एक अधूरी प्रेम कहानी…

परसों बहुत सालो के बाद एक बार फिर मैंने तुम्हे इतने करीब से देखा. तुम्हारे लिए जो दबा हुआ प्यार था, एक बार फिर जग गया| पिछले 3 दिन जो तुम्हारे पास गुजारे उन्होंने फिर से तुम्हारे करीब आने की इच्छाओं को जगा दिया| इन 3 दिनों ने वो 2 साल याद दिला दिए जब हम साथ थे| कितनी यादेँ जुडी है तुमसे| मैंने तुम्हे पहले ये बात कभी नहीं कही पर आज तुम्हे बताना चाहता हू| जब तुम्हारे करीब था तो ये पता था की तुम अच्छी लगती हो, पर तुम इतनी अच्छी लगती हो ये तुमसे दूर जाके पता चला|

पता नहीं तुम्हे मै याद भी हू या नहीं, क्योकि तुम्हारे तो और भी कई आशिक है मेरी तरह| तुम्हे पता भी नहीं होगा की तुम्हारे साथ रहते – रहते मैंने कितने सपने देखे थे| कुछ पूरे हुए, कुछ बाकी है| अब लगता है की अपने उन बाकी के सपनो को भी तुम्हारे साथ ही पूरा करू| आज तुम्हारे साथ की अपनी उन यादो को तुमसे बांटना चाहता हू|

तुम्हे याद है अपनी पहली मुलाक़ात? ना ना, वो बचपन वाली मुलाकात की बात नहीं कर रहा हू जब मै गाँव जाते समय थोड़ी देर के लिए तुम्हारे पास रुकता था| मै उस समय की बात कर रहा हू जब मैंने खिलौने और सुपरमैन के सपने देखना छोड़ कर असली जिंदगी के सपने देखने शुरू किये थे| तुम्हे कहाँ पता होगा| सपने तो मेरे थे, और मैंने कभी तुम्हे बताया तो था नहीं, पर लगता था की तुम मेरे सपनो को समझती हो|

पहली बार हम मिले थे ढंग से जब मेरी समर ट्रेनिंग शुरू हुई थी| जगह थी नेहरु प्लेस| वहाँ पर सूटेड बूटेड टाई लगाये हुए सब लोग कितने प्रोफेशनल लगते थे| उनके चेहरे से नूर टपकता था| मै भी वैसा ही दिखना चाहता था क्योकि तुम्हे उन जैसे लोग पसंद थे| ऑफिस के नीचे वो खाने के स्टाल कितने अच्छे थे न| पता है शुरू में आया था ट्रेनिंग के लिए तो घर से पैसे मिले हुए थे| रोज चिकन बिरयानी खाता था, फिर धीरे – २ छोले चावल पर आ गया| जब महीना खत्म होने लगा तो सोचता था की आज बॉस के साथ ही क्लाइंट के पास जाऊ ताकि खाना हम साथ खाए और मेरे पैसे बच जाये| घर से कितना मांगता| शर्म आती थी| तुम हो तो अन्तर्यामी| मैंने ये बात तुम्हे कभी नहीं बताई, पर तुम्हे मेरी हालत का अंदाजा तारीख बढ़ने के साथ हो जाता था| मेरे इस हालात पर तुम मजाक उड़ाने के अंदाज़ में मुस्कुरा देती थी और फिर से उन्ही टिप टॉप लोगो के पास चली जाती थी| थी तो तुम भी बड़ी चालू टाइप की| दूसरे महीने में जब ट्रेनिंग के पैसे मिले तो तुमने फिर से मुझसे अच्छे से पेश आना शुरू कर दिया| कहते है दिल्ली दिल वालो कि है पर तुम्हे तो पैसे वाले पसंद थे|

खैर जो भी था, मजा बड़ा आता था उन दिनों में| ट्रेनिंग के इन दो महीनो में रोज तुम्हे देखना, और हर रोज तुम एक नए अंदाज़ में दिखती थी| ट्रेनिंग खत्म होते होते तुम्हारे लिए दिल में एक जगह तो बन गयी थी| तुम्हारे साथ रहने की तमन्ना जागने लगी| ट्रेनिंग में मैंने अच्छा काम किया था तो मेरे बॉस ने मुझे कहा कि जब एम्.बी.ए. खत्म हो जाये तो हमें ज्वाइन कर लेना| कितना खुश था मै उस दिन| मै अपने बैच का पहला बच्चा था जिसे प्री प्लेसमेंट मिल गयी थी, लेकिन खुश होने कि सिर्फ यही वजह नहीं थी| एक और वजह थी और वो वजह थी तुम| मै तो चाहता ही था कि फिर तुम्हारे पास ही आ जाऊ और देखो मौका भी मिल गया| और एक बात बताऊँ, तुम्हे पाने की खातिर ही मैंने इतनी मेहनत की थी|

जब मैं नौकरी ज्वाइन करने आया तो मुझे कहा गया कि जयपुर में नया ऑफिस खुला है तुम वही ज्वाइन कर लो और फिर तुम्हारा तो घर भी वही है| मैंने कहा what the F***. बॉस मुझे जयपुर नहीं जाना| मुझे यही नौकरी करनी है, उसके लिए| मैंने बहुत कहा पर बॉस ने नहीं सुनी और मै eSys Technology का सेल्स ऑफिसर बन के जयपुर पहुच गया| पर अपनी किस्मत में फिर मिलना लिखा था| एक महीने बाद ही मुझे दैनिक जागरण में नॉएडा में नौकरी मिल गयी और मै खुश हो गया कि फिर से मै तुम्हारे साथ रहूँगा, तुम्हारे आस-पास रहूँगा|

तुम्हे याद है कि उस समय मुझे प्रोविडेंट फंड के पैसे काट के 8800 रुपये मिलते थे जो की जयपुर में मिलने वाली तनख्वाह से कम थे पर तब भी मै खुश था क्योकि तुम्हारे पास था| हम सात कॉलेज के दोस्त एक ही घर में रहते थे इसलिए खर्च कम होता था| तुमने भी हमारा उस समय बड़ा साथ दिया था, इसीलिए और अच्छी लगने लगी थी| लेकिन एक ही साल में जो तुमने रंग दिखाए वो अजीब थे| तुम्हे पता था कि हम सातो लड़के तुम्हे चाहने लगे है और तुमने हम सब के साथ खेलना शुरू कर दिया| फिर से तुम्हारा प्यार हमसे ज्यादा हमारी सेलेरी से हो गया था| हम सब को तुमने अलग अलग समझाया की तुम सिर्फ उसी की हो| हम सब जो एक साथ पढ़ के निकले, कई साल साथ रहे, उन सबके मन में तुमने एक दूसरे के लिए प्रतिस्पर्धा कि भावना भर दी| जब मैंने जागरण छोड़ कर नयी नौकरी शुरू कि तो तुमने सबको अलग अलग चुपके से कहा कि देखो वो आगे निकल रहा है| अगर तुम मुझे चाहते हो तो तुम भी आगे बढ़ो| और एक रेस शुरू हो गयी| कोई भी दिखाता नहीं था, पर अंदर ही अंदर सब दौड़ कर जीतने की कोशिश में लगे हुए| अपनों से जीतना चाहते थे| उन सबको जलाने के लिए तुमने भी मुझसे करीबी ज्यादा दिखानी शुरू कर दी|

कुछ महीनो में  मैं, सिद्धार्थ और बिधान नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहरों में चले गए| बाकि सब दिल्ली में ही रह गए, घर अलग हो गए सबके| सबके पास मोबाइल फोन है, एक दूसरे का नंबर भी है पर एक दूसरे से महीनो में बात नहीं करते| कभी करते भी है तो यही कि मै कितना आगे निकल रहा हू| कितना बड़ा आदमी बन गया हू या बनने वाला हू| सब के सब आगे निकलने की दौड़ में इतने व्यस्त थे की मेरी शादी में आना भी भूल गए| उन सबका मंथ एंड चल रहा था और सबको टारगेट पूरे करने थे| ये सब तुम्हारी वजह से हुआ|.

लेकिन हमेशा ऐसा नहीं हुआ| तुम्हे क्षितिज, विकास, रूपेश, पियूष, मनोज, चन्दन, गौतम याद है? नहीं!! अरे तुमने ही तो मिलवाया था मुझे इन सबसे| तुम तो मिलवा के चल पड़ी पर हमारी वो दोस्ती आज भी बरकरार है| कोशिश तो तुमने हमारी दोस्ती तुडवाने कि भी पूरी कि थी| एक ही जगह पर एक ही पोस्ट के लिए तुमने हम सबका इंटरव्यू करवाया था| तुम्हे यकीन भी था कि ये दोस्ती टूट जायेगी क्योकि जब इसी प्रोफेशनल दुनिया में कॉलेज के समय कि दोस्ती में फर्क आ गया तो हमारी तो जान पहचान ही प्रोफेशनली हुई थी| हम तो रेस लगा ही लेंगे| यही चाहती थी न तुम? लेकिन बता दू की हम सब आज भी दोस्त है और हमारे रिश्तों में आज भी वही गर्माहट बरकरार है| जानती हो क्यों? क्योकि तुमने हमें जो भी अलग – २ बताया था वो हमने एक दुसरे से छिपाया नहीं| इस वजह से हमारी आपस की समझ बढ़ गयी और दोस्ती बरकरार रह गयी| और हां सब मेरी शादी में भी आये थे| इनको मंथ एंड से ज्यादा दोस्त की शादी जरूरी थी| जब भी दिल्ली जाता हू हम सब ये निश्चित करते है की चाहे थोड़ी देर के ही सही हम मिले जरूर| हमने रेस नहीं लगाई बल्कि एक दूसरे का हाथ पकड़ कर दौड़ पड़े, ताकि हम सब एक साथ आगे बढे और कोई गिरने लगे तो उसे संभाल ले|

तुमने मुझसे खुन्नस भी निकाली थी एक बार, याद है? जागरण के बाद जब नयी नौकरी शुरू की थी तब मैंने पहली बार अपनी कमाई की मोटरसाइकिल खरीदी थी| पापा ने कहा की हीरो होंडा लो, या बजाज की मोटर साइकिल लो, अच्छा एवरेज देगी| पर मै तो तुम्हारे नशे में था| तुम्हे तो स्टाइलिश मोटरसाइकिल वाले पसंद थे| तुम्हारी पसंद के कारण मैंने यूनिकॉर्न खरीदी, मेरे बजट से बाहर थी फिर भी| 150 सीसी, मोनो-शोकर, जापानी इंजीनियरिंग.. तुम्हारे सामने कितना इतराया था न मै उस मोटरसाइकिल पर बैठ कर| मैंने कोशिश की अब मेरी स्पीड तुम्हारे हर आशिक से तेज हो| इसी लिए 80-90 की स्पीड पर भागता था| पर तुम्हे मेरा इतना तेज भागना भी पसंद नहीं आया ना| कह देती, पर जो किया मेरे साथ वो तो न करती| याद है अकबर रोड.. जहाँ पर मै सबको पीछे छोड़ता हुआ 95 की स्पीड पर जा रहा था, ताकि तुम्हे पकड़ सकू| तुम्हे पकड़ने की इसी दौड़ में सड़क पर स्लिप हो गया| जिंदगी में पहली बार मैंने अपनी घुटने की हड्डी देखी थी| पूरा मांस उतर गया था और तुम्हे मुझ पर कोई दया नहीं आई| उलटे तुमने मुझे इशारे में बता दिया था की मेरे पीछे भागे तो यही हाल होगा| उस टाइम दर्द बहुत हुआ था और आराम करने के लिए छुट्टी भी ली| पर तुमने मुझे ऐसा दीवाना बना रखा था की सिर्फ 1 दिन तुम्हे नहीं देखा तो बैचैनी होने लगी और तुम्हे देखने के लिए मै टूटी फूटी हालत में ही ऑफिस के लिए निकल गया था|

लेकिन अब लगता है अच्छा या बुरा जो भी किया तुमने मेरे साथ, वो सब ठीक ही था| अगर तुम उस समय हर चीज में मेरा साथ देने लगती तो शायद मै कई चीजों से वाकिफ ही नहीं हो पाता| जो कुछ सीखा, वो सीख नहीं पाता| तुम्हारे साथ रहने के अनुभव ने ही मुझे सिखाया कि जो सुनो और देखो उस पर यकीन एकदम से मत करो| पहले उसे समझो और फिर जो करना है करो| वो बीमा कंपनी वाले कहते हैं ना की “read the offer documents carefully” बिलकुल वैसे ही|

खैर ये सब छोड़ो. जो भी था जैसा भी था, एक रिश्ता तो बन गया था तुमसे| सच कहू तो प्यार हो गया था तुमसे| अभी भी मुझे तुम्हारा इन्तेज़ार हैं| एक बार मुझे बुलाओगी तो दौड़ा चला आऊंगा हमेशा के लिए| बुला के तो देखो| और हां, जल्दी बुला लो, वर्ना एक और तुम्हारी सौतन बनने को तैयार हैं और मुझे भी वो बहुत पसंद हैं| और तुम्हारी इस सौतन ने मेरे साथ वो सब नहीं किया जो तुमने किया| इसने सब कुछ अच्छा अच्छा ही किया है अब तक, ऐसा न हो की मै तुम्हे भूल कर इसका हो जाऊँ|

तुमने जवाब नहीं दिया… क्या चाहती हो? अब क्या आई लव यू बोलू, तब मानोगी? ठीक है तो सुनो.. आज मै चिल्ला चिल्ला कर कह रहा हू की मुझे तुम पसंद हो, और मुझे तुमसे प्यार है| Yes I love you.. I love You Delhi.. हां दिल्ली मुझे तुमसे प्यार है और मेरा दिल तुम्हारे लिए धड़कता है|

अपनी सौतन का नाम सुनना चाहती हो न?? तो सुनो वो है चंडीगढ़. अब या तो तुम मुझे बुला लो या फिर मै इसका हो जाऊंगा|

एक अधूरी प्रेम कहानी…

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14 thoughts on “एक अधूरी प्रेम कहानी…

  1. Wah Kya Baat hai Naveen…. Awesome and interesting… Now you on the same path of Chetan Bhagat…. Gud…. Keep it Up…. I promise I will buy your first novel or Stories book from you at the Releasing Ceremony… ya… It will happens in year 2014 @ J W Marriot Hotel, Chandigarh… @ 7pm. I will be there and meet all your Professional Friendz there… Gud Luck… Waiting for nxt post…
    🙂

  2. amazing sir,, realllyyy reallly mindblowing……
    very very very intersting….loved itz end…sir do write book now…..cheerz….

  3. dilli hain dil waloo ki
    sautan ko suhagan na bann ne dena hahhaa
    very very very intersting….loved itz end

  4. Awesome and interesting…
    frist i felt that u were talking about some girl but its really good and Now you on the same path of Chetan Bhagat……….. Keep it Up……..

  5. Hum. . . Interstin one. . .bt frnds dont compare Mr.Naveen wid Chetan Bhagat.both r distinct prsnality havin diffrnt writin style.here i think Mr.Naveen s bettr bcoz he s more articulate n able to write n ny topic.so pls. .

  6. haha…too good :)..main poori story mein ladki ki shakal imagine karti rahi..aur yeh sochti rahi ki bhabhi ka kya expression raha hoga yeh pad kar..:D

  7. Seriously… Mai sirf Apki wife ke reaction ke baare soch rhi thi… ki Ager unhone pda hothaa tho wo kaise react kerti.. Too good End..

  8. very nice story.i really like it..becaz it is writting in very simple words..just..we talk…normally.
    keep it up naveen

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