पहला चुनाव और जातिवाद से परिचय 

 

पिछला भाग “छात्र राजनीती से परिचय” पढ़ने के लिए क्लिक करे – http://www.naveenchoudhary.com/mylife/student-politics/entry-to-politics.html

अब आगे:

अगले दिन हम चाय पीने कैंटीन पहुचे| राजेंद्र तिवारी वहाँ बैठा हुआ था|  उसने हमें देखते ही हाथ हिलाया और अपनी टेबल पर आने को इशारा किया| उसे देखते ही मुकेश बिफर पड़ा – यार उसके पास नहीं बैठेंगे, पकाएगा साला| मैंने कहा अब बुला रहा है तो चलना तो पड़ेगा न| मुकेश बोला तू जा, हम दूसरी टेबल पर बैठे है| मैं भी दोस्तों के साथ मस्ती के मूड में था और तिवारी के पास जाने का मन नहीं था पर पता नहीं क्या सोच कर मैंने सबसे कह दिया चल उसी के पास बैठते है, आज का चाय नाश्ता वही कराएगा| इस पर सब राजी हो गए| 

हम तिवारी के पास पहुचे| पहुचते ही उसने खुद हमारे लिए चाय का आर्डर दे दिया| मैंने कहा – तिवारी जी खली चाय से क्या होगा? ब्रेड पकोड़ा भी मंगवा दो| चाय और ब्रेड पकोड़े के साथ बाते शुरू हुई| हमने में से किसी ने उसे ज्यादा भाव नहीं दिया चाय आने के बाद| वो बीच बीच में मुझसे मेरे बारे में पूछता रहा| फिर मेरे गाँव और गोत्र के बारे में पूछा| मैंने कहा – तिवारी जी कोई लड़की है क्या नज़र में? शादी करवा रहे हो क्या मेरी? वो हसने लगा – नहीं भाई, अब छात्र राजनीती में आये हो तो इन सब का असर तो पड़ेगा ही| जैसे ही मैंने गाँव और गोत्र बताया तो चौंक पड़ा| भाई जब तू जात का ब्राह्मण है तो सरनेम चौधरी क्यों लिखता है? मैंने कहा क्योकि मेरे पिताजी लिखते है| वो बोला की अगर बदल सकता है तो बदल ले| नवीन शर्मा कर ले या अपना गोत्र लगा ले नवीन शांडिल्य| शांडिल्य ही लगा, इससे नाम थोडा भारी दिखता है| मैंने कहा की भाई साहब पर क्यों? मैंने नाम क्यों बदलना है? उसने पूछा की तुम छात्र परिषद् से क्यों जुड़े? मैंने कहा ऐसे ही| सोचा थोड़ी जान पहचान हो जाएगी और लोग जानने लगेंगे| तिवारी फिर पूछता है – क्यों चुनाव नहीं लड़ना? जयंत जो अब तक सारी बाते सुन रहा था, मेरी जगह जवाब उसने दिया – नहीं भाई, चुनाव लड़ना अपने बस की बात नहीं| ना तो हम लोग पैसे लगा सकते है और ना ही हमारी कोई जान पहचान है| मैंने कहा की हम जयंत को चुनाव लड़ा देंगे जब लड़ना होगा तो| उसे फ़ुटबाल प्लेयर होने की वजह से बहुत लोग जानते है| जयंत मुझे कहता है – क्यों मैं क्यों लडूंगा चुनाव? तू ही लड़ना| मैंने कहा – अबे अपन लड़ तो ऐसे रहे है जैसे सच में चुनाव लड़ने वाले है. तिवारी जी हमें चुनाव नहीं लड़ना| हम ऐसे ही खुश है| बस थोड़े लोग जानते हो कॉलेज में, इससे ज्यादा कुछ नहीं|  

 तिवारी फिर बोला – क्या चाहते हो लोग तुम्हे कैसे जाने? कॉलेज में ये भी है, या किसी बड़े नेता के पिछलग्गू या चमचे की तरह या तुम्हारी अपने नाम से? अपनी पहचान बनानी है तो चुनाव लड़ो, बाकि तुम्हारी इच्छा| मैंने कहा – छोडो तिवारी जी, और बताओ क्या चल रहा है, कहा रहते हो| फिर इसी तरह की गुफ्तगू होती रही| तिवारी जी जाने लगे, तो मैंने कहा तिवारी जी बिल देते जाना| तिवारी मुस्कुराया और कैंटीन वाले को बोला – शर्मा जी, मेरे खाते में लिख देना| जब वो चलने लगा तो चलते चलते बोला की नवीन सोचना इस बारे में, और हाँ अगर मूड बने तो मैं यही कहूँगा की चुनाव तू लड़ना बाकि जयन्त भी अच्छा है|

तिवारी कह के निकल गया और मेरे दिमाग में कीड़ा छोड़ गया चुनाव का| मुझे लगा चुनाव लड़ सकता है कोई भी अपने ग्रुप में से| मैं या जयंत कोई भी|| अगले दिन मैंने जयंत से इस बात का ज़िक्र किया| वो बोला चौधरी अपन लोगो के बस के काम नहीं है यार ये| वैसे मुझे तिवारी की बात सही लगी की चमचे से अच्छा अपनी पहचान बनाओ| लेकिन भाई न तो अपन लोगो का ऐसा कोई बेकग्राउंड है, न अपने पास ज्यादा पैसे है, ना ही अपन गुंडे है| तुझे लगता है अपन के बस की बात है? फिर भी तुझे लड़ना है चुनाव तो देख ले, हम तो हैं ही तेरे साथ| मैंने कहा की भाई बात तेरी ठीक है पर कीड़ा छोड़ गया तिवारी| लेकिन मैं ये भी सोच रहा हूँ की वो सिर्फ अपन लोगो को ही ये बात क्यों कह रहा है? जयंत बोला – एक बार उससे मिलते है फिर देखते है| हम उससे मिलने कैंटीन पहुंचे| तिवारी वहाँ नहीं था| हमने आधा घंटा इंतज़ार किया पर वो आया नहीं| उस दिन रात को जब सोया तो मुझे रात को सपने में भी यही दिख रहा था की लोगो मेरे नाम के नारे लगा रहे है|

अगले दिन मैं सुबह ही कैंटीन में जाके बैठ गया| 10.15 बजे राजेंद्र तिवारी आता दिखा| मैंने उसके लिए चाय का आर्डर दे दिया| तिवारी आकर बैठा और बैठते ही मैंने पूछा – आप चुनाव लड़ने की कह रहे थे| आपको लगता है की हम चुनाव लड़ सकते है|

तिवारी बोला – क्यों नहीं?

मैंने पूछा – कैसे?

तिवारी – कॉलेज का लड़ना है या यूनिवर्सिटी का?

मैं – यूनिवर्सिटी अपने बस का कहाँ?

तिवारी – क्यों?

मैं – यूनिवर्सिटी बड़े लोगो का है और वैसे भी उसके लिए युनिवेर्सिटी में होना चाहिए, हम तो कॉलेज में है!!!

तिवारी – युनिवेर्सिटी अध्यक्ष और महासचिव का चुनाव यूनिवर्सिटी में पढने वाले लड़ते है और उपाध्यक्ष, संयुक्त सचिव के चुनाव के लिए यूनिवर्सिटी कॉलेज वाले तो तू उपाध्यक्ष या संयुक्त सचिव का चुनाव लड़ सकता है|

मैं – सही है| फिर तो यूनिवर्सिटी का ही चुनाव लड़ेंगे| पर कैसे? अभी तो हमें कोई जानता ही नहीं और छात्र परिषद् वाले भी हमें टिकट क्यों देंगे?

तिवारी – देंगे| तू थोड़े से काम कर, एक तो सरनाम चौधरी से हटा के पंडित वाला लगा|

मैं – चौधरी में क्या दिक्कत है?

तिवारी – तू जाट तो है नहीं, और ये बात जाटो को पता लग ही जाएगी, न तुझे वो लोग वोट देंगे और न ही ब्रह्मण|

मैं – पर उन्हें वोट तो मुझे देना है, जाट और ब्रह्मण कहा से आ गया?

तिवारी – भाई पोलिटिक्स है| कितने लोग तुझे जानेंगे| 500-1000, बाकि तो कास्ट देख कर ही वोट देंगे और इन 500-1000 में भी आधे अपनी कास्ट वाले को वोट देंगे| और थोड़ी बॉडी बना, बहुत पतला है तू|

मैं – तिवारी जी अपनी बॉडी देखी है? आपसे 1-2 किलो ही कम होऊंगा|

तिवारी – तभी तो मैं चुनाव नहीं लड़ता| यूनिवर्सिटी में शो ऑफ भी चाहिए|

मैं – तिवारी जी, फिर जयंत को चुनाव लड़वाते है| दिखता भी ठीक है बॉडी भी है| प्लेयर है इसलिए लोग उसे ज्यादा जानते है|

तिवारी – जयंत में सारी खूबियाँ है पर चुनाव तुझे लड़ना चाहिए| जयंत सबको साथ लेकर नहीं चल सकता और बहुत मूडी है|

तब तक जयंत भी आ गया| मैंने कहा की तिवारी जी कह रहे है की जयंत को चुनाव लड़ाओ|

जयंत – हटा| तुने लड़ना है तो लड़, हम साथ है, मैं नहीं लड़ता चुनाव|

तिवारी – तू ही चुनाव नवीन|

मैं – ठीक है टिकट दिलवाओ| लड़े तो यूनिवर्सिटी का लड़े|

तिवारी – उसके लिए 1-2 साल मेहनत करो कॉलेज में|

मैं – साहब चुनाव लड़ने का मूड तो अभी बन गया है, इसी साल लड़ेंगे| चाहे हार जाये|

तिवारी – तू भी कम मूडी नहीं है| चुनाव लड़ना है तो जीतने के लिए लड़ो| और हारे भी तो ऐसे हारो की लोगो को याद तो रहे की तुम भी थे मैदान में| अभी तो कोई नहीं पहचानेगा|

मैं- ???

तिवारी – एक काम कर| एक पोस्ट होती है एम्.पी. की| 300 स्टुडेंट पर एक एम्.पी. सेलेक्ट होता है| अपने कॉलेज में 7 एम्.पी. चुने जाते है| तू उसका चुनाव लड़ ले| 7 में तो आ ही जायेगा, और लोग तुझे पहचानने भी लगेंगे कॉलेज में| उसके बाद तेरे पे है की कैसे उसका फायदा उठाता है| पर ये ध्यान रखना की एम्.पी. कोई बहुत तोप चीज भी नहीं होती| बस तेरी थोड़ी सी सेटिंग हो जाये इसलिए कह रहा हूँ पर नज़र अपेक्स इलेक्शन (यूनिवर्सिटी इलेक्शन) पर रखना|

हमने तय किया की एम्.पी का चुनाव लड़ेंगे|  फर्स्ट इयर के लिए यही ठीक है| हमने जोर शोर से अपना नोमिनेशन फाइल किया और प्रचार में जुट गए| प्रचार सामग्री तिवारी ने छपवा के दी थी|

 प्रचार शुरू होते ही कुछ अजीब से सवालों से सामना हुआ| ये सवाल अब अजीब नहीं लगते| पहला सवाल था की “भाई कुण सो गाँव से है?” दूसरा – हरयाणवी जाट है के राजस्थान का है? सबसे सही सवाल जाट लोगो ने पुछा “भाई गोत्र कुण सा है?”

तिवारी के समझाने के बावजूद मै इन सवालों की गंभीरता को समझ नहीं पाया और सब साफ़ साफ़ कह दिया| पंडित हूँ, शांडिल्य गोत्र है और रुद्रपुर गाँव है मधुबनी में| तिवारी ने सुना और डांट लगा दी – अबे चू*** सबको तू बता देगा की तू लोकल नहीं है तो तुझे वोट कौन देगा? मैंने कहा भाईजान 20 साल से यही हूँ, घर यहाँ है, पढाई यहाँ करी है, और क्या लोकल चाहिए? तिवारी साहब ने समझाया की ऐसे नहीं होता| वोट आपके गाँव और कास्ट पर काफी हद तक डिपेंड करता है|

नुकसान हो चूका था पर भरपाई के लिए 5 दिन थे| तिवारी ने कहा अब मैं तेरे साथ रहूँगा और जब मैं बोलूँगा तो तू मुंह बंद रखेगा| हेल्लो हाय से ज्यादा नहीं| उसके बाद तिवारी ने मुझे कॉलेज और यूनिवर्सिटी के कई लोगो से मिलवाया, मेरा इंट्रो दिया| कास्ट की बात टाल गया| हॉस्टल में लडको से मिलवाया| माहौल थोडा सा ठीक हुआ और लोग हमें पहचानने लगे|

हम सब की अब तक कॉलेज में कुछ ठीक ठाक जान पहचान हो गयी थी| हमने एक और स्ट्रेटेजी अपनाई| एम्.पी. के लिए 7  वोट डालने होते थे| हमने अपने सब लोगो को कहा की वो 7  वोट न डाले, सिर्फ एक ही नाम के आगे यानि मेरे नाम के आगे मुहर लगायी| इसका फायदा ये होगा की 6  और लोग जिनको 1 -1  वोट मिलना था वो नहीं मिलेगा| एम्.पी. जीतने के लिए ज्यादा वोट नहीं चाहिए होते थे| 300-400 वोट काफी थे क्योकि वोटिंग ही 2500 के आसपास होती थी हमारे कॉलेज में|

तकरीबन 100 से ज्यादा लड़के हमारे साथ थे जिन्होंने वादा किया की वो एक ही वोट डालेंगे एम्.पी के लिए| इनमे से कुछ हमारे नए बने दोस्त थे चुनाव प्रचार के दौरान, कुछ जयंत के स्पोर्ट्स के दोस्त थे, कुछ घर के आसपास की कॉलोनियो के थे और कुछ तिवारी के मिलवाये हुए थे|

यूँ तो ये पोस्ट और चुनाव बहुत छोटा था पर हमारे लिए बहुत मायने रखता था| सब वोट डाल कर बाहर आये और कॉलेज के बाहर इकट्ठे हो गए| कैंटीन पुलिस ने बंद करवा रखी थी| यहाँ पर जातिवाद से दूसरा और धोखेबाजी से पहला परिचय हुआ| हमारे ही स्कूल का एक साथी (नाम नहीं लिखना चाहता) जिसका सरनेम मीणा था वो भी साथ था| हम अपने सब जानने वालो से पूछ रहा थे की भाई एक ही वोट दिया न| अधिकतर ने हां कहा| मीणा इन सब से थोडा कटा हुआ था| इसी दौरान उसके पास एक लड़का आया और उसे एक और एम्.पी. के प्रत्याशी के लिए  उससे पुछा की वोट दे दिया ना| जिस प्रत्याशी के लिए पूछा गया था वो भी मीणा था सवाईमाधोपुर का| मीणा ने हां में सर हिला दिया| मीणा से उसने पूछा की अपने सब दोस्तों को कह दिया था ना की एक ही वोट डालना है| सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए| मैंने मीणा को बुलाया और पूछा – भाई क्या कहानी है? मीणा बोला कुछ नहीं यार| पडोसी है, कह रहा था की उसे वोट देना है तो मैंने हाँ कह दी| मैंने पूछा और ये एक वोट वाला फंडा कैसे पता? और उसे नहीं पता की मैं भी प्रत्याशी हूँ और तेरा दोस्त हूँ| मीणा थोडा सा सकपका गया| थोडा जोर डालने पर उसने बता दिया की मैंने ही एक वोट वाली बात बताई थी| अब अपनी कास्ट का है और गाँव के पास का है तो कुछ तो मेरा फ़र्ज़ बनता है ना| मैंने 2  वोट डाले है एक तेरे को और एक उसको| अभी भी तू फायदे में है|

मैं अपने क्लास के लड़के की ये बाते सुन के सन्न रह गया| हम लोगो के हिसाब से तो एक ही ग्रुप बनता था और ग्रुप था के.वी. स्कूल का ग्रुप| मैंने मीणा को कुछ नहीं कहा| तिवारी की कही बात समझ आने लगी थी| जयंत उससे लड़ने को तैयार हो गया पर मैंने कहा जाने दे, कम से कम इसने बता तो दिया| बाकियों ने अपन सच बोला है या झूठ क्या पता|  मरने दे|

शाम तक रिजल्ट आ गया| मैं जीत गया था| मैं 7  एम्.पी. में तीसरे नंबर पर था| जीत तो गए पर जीतने की वो ख़ुशी नहीं हुई| सबसे बड़ा कारण ये था की वो मीणा प्रत्याशी दूसरे नंबर पर था| मीणा और इसी तरह की बाकी अनुसूचित जाति जनजातियो के छात्र आँख बंद कर के अपनी कास्ट पर वोट डालते थे और इस के साथ वालो को एक वोट वाला तरीका भी समझा दिया गया था|

खैर मैंने इस बात का बुरा मानना छोड़ कर तय किया की आगे की तयारी करो और इन सब बातो का ध्यान रखो|

to be continued..

 

 

 

 

पहला चुनाव और जातिवाद से परिचय

Post navigation


One thought on “पहला चुनाव और जातिवाद से परिचय

  1. m.p naveen choudhary ….. :)))) colg k netaa sabs ebest part thaa aap pehlvan 48 kg ke hehhe n other dinasaur ki family

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *