छात्र राजनीती से पहला परिचय

 

कॉलेज में नए थे| मन में जोश था, अपनी पहचान बनाने की इच्छा थी| पढने में तो अच्छा था ही नहीं मै, तो पहचान कैसे बनायीं जाये इस पर मंथन शुरू हुआ | वैसे भी पढने वालो को जानता ही कौन है, पूरे कॉलेज को नहीं पता की इस बार का टोपर कौन है? लोग जानते थे तो सिर्फ छात्र नेताओ को और कुछ उनके पीछे पीछे चलने वाले (सिर्फ कुछ को) दबंग किस्म के लोगो को| छात्र राजनीती में घुसने की इच्छा हुई पर पता नहीं था की कैसे घुसा जाये की लोग हमें पहचाने| तय हुआ की पहले तो हमारी जान पहचान सबसे हो, जो भी बड़ा नेता हो वो हमें पहचाने|

सबसे पहला मौका मिला हमें महीने भर के अन्दर ही अपनी जान पहचान बढाने का| छात्र परिषद् जो एक राष्ट्रीय छात्र संगठन था, उसके सदस्य हमारे कॉलेज में सदस्य बना रहे थे| मै भी पंहुचा और कहा की मुझे भी मेम्बर बना लो| तुरंत मेरा अता पता लिखा गया फॉर्म पर और सदस्यता शुल्क एक रूपया माँगा गया| मैंने एक रूपया दिया और इस प्रकार मात्र एक रुपये में आजीवन सदस्य बन गया| सदस्य बनाने वाले से मैंने पूछा की भैया आप लोग मिलते कहाँ हो? मै भी आपके साथ जुड़ना चाहता हूँ| उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और कहा की मेरा नाम अजय सिंह है, और मै छात्र परिषद् का कॉलेज प्रमुख हूँ| तुम मेरे से मिला करो, मेरे साथ रहा करो|  मैंने पूछा – भैया आपका प्रेसिडेंट कौन है? उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने डायनासौर के खानदान का पता पूछ लिया| फिर वो थोड़े अकड़ के साथ बोला – छात्र परिषद् में जो पद होते है वो प्रमुख, सह प्रमुख, प्रभारी होते है न की अध्यक्ष वगैरह| हम पोस्ट नहीं देते जिम्मेदारी देते है और इस कॉलेज की जिम्मेदारी मुझ पर है| समझा? मैंने हां में सर हिला दिया| वो जाने लगा तो मैंने फिर पूछा – प्रमुख साहब पर मिलोगे कहाँ? उसने कहा कल 11 बजे बैठक है 10 नंबर क्लासरूम में, आ जाना और अपने दोस्तों को भी ले आना| मैंने पूछा – बैठक? किसी की डेथ हो गयी क्या? अजय गुस्सा हो गया और बोला – ओ अंग्रेज, मीटिंग है| छात्र परिषद् राष्ट्रवादी छात्र संगठन है, हम हिंदी को बढ़ावा देते है| मै चुपचाप सर हिला कर सुनता रहा और शर्मिंदा भी हुआ की मीटिंग की हिंदी मुझे नहीं मालूम थी|

अगले दिन मैंने अपने सभी स्कूल के साथियों से कहा की चलो भाई बैठक में चलना है| सभी का वही जवाब – कौन मर गया? राजस्थान में बैठक शब्द का प्रयोग ज्यादातर किसी की मृत्यु के बाद तीसरे या चौथे दिन की जाने वाली स्मरण सभा के लिए ही किया जाता है| मैंने अपने साथियो को कहा – अबे अंग्रेजो, मीटिंग| कैसे हिन्दुस्तानी हो, तुम्हे मीटिंग का हिंदी नहीं मालूम| हमारे शेखावत साहब उर्फ़ बना जी बोले – अबे हिंदी में भी मीटिंग ही कहते है, किसी मीटिंग मतलब की बैठक में जाना है| ये सुनकर सारे ठहाके मारने लगे| मैंने  उन्हें छात्र परिषद् के बारे में बताया| सबकी शकले ऐसी हो गयी जैसे गणित की क्लास में बैठने को कह दिया हो| मुकेश बोला भाई – क्रिकेट खेलते है, नहीं तो सामने चल के लडकियाँ देखते है| मैंने नकली गुस्सा दिखाया और कहा – बस चलना है| जयंत भी भड़का – अबे चौधरी, क्या फफूंद पालता है तू, फिर बोला चलो चलते है|

हम लोग 10 नंबर कमरे में पहुचे| 25-30 लड़के बैठे हुए थे और सामने की तरफ टेबल लगाकर 5-6 छात्र परिषद् के कार्यकर्त्ता बैठे हुए थे| उन लोगो ने अपना परिचय देना शुरू किया| उनमे से दो जाने माने नाम थे छात्र राजनीती के, अजय था, 1 कोमर्स कॉलेज का अध्यक्ष था और एक पूर्व अध्यक्ष था महाराजा कॉलेज का और इस बार विश्विद्यालय अध्यक्ष पद के लिए छात्र परिषद् से टिकट मांग रहा था| इन सबके अलावा एक दुबला पतला सा, सामान्य से कद का, भूरे रंग के बाल और हलकी दाढ़ी वाला लड़का और था| उसमे ऐसा कुछ नहीं था की उसका चेहरा याद रखा जा सके, लेकिन वो भी उन 6 में से एक था लेकिन मैंने उसे देखा ही तब जब वो अपना परिचय देने लगा| उसने अपना नाम राजेंद्र तिवारी बताया और कहा की वो इसी कॉलेज में थर्ड इयर का छात्र है, वैसे वो शकल से बड़ा दिख रहा था| उन सब के परिचय के बाद उनमे से एक जिसका नाम तेज सिंह राठौर था, उसने कहा की अब आप सब अपना परिचय दीजिये, आपको अपने परिचय में अपना नाम, कौन से इयर में पढ़ रहे है, अगर फर्स्ट इयर में है तो कौन से स्कूल से आये है, और छात्र परिषद् में किसके माध्यम से जुड़े, ये बताना है| 

हमारी क्लास थियेटर स्टाइल की थी, तीन बेंच भरी हुई थी और हम तीसरी बेंच पर करीब  9-10 लड़के बैठे हुए थे| जब हमारे परिचय की बारी आई तो जयंत ने अपने सभी साथियो को कहा की हमें ये बताना है की हम नवीन चौधरी के माध्यम से छात्र परिषद् में जुड़े है|  परिचय मुकेश से शुरू हुआ और उसने कहा की वो नवीन के माध्यम से इस संगठन से जुड़ा है और एक-एक करके मेरे 9 साथियो ने यही कहा की हम नवीन के माध्यम से आये है| सामने बैठे सभी नेताओ में बड़ी उत्सुकता हो गयी की ये नवीन है कौन? सबसे आखिरी में मै खड़ा हुआ| सबको लग रहा था की कोई बहुत तगड़ा सा बन्दा  होगा जिसके साथ इतने लड़के चलते है, लेकिन मै उनकी उम्मीद के उल्टा पूरे 48 किलो का दुबला पतला सा पहलवान|

इस बैठक के बाद अजय सिंह मेरे पास आया| आज उसके तेवर में पहले जैसी अकड़ नहीं थी| कहता है नवीन भाई, कोई भी दिक्कत हो तो बता दियो तभी पीछे से बाकि ने भी मौके पे चौका मारते हुए अपना परिचय फिर से दिया और कहा की हम सब है, कुछ भी हो बताना और आप विश्वविद्यालय आया करो, हमसे मिला करो|  सब आकर मिले सिवाय राजेंद्र तिवारी के| वो उन सब को पीछे से देखता रहा| जब सब जाने लगा तो मेरे पास आया और हाथ मिला कर बोला, मै रोज सुबह 10 से11 कॉलेज की कैंटीन में होता हूँ, कल मिलना|

इस सब के बाद मै थोडा चकित था की ये क्या हुआ? मै इन सबसे जान पहचान करना चाहता था और ये सब मेरे से दोस्ती बढ़ाना चाहते है| मेरे सारे दोस्त भी इन कुछ नेताओ से मिल कर खुश थे| मैंने जयंत से पूछा – भाई क्या कहता है? जयंत बोला देख अपने कॉलेज में छात्र परिषद् वालो की चलती नहीं है| इनको भी एक ऐसा ग्रुप चाहिए जो इनकी चला सके|  मैंने कहा की अजय को अब भाव नहीं देंगे, कल वो साला भाव खा रहा था और आज दोस्ती करने में लगा हुआ था| जयंत ने समर्थन दिया और कहा की उसकी चलती भी नहीं है कॉलेज में| साला कॉमर्स कॉलेज में ही बैठा रहता है सारे टाइम|

तय रहा की अब हम सब छात्र परिषद् के साथ जायेंगे तो पर ज्यादा किसी को भाव नहीं देंगे| पर ये ज्यादा दिन तक चला नहीं| इनमे से एक ने हमें सम्मोहित किया और हमें अपने साथ शामिल किया या खुद हम में शामिल हो गया ये मै आज तक समझ नहीं पाया| कौन था वो और कैसे वो हमसे जुदा, बताऊंगा अगले पार्ट मेरा पहला चुनाव में|

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