खोटे सिक्के जो चल गए.. 

 

आज सुबह सुबह एक बहुत पुराने अजीज दोस्त रोबिन को फ़ोन किया उसके जन्मदिन की शुभकामना देने को| बहुत समय के बाद बात हुई उससे| पुष्पा मेरे अधिकतर दोस्तों को जानती है उनके नाम से, पर उसने रोबिन का नाम नहीं सुना था क्योकि मैंने कभी जिक्र ही ही नहीं किया| उसने जब पुछा की ये कौन थे, तो मुझे आश्चर्य हुआ की पता नहीं क्यों मैंने कभी जिक्र नहीं किया रोबिन का|

पुष्पा को बताते हुए ही ध्यान आया की रोबिन से दोस्ती को 28 साल हो चुके है| वो मेरे सबसे पुराने दोस्तों में से एक, और उससे भी बड़ी बात की उतना ही भरोसेमंद है| उससे बात करने के बाद बाद बचपन की इतनी खट्टी मीठी बाते याद आ गयी की, मन किया की टाइम मशीन जैसी कोई चीज हकीकत में होती तो पीछे 1983 में चला जाता एक बार फिर से बचपन में खो जाता|  

आप लोगो को याद है बहुत साल पहले एक साइंस फिक्शन आता था दूरदर्शन पर “सिग्मा”| उसमे बहुत सारे करेक्टर थे और एक बड़ा ही प्रमुख करेक्टर था डॉक्टर लूका| एक साइंटिस्ट जो समस्या का समाधान करता था और नयी चीजे ढूंढता था| रोबिन का निक नेम डॉक्टर लूका था| मैं और रोबिन क्लास में अलग रो में बैठते थे पर कभी कभी साथ में बैठ जाया करते और उसके बाद अपने पेंसिल बॉक्स को कभी फाइटर प्लेन बनाते और कभी रेसिंग कार और फिर उनका एक्सिडेंट करवाते| रोबिन इसके अलावा और भी बहुत सी चीजे बनाता रहता था, जैसे की कैसे पेंसिल बॉक्स बिना हाथ लगाये खुलेगा (इसके लिए वो बॉक्स के ढक्कन में धागा बाँध देता और खीच लेता), कैसे किसी की जेब में से टॉफी निकाली जाएगी (इसके लिए उसने दो लकड़ी की डंडियों जोड़ कर चिमटा बनाया था, जिसके आगे लोहे की तार को मोड़ कर जोड़ा हुआ था)| बस ऐसे ही खेलते रहते थे|

चौथी पांचवी क्लास तक आते आते हमारा साथ रहना कम हो गया पर दोस्ती वैसी ही रही| दसवी क्लास तक ऐसे ही रहा, जब भी काम पड़े हम दोनों साथ में हो जाते वर्ना अपने अपने ग्रुप में मस्त| मुझे कभी भी ओवरस्मार्ट और ईगो वाले लोग पसंद नहीं आये और न ही मैं उनके साथ रहा| दसवी तक रोबिन जिस ग्रुप के साथ रहता था उनमे 2-3 ऐसे ही थे और इसलिए मेरी उस ग्रुप में पटरी कम खाती थी|

जब बोर्ड की परीक्षाये हुई तो सब लोग सब्जेक्ट साइंस लेने की बात करने लगे, उस समय मैं और रोबिन अक्सर चुप रहते| मैं तो कन्फ्यूज था और साथ में ही ये भरोसा भी नहीं था की नंबर इतने आयेंगे और यही हाल रोबिन का भी था| जब रिजल्ट आया तो मेरी पूरी 60% बन गयी जो मेरे लिए और मेरे घरवालो / पड़ोसियों के लिए भी आश्चर्य का विषय था| रोबिन सेकंड डिविजन में था और उसे आर्ट्स या कोमर्स मिल सकती थी| उसने कोमर्स ली, सिर्फ इसलिए क्योकि आर्ट्स के बच्चे बदमाश होते है, इसके अलावा उसका एक अच्छा दोस्त निशांत भी कॉमर्स में गया था| मैं फिर कन्फ्यूज और मैंने साइंस ले ली| पूरे 7 दिन मैंने साइंस पढ़ी और मुझे समझ आ गया की बेटा तेरे बस की नहीं| मैंने आर्ट्स लेने का तय किया, मैंने रोबिन को कन्विंस करने की कोशिश की कि तू आर्ट्स में आजा, और रोबिन ने मेरे को कन्विंस करने की कोशिश की कि तू कॉमर्स में आजा, आर्ट्स में तो सबसे ज्यादा वीक बच्चे जाते है| हम दोनों एक दूसरे को कन्विंस नहीं कर पाए लेकिन हमारी दोस्ती जारी रही|

मैंने बदमाशिया करनी शुरू कर दी, लड़ाई झगडे जो अक्सर साइंस और कॉमर्स वालो के साथ ही होती थी| रोबिन के कई नए दोस्तों को भी मारा-पीटा गया हम लोगो द्वारा, पर मेरी और रोबिन की दोस्ती पर इन सबसे कोई आंच नहीं आई बल्कि हमारी दोस्ती की वजह से कई लडाइयां बुरा रूप लेते लेते रह गयी| कई बार मैं अकेला पड़ा इन सब लड़ाइयों में पर हर ऐसे मौके पर वो मेरे सामने ढाल बन कर खड़ा हो गया| रोबिन इमेजिनेशन की दुनिया में बहुत रहता था और उसके जागते हुए सपनो में अभी भी फाईटर प्लेन लड़ते थे और वो दुनिया के सब बुरे लोगो को मारता रहता था, पर सच्ची जिंदगी में झगडे से बचता था पर झगडा होने पर पीछे भी नहीं हटता था|

एक बार उसने रवि वर्मा (टीचर का बेटा) को मारा था, स्कूल के बाहर की संजीव बुक डेपो के सामने की नाली में गिरा के| वो झगडा भी काफी बढ़ा, रोबिन और रवि दोनों मालवीय नगर में रहते थे, और रवि की जान पह्चान मालवीय नगर के एक दो गुंडा तत्वों से थी और वो रोबिन को धमकाने लगा| तब तक मैं भी मालवीय नगर में रहने लगा था, निशांत पहले से ही मालवीय नगर में था| निशांत अक्सर शाम को उसके घर आ जाता और उस झगडे के बाद से मैं भी शाम को रोबिन के घर आने लगा और हम लोग साथ ही कही निकला करते थे और इस तरह १२ साल की दोस्ती के बाद हम पहली बार ग्रुप की तरह से रहे|

मैं छात्र राजनीती में घुसा, जयंत जहां हमेशा मेरे साथ होता था कॉलेज में, वही रोबिन ने मेरा पूरा साथ दिया मालवीय नगर में मेरी पकड़ बनाने में| विद्यार्थी परिषद् की मैंने मालवीय नगर शाखा शुरू की और रोबिन ने अपनी कालोनी के सभी लडको को मेरे साथ कर दिया|

वक़्त गुजर गया, ग्रेजुएशन हो गयी और हमारी केरीयर को लेकर चिंताए बढ़ गयी| अब घर वाले भी गुस्सा होने लगे और हम सबको उपदेश बहुत मिला करते, ख़ास तौर से मेरे पिताजी ज्यादा उपदेश दिया करते थे और कई बार तो सबको डांट भी देते| उस समय में हम सब खोटे सिक्के माने जाते थे क्योकि पढने में अच्छे नहीं थे और बदमाशियों में आगे| वैसे रोबिन ने कभी ज्यादा बदमाशिया की नहीं पर वो हमारा दोस्त था, यही काफी था|  निशांत ने एम्.बी.ए ज्वाइन कर ली थी और हम दोनों हमेशा की तरह कन्फ्यूज| हमने सोचा की हम भी एम्.बी.ए. करते है और जा पहुचे दिल्ली एक संसथान में एडमिशन लेने वो भी बिना किसी एग्जाम को दिए| वहाँ जाकर समझ आया की ये इंस्टिट्यूट हमें धोखा दे रहा था और सिर्फ पैसे खाने चाहता है| लौट के दोनों बुद्धू घर को आ गए|

खैर बुरा वक़्त गुजरा| रोबिन ने एक बैंक में ऑफ रोल पर काम करना शुरू किया, वो भी काफी कम सेलेरी पर| लेकिन उसके बाद उसने पीछे नहीं देखा| उसने पूरी लगन के साथ काम किया, अपने काम को सीखा और फिर बैंक का ऑन रोल एम्प्लोयी बना| तरक्की ली और आगे बढ़ा| आज रोबिन काफी अछि पोजीशन पर बैठा है एक बड़े बैंक में| और मेरे करियर का तो आपको पता ही है| रोबिन तुम पर गर्व है| और हाँ ये बात सिर्फ मैं जानता हूँ की आज भी तुम सपनो में फाइटर प्लेन उड़ाते हो और दुनिया के बुरे लोगो को मारते हो|

खोटे सिक्के जो चल गए..

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