एक और कहानी मेरे क्रश की

 

पार्ट – I 

जब से विवाह रुपी क्रेश हुआ है तब से क्रश तो सिर्फ यादो में ही रह गया है. उन्ही यादो में से एक और याद.. संजना की याद.

साल २००२. मैं MBA के एंट्रेंस के लिए RMAT की परीक्षा देने गया था. उन दिनों मै काफी ज्यादा तनाव में रहा करता था अपने करियर को लेकर. मै एग्जामिनेशन हॉल में पंहुचा तो देखा की हॉल के एक कोने में एक खूबसूरत सी लड़की बैठी हुई है. मैंने उसे देखा पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. यु तो वो दिन करने या मरने वाले थे पर कमबख्त नज़रे रूकती नहीं, हॉल में घुसते ही पहली नज़र खूबसूरत लड़की पर ही पड़ी. मैंने देखा की वो भी मुझे देख रही है. खैर उसकी तरफ से ध्यान हटा के मै अपना रोल नंबर ढूँढने लगा. मेरी सीट उसी लाइन में थी जिसमे वो बैठी थी. आगे बढ़ता गया और जब अपनी सीट पर पंहुचा तो देखता हू उसकी सीट के ठीक आगे वाली सीट मेरी है. मेरी सीट आखिरी से दूसरी थी और उसकी आखिरी. जब मै अपना रोल नंबर देखता हुआ पीछे की सीट की तरफ आ रहा था तो मैंने देखा की वो लड़की लगातार मुझे देख रही है. थोड़ी सी गुदगुदी तो हुई अंदर पर मैंने उसे अपने चेहरे पर नहीं आने दिया. जब मै अपनी सीट पर पंहुचा तो सीट पर बैठने से पहले एक बार फिर नज़र मिली, वो अभी भी लगातार मुझे देखे जा रही थी. मै थोडा सा झेप गया और चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गया. 2-3 मिनट के बाद अचानक उसकी चीख सुनाई दी “संगीता माय डार्लिंग”. मैंने देखा एक और लड़की हॉल में आ रही है. मेरे पीछे वाली लड़की दौड़ के उसके पास गयी, और अपनी डार्लिंग रुपी सहेली संगीता को उसकी सीट ढूँढने में मदद की. परीक्षा शुरू होने में आधा घंटा बाकि था. मेरे पीछे वाली लड़की कभी दौड़ के अपनी सीट पर आये कभी अपनी सहेली संगीता के पास जाये. उसकी सारी हरकते कुछ ऐसी थी की आप उसे अच्छे से नोटिस करे. और वो सफल रही. खैर जी परीक्षा शुरू हुई और खतम भी हुई. परीक्षा के बाद जिस तरीके से उसने मुझे देखा, मुझे लगा की वो मुझसे पूछना चाहती है की कैसा रहा? या मै उससे पूछू. पर मै तेजी से उसके करीब से निकल गया. मुझे एहसास हुआ की उसकी आँखे मेरा पीछा कर रही है.

रिजल्ट आ गया. मेरी रेंक 120-130 के बीच में कुछ थी. उदयपुर में ग्रुप डिस्कशन और इंटरव्यू थे. GD के लिए ग्रुप बनाए गए और वही लड़की फिर से मेरे ग्रुप में थी. यही पर उसका नाम पता चला संजना. इस बार भी हमने एक दुसरे को देखा पर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी. जैसे ही ग्रुप घोषित हुए, अधिकतर लड़के लड़किया एक दुसरे से हाय हेल्लो करने लगे. मैंने देखा सिर्फ लड़के ही नहीं लड़किया भी चेहरे देख कर ही हाय हेल्लो कर रहे है. पर मै चुपचाप एक कोने में खड़ा रहा और वो भी. इस बीच में एक लड़का उसके पास गया बातचीत करने पर उसने कोई खास तवज्जो नहीं दी.

खैर जी GD (ग्रुप डिस्कशन) के लिए हमें अंदर बुलाया गया. टॉपिक दिया गया “cottage industry is backbone of India”. दो लोगो ने इसके पक्ष में बोलना शुरू किया. संजना मैडम भी उनके सुर में सुर मिला के बोली और ये भी जोड़ दिया की “Cottage industry is empowering women from lower income group. They are getting jobs at their house only.” बस यहाँ मैंने हस्तक्षेप किया और इसके विरोध में बोलना शुरू किया.GD का एक उसूल है की अगर सब पक्ष में बोल रहे है, तो आप विपक्ष में बोले पर ध्यान रहे की आपके पास जानकारी पुख्ता हो. मेरे इकोनोमिक्स की पढाई यहाँ काम आ गयी. मैंने तुरंत कुछ आंकड़े (data) बोले जो अधिकतर की समझ में नहीं आये क्युकी सब उथली जानकारी वाले थे और कोई विरोध भी नहीं कर पाया क्युकी मैंने आकड़े बोले थे. इसके बाद मै संजना की तरफ मुखातिब हुआ और कहा की “cottage industry is not empowering women, but it is increasing hidden unemployment”.  मैंने उन्ही दिनों hidden unemployment  के बारे में पढ़ा था तो सारा ज्ञान उलटी कर दिया. अधिकतर बाते मैंने बकवास कही थी पर आकड़े और आत्मविश्वास से बोलने के कारण सब चुप और मेरे ही पक्ष में बोलने लगे.

GD खत्म हुआ और अब पर्सनल इंटरव्यू होने थे. मै तन के बाहर निकला और अपनी फाइल को समेटने लगा. संजना मेरे पास आई, और पूछा की क्या सर्टिफिकेट भी लाने थे, मै तो नहीं लायी हू. और हमारी बातचीत का श्री गणेश हो गया.

मैंने कहा नहीं, सर्टिफिकेट नहीं लाने थे. मै तो किसी और जगह से इंटरव्यू दे कर आ रहा हू इसलिए साथ में फाइल लेकर घूम रहा हू.

संजना: कहाँ इंटरव्यू दिया?

मैंने बताया: मैंने MAT का भी दिया था. उसी के इंटरव्यू थे.

संजना: वाह जी, आप तो बड़े इंटेलीजेन्ट हो. वैसे आप अंदर भी बहुत अच्छा बोले और आपको तो कोई अच्छा कॉलेज मिल ही जायेगा, मेरा पता नहीं क्या होगा? 

मैने कहा: अच्छा कॉलेज तो इंटरव्यू के बाद ही पता लगेगा. अगर इंटरव्यू बिगड गया तो?

संजना: आपका इंटरव्यू क्यों बिगडेगा. और अगर बिगड भी गया तो दिक्कत क्या है, आपकी तो रेंक पहले से ही काफी अच्छी है.

मैंने पूछा: (थोड़े आश्चर्य के साथ) आपको कैसे पता की मेरी रेंक अच्छी है.

वो थोड़ी सी झेप गयी और बोली मैंने देखा था. मैं मुस्कुरा दिया.

तब तक मेरा इंटरव्यू के लिए कॉल आ गया और मै चला गया. अगला इंटरव्यू संजना का ही था. मैंने उसे शुभकामना दी और कहा की मै इंतज़ार कर रहा हू.  उसने मुस्कुरा के हामी भरी और इंटरव्यू देने चली गयी. वापस आई तो चेहरा उतरा हुआ था. उसने बताया की इंटरव्यू अच्छा नहीं हुआ. मैंने उसे सान्त्वना दी और हम बाहर की और आने लगे. बाहर आने तक हमने थोड़ी और बाते करी.

मैंने पूछा: कैसे आई हो?

संजना; माँ के साथ आई हू. वो बाहर इंतज़ार कर रही है.

मै: ह्म्म्म

संजना: अरे तुम हमारे साथ ही क्यों नहीं चलते?

मैं: हां ये अच्छा है. रास्ते में तुम मेरे साथ ही बैठना और संगीता तुम्हारी माँ के साथ. रास्ते में खूब बाते करेंगे.

संजना हसने लगी. बोली; बोली, पागल हो क्या? मम्मा को छोड़ के तुम्हारे साथ बैठू. और क्या बताऊ की तुम कौन हो? मै रास्ते में तुमसे बात भी नहीं करुँगी.

मै बोला: मै पागल नहीं हू, इसलिए नहीं जाना अब तुम्हारे साथ. जब तुमसे बात ही नहीं होनी तो मै उस बस में क्या करूँगा? मै अपने दोस्तों के साथ वापस जा रहा हू.

बात करते – २ हमें ध्यान नहीं रहा और किसी और ही तरफ पहुच गए. वहाँ से हमें बाहर का रास्ता दिख तो रहा था पर उसके लिए ३ फीट उचाई से कूदना था. मै कूद कर नीचे आ गया. मैंने कहा कूदो तुम भी. उसने कोशिश की पर घबरा गयी. मैंने अपना हाथ दिया कहा पकड़ो और कूद जाओ. वो थोड़ी सी झेप सी गयी और बोली, नहीं मै कूद जाउंगी. मैंने हाथ वापस पीछे कर लिया. उसने १-२ बार कोशिश की पर कूदी नहीं. फिर कहती है दिख नहीं रहा क्या? हाथ दो अपना. मै मुस्कुराया और हाथ आगे बढ़ा दिया. उसने थोडा झिझकते हुए हाथ पकड़ा धीरे से. फिर अपनी पकड़ मेरे हाथ पर थोड़ी मजबूत की और कूद पड़ी. कूदने के बाद भी हाथ नहीं छोड़ा उसने. कुछ कदम हम साथ चले ऐसे ही हाथ पकडे हुए. मैंने पूछा तुम्हारी मम्मा के सामने ऐसे ही जाना है? उसने मुझे अजीब तरह से देखा जैसे पूछ रही हो क्या मतलब? तभी उसको ध्यान आया की उसने मेरा हाथ अभी भी पकड़ा हुआ है. बोली “ओह सॉरी” और शरमाते हुए हाथ छोड़ दिया. दूध जैसा रंग था उसका, और उसका चेहरा शर्म से गुलाबी हो चुका था. मै बता नहीं सकता उस समय कैसा लग रहा था मुझे. कैसे-२ अरमां जगे दिल में जिसे मैंने तभी दबा दिया. एक बार मन किया की हाथ फिर से पकड़ लू और वो इसी तरह सिमटी सी, शरमाई सी रहे. पर दिल को कंट्रोल किया और दिल के अरमां दिल में ही रह गए. हम उस हॉल के पास पहुचे जहा उसकी माँ इंतज़ार कर रही थी. भारी दिल से उसे बाय बोला. शायद वो भी नहीं जाना चाहती थी. पर जाना तो था, तो वो भी बाय बोली. मैंने पूछा फिर कभी मिलने या बात करने का चांस है? शायद वो इसी पल का इंतज़ार कर रही थी. फट से उसने अपने घर के दोनों नंबर मुझे दे दिए. मैंने कहा लिख लेता हू. तो संजना बोली लाओ मै लिख देती हू. किस पर लिखू??? और मेरा हाथ पकड़ कर कहा हाथ पर लिख देती हू और मुझे कुछ कहने का मौका दिए बगैर उसने मेरे हाथ पर अपने नंबर लिख दिए. मै उसको देखता रहा. इतना तो साफ़ हो गया था की आग बराबर लगी हुई है. “अब दिल में यही बात इधर भी है और उधर भी”. नंबर लेने के बाद हम विदा हो गए.  अब ये देखना था की ये मुलाक़ात क्या रंग लाती  है.

आगे मुलाक़ात हुई या नहीं? कुछ नया हुआ या नहीं? इस कहानी का अगला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

एक और कहानी मेरे क्रश की Part – 1

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3 thoughts on “एक और कहानी मेरे क्रश की Part – 1

  1. Hi Naveen,

    This is really amazing, you have great control on language and the flow is excellent.

    Great going.

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