना है चाहे वो डाट हो, या पिटाई ही या खाना अब घर जाके ही खाऊंगा.

मोर अभी भी बोल रहे थे. ध्यान से सुनने पे लग रहा था की कह रहे है “मत जाओ, मत जाओ”. थोड़ी ही देर में खबर आई की हमारी जमानत याचिका पर चर्चा शुरू ही नहीं हो पाई है किसी और केस की सुनवाई के कारण.

अब तो मेरा बुरा हाल था. प्रेशर बना हुआ था. जैसे तैसे नाक बंद करके मै उन गंदे टायलेट में घुस गया. मेरी जिंदगी के सबसे गंदे अनुभवों में से ये एक था. मै आज भी सोचता हू की ये बिचारे कैदी कैसे यहाँ रहते है. कैसे इस गंदगी को झेलते है.

सभी कैदियों को सुबह 5 बजे से शाम 5 बजे तक चारदीवारी के अंदर घूमने की इज़ाजत होती है. शाम 5 से 7 बजे तक चारदीवारी का दरवाजा खोल दिया जाता है और कैदी जेल परिसर में घूम सकते है.

5 बजे दरवाजा खोला गया तो हम भी बाहर आये. बाहर मैदान में वोलीबाल खेलने की सुविधा थी. मैंने सोचा की इस मौके पर जो कैदी दिख रहे है उनसे बात करू. सभी कैदियों को पता था की कॉलेज वाले लड़के भी बंद है आज. मैंने एक से पुछा की भैया तुम क्यों अंदर आये. वो कहता है जी बस एक को चाकू मार दिया था, मर गया. उसने इतने आराम से चाकू मारने की बात कही जैसे किसी आदमी को नहीं मारा हो बल्कि सब्जी काटी हो. कुछ गाव के लोग भी थे. उनमे से कई तो बिना वजह फसे हुए थे. किसी की जमानत दी और वो भाग गया. किसी गलत कागज़ पर साईंन कर दिए. ऐसे कई लोग थे. कुछ ऐसे भी थे जो थे तो मामूली अपराध में पर कोई जमानत देने वाला नहीं था.

मै 4 ऐसे लोगो से भी मिला जो शहर के में हुई दो बड़ी हत्याओ के आरोपी थे. उनमे से एक मनीष दीक्षित था. क्या डेशिंग बंदा था. किसी साउथ की फिल्म का हीरो लगता था. मनीष दीक्षित का नाम इसलिए लिखा है क्योकि इस छात्र राजनीती के खेल में उसका भी बड़ा रोल था.

इस सब में शाम के 7 बज गए और हम वापस अपनी कोठरी में पहुच गए. जमानत नहीं हुई थी. मन उदास हो चला था. पर इस बार मोरो की पिहू थोड़ी अलग थी. इस बार उनकी आवाज सुन के लगा की कह रहे है “जाओ, जाओ”. पर कैसे, जमानत तो हुई नहीं. रात को खाना खाते समय जेलर साहब आये और बोले की सुबह छूट जाओगे, जमानत हो गयी है. जज साहब के घर जाकर जमानत के कागजो पर साइन करा लिए गए थे.

सुबह 7 बजे हमें छोड़ दिया गया. घर पंहुचा, माँ को तो रोकर बुरा हाल था. कॉलोनी के लोग भी आ गए थे. पापा आये, मुझे लगा की अब पिटाई हुई बेटा. पर वो मुस्कुराने लगे, पूछते है की रोटियाँ हजम हुई जेल की या नहीं. मैंने तुरंत माफ़ी मांगी. वो बोले कोई बात नहीं. जो हुआ सो हुआ. ये सब जो तुम्हारे साथ थे ये सब पैसे वाले घरों के लड़के है. इनको तो नेतागिरी से फायदा ही होना है. तुम एक प्रोफेसर के बेटे हो. तुम्हे जिंदगी में जो भी बनना है वो अपनि मेहनत और पढाई के दम पर ही बनना है. अब बड़े हो गए हो, और कुछ नहीं कहूँगा. जो करोसोच समझ कर करो.  

2 दिन बाद विधानसभा का घेराव था हमारे संगठन द्वारा. पापा ने कहा जाओगे? मैंने कहा – ना जी. पिछली बार बच गए थे डंडे खाने से इस बार जरूर पड़ जायेंगे.

ये पूरी घटना देख के तो एक मामूली सी छात्र आन्दोलन की घटना लगती है, पर ऐसा नहीं था. राजनीती में और अंदर घुसने पर कुछ सालो बाद पता चला की हम लोग तो मुख्यमंत्री और उच्च शिक्षा मंत्री के बीच फूटबाल बने हुए थे. उनकी आपस में नहीं बनती थी और ये सारा आंदोलन मुख्यमंत्री द्वारा प्रायोजित था. असली खेल तो ऊपर चल रहा था और हम सिर्फ मोहरे थे.

इस जेल यात्रा में मुझ पर बहुत प्रभाव डाला. मै संगठन के प्रमुख कार्यकर्ताओ में आ गया. मेरी राय अहम हो उठी. मुझमे आत्मविश्वास बढा. 10 लोगो के सामने खड़ा होकर अपनी बात कहने का साहस आ गया. जयंत मेरे साथ रहा इस पूरे दौर में. उसके बिना ये सफर मुश्किल था. रितेश के परिवार ने उसका हम सबसे मिलने पर रोक लगा दी और वो अपने घर के बिजनेस में लग गया. रितेश से उसके घर पर उस घटना के २ साल तक हम लोग नहीं गए.

ये कहानी मैंने बीच में से शुरू कर दी. मै इस सब में घुसा कैसे और कैसे मैं चुनाव लड़ा, किस तरह के अनुभव हुए, इन सबके बारे में लिखूंगा सिलसिलेवार. पढते रहिये और अपने विचार जरूर बताइए.

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5 Responses to जेल में वो 36 घंटे

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जेल यात्रा | Naveen Choudhary

June 3rd, 2010 at 12:32 pm

[...] हम कैसे छूटे इसके लिए पढ़िए अगला भाग “जेल में वो 36 घंटे” का. Share and [...]

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AS Raghuanth

June 3rd, 2010 at 12:52 pm

अच्छा संस्मरण है और रोचक भी.
जेल यात्रा को अब भी भुनाया जा सकता है. तुम्हारे जेल यात्रा के संगी-साथी जो अब नेतागिरी में प्रमोट हो कर मंत्री-संत्री बन बैठे होंगे, उनसे एंठने का यही सही वक्त है!
राजनीति में भले सक्रिय न रहो, पर राजनीतिज्ञों में सक्रिय रहो.

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shweta

June 4th, 2010 at 6:09 am

kaisa anubhav raha hoga….padne par to bahut aasaan lagta hai…par tumpe to wo sab beeta hai…1-1 shabd ,baat bahut saaf hai…..I like your father’s reaction…

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chandan

June 17th, 2010 at 12:24 pm

Both part were in sync with each other..never lost grip. Keep sharing

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Rashmi keshri

August 1st, 2010 at 3:14 pm

काफी खुबसुरत अभिव्यक्ति!लगता है जैसे सारी घटनाऐ आँखो के सामने हो रही है।लिखना जारी रखे,हम इन्तजार मेँ है

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