एक और कहानी मेरे क्रश की

 

पहले भाग में आपने पढ़ा की संजना आखिरी मुलाक़ात में अपना नंबर दे गयी थी. अब आगे.

पार्ट -२

जयपुर आने के बाद मै सोचता रहा की उसे फोन करू या न करू. इस उधेड़बुन में 5 दिन निकल गए. ग्रुप डिस्कशन और इंटरव्यू का रिजल्ट भी आ गया था. मैंने सोचा ये ठीक मौका है फोन कर ही लेता हू. फोन किया और उसकी मम्मा ने उठाया. मैंने पूछा संजना के लिए और उन्होंने मुझसे मेरा परिचय ले लिया. कौन हू, क्यों फोन किया वगैराह. मै सोच रहा था की क्या मुसीबत मोल ले ली. खैर इस पूछताछ के बाद मेरी बात कराई गयी संजना से. भिड़ते ही मैंने उसे गालियाँ निकाली.

मैंने कहा- तुम तो कह रही थी फोन कर लेना, कोई दिक्कत नहीं. यहाँ मेरा इंटरव्यू ले लिया तुम्हारी मम्मी ने. हो गया.

उधर से संजना का जवाब आता है – अच्छा अच्छा, कोई बात नहीं. मै यही सोच रही थी की बुक आपके पास ही छूट गयी होगी. ठीक है, आप जब फ्री हो तब मुझे बुक दे देना.

मैंने कहा – क्या?? कौन सी बुक?

संजना – ओके, मैंने बुक में नंबर लिखा हुआ था. मै भी यही सोचू आपको मेरा नंबर कहा से मिला

मैंने कहा – समझ गया. लगता है मम्मी वही है.

संजना – हां आप काफी इंटेलिजेंट है.

मै – ठीक है अपन मिलते है.

संजना – अरे नहीं, आप टेंशन ना लो.

मै – जल्दी है. कल १ बजे, किरण कैफे.

संजना: इतनी क्या जल्दी है? आराम से दे देना बुक.

मै – मै इन्तेज़ार करूँगा. बाय.

कह के मैंने फोन रख दिया.

मैंने हिसाब लगाया की किरण कैफे में अगर मै २ आईटम जैसे पाव भाजी या चाउमीन मंगाता हू और साथ में कोल्ड कॉफी तो बिल २५० – ३०० का बनेगा. अगर कोल्ड ड्रिंक मंगाई तो २०० में हो जाएगा. देखा इतने पैसे तो थे. क्या करता, बेरोजगार था, गर्लफ्रेंड बनाने से पहले हिसाब किताब लगाना पड़ता था. फॉर्म और इंटरव्यू के लिए ही पापा से बहुत पैसे ले चुका था इसलिए और मांगे नहीं जा सकते थे.

अगले दिन सुबह नहाते टाइम २ बार साबुन लगाया. शेविंग करते हुए रेजर उल्टा चलाया ताकि गाल एकदम चिकने दिखे. अलमारी से मस्त फूल पत्तियों की प्रिन्टिंग वाली शर्ट निकाली. (उन दिनों ये फैशन था). और मैंने सोचा इन फूल पत्तियों वाली रंगीन शर्ट में मै भी खिलता लगूंगा. किरण कैफे पंहुचा और मुझे संगीता दिखी, मैंने इधर उधर देखा तो संजना नहीं थी. मै उससे पूछना चाहता था की संजना आई या नहीं? पर कभी बात ही नहीं हुई थी. संगीता खुद ही आई और बोली की नवीन वो नहीं आ सकती थी. उसने मुझे बोला की मै तुम्हे कह दू. और प्लीज फोन मत करना, उसके घर पे पंगा हो गया है. मेरा चेहरा लटक गया.

मैंने कहा – कोई बात नहीं…. कॉफी पियोगी?

संगीता – नहीं. मुझे जाना है. मै भी घर से बहाना बनाकर आई हू.

मै वापस निकला. सारी मेहनत ही खराब हो गयी. तभी पीछे से किसी ने कंधे पर हाथ  रखा और पूछा की कहाँ जा रहे हो. मुझसे मिलने आये थे ना?

मै पलटा तो देखा संजना खड़ी हसे जा रही है. इतना गुस्सा आया की पूछो मत. खैर मैंने भी भाव खाए. कहा – जा बात नहीं करता. थोड़ी देर भाव खाने के बाद हम कैफे के अंदर पहुचे. मैंने फिर हिसाब लगाया की बजट तो २ जनों का था, हम तो ३ हो गए. खुदा का शुक्र है दोनों लड़कियों ने सिर्फ कोल्ड कॉफी आर्डर किया. काम बजट में ही हो गया. संजना ने बताया की मेरे फोन के बाद उसके पिताजी काफी गुस्सा हुए थे की अभी तक तो एडमिशन भी नहीं लिया और लडको से दोस्ती भी हो गयी.

मैंने कहा: सॉरी

संजना: अरे कोई बात नहीं, पहली बार किसी लड़के का फोन आया था तो उनको अजीब लगा.

मैंने शैतानी मुस्कराहट के साथ कहा: ये बताना चाहती हो की पहले किसी लड़के से तुमने बात नहीं की.

संजना: बकवास मत करो. मुझे जब भी फोन करना 11-4 बजे के बीच में करना. तब घर पे कोई नहीं होता.

मैंने उसे बताया की मै जयपुर में एडमिशन नहीं ले रहा. थोड़ी उदास हुई पर बोली की ठीक है जो भी करियर के लिए अच्छा हो वही करो.

बस इसके बाद लगभग हर रोज संजना से फोन पे बात होने लगी. दिन के 2 घंटे हम दोनों के घर के फोन व्यस्त रहा करते थे. इस बीच में हम काफी हसी मज़ाक भी करते. थोडा सा फ्लर्ट भी करते एक दुसरे के साथ. इशारों इशारों में एक दुसरे को बता भी देते की हम एक दुसरे को पसंद करते है. पर कभी हम दोनों में से किसी ने खुलकर कुछ नहीं कहा. एक दिन कहती है की तुम वह जाकर तो मुझे भूल ही जाओगे.

मै: क्यों भला?

संजना: out of sight, out of mind. वैसे भी वहाँ अच्छी लड़किया मिलेंगी.

मै: तुम कह के तो देखो की मेरे सामने ही रहो. सामने से हटूंगा ही नहीं.

संजना: हट शैतान. तुम जयपुर में ही नहीं रुक सकते. यहाँ कोई कॉलेज नहीं अच्छा लगता तुम्हे.

मैंने कहा: रुक जाता. पर किसके लिए? कोई तुम्हारे जैसी होती जो कहती मेरे लिए रुक जाओ तो रुक जाता. यही से पढाई कर लेता.

मेरे ये कहते ही कुछ सेकण्ड तक दोनों तरफ से सन्नाटा रहा. फिर वो बोली- अभी फोन रखती हू.

बस ऐसी ही कुछ कुछ बाते होती. इधर उधर की, दोस्तों की, पता नहीं कैसे दो ढाई घंटे निकल जाते थे बात करते करते. कुछ समय बाद मै मोदीनगर चला गया MBA करने. उसके बाद ये रोज रोज की बातो का सिलसिला टूट गया. तब मोबाइल फोन सस्ते नहीं होते थे. इसलिए जब भी बात करनी हो तो STD बूथ से करनी होती थी. अब संजना से ज्यादा बाते तभी हो पाती थी जब जयपुर जाता था. वक्त के साथ बाते कम होती गयी. मेरी जिंदगी में और भी कई लोग आते गए, और कही ना कही संजना की छवि धूमिल होती गयी.

वो अक्सर कहती थी की मुझे चलना नहीं आता ठीक से. मै जब भी उसके साथ चल रहा होता था तो धीरे – २ सड़क की तरफ होता जाता था और फिर वो मुझे खीचती अपनी तरफ और कहती ना तो तुम कभी सीधी बाते करते हो ना सड़क पर सीधे चलते हो. किसी दिन कोई तुम्हे अपनी गाड़ी के नीचे दबा देगा. इसके बाद मै जानबूझ कर सड़क की तरफ बढ़ जाता और वो मुझे फिर से अपनी और खींचती थी. मुझे अच्छा लगता था जब वो मुझे प्यार भरे गुस्से से डांटती थी.

कुछ समय पहले उससे यु ही मुलाकात हो गयी. मेरी शादी हो चुकी थी, उसने बताया की उसकी शादी होने वाली है. सुन के अच्छा लगा. अब मुझे लगता है की अच्छा हुआ की हमारे बीच में कोई अफेयर जैसी चीज शुरू नहीं हुई. जो था अच्छा था, उसे आप क्रश कहे, infatuation कहे या कुछ और. आज वो याद तकलीफ नहीं देती, बल्कि थोड़ी गुदगुदी सी होती है उन यादो को सोच कर. एक दूसरे से मिलने पर नज़रे चुरानी नहीं पड़ती. हम एक दूसरे को काफी हद तक समझते है जैसे एक दोस्त आपको समझता है.

आप ये मत समझना की संजना की कहानी खतम, तो सब खतम. पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त. अभी ऐसे और कई क्रश बाकी है. पढते रहिये..

एक और कहानी मेरे क्रश की Part – 2

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5 thoughts on “एक और कहानी मेरे क्रश की Part – 2

  1. Love in Jaipur! Enjoyed reading your ‘dharavahik’ love sequel. Hope to read the movie romance part too.

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