कहते हैं न कि ‘जहाँ पैर पड़े संतन के, वहीँ बंटा-धार”. मेरा और बैंगलोर का ऐसा ही रिश्ता है. जब भी यहाँ आया तब या तो शहर में कांड हुआ या मेरी लाइफ में. हाँ इन दोनों तरह के कांड ने बहुत कुछ सिखाया और जिन्दगी भी बदल दी.

Banaras assi ghat

तो अब इस भूमिका से समझ ही गए होगे कि ये कावेरी कोई लड़की नहीं, वो नदी है जिसके पीछे कर्नाटक और तमिलनाडु वैसे ही पिले पड़े हैं जैसे कॉलेज की सबसे खूबसूरत लड़की के पीछे 2 बलिष्ठ. और ये फोटो सिर्फ उकसा के क्लिक करवाने को लगाई है, इसका इस पोस्ट से कोई लेना देना नहीं.

अभी बैंगलोर में शिफ्टिंग हो रहा हूँ आंशिक तौर पे. पिछले हफ्ते शनिवार को जब आया तो यहाँ माहौल कावेरी नदी के पानी को लेकर तनाव में था. सोमवार को बेटे का एडमिशन कराने गया और उसे स्कूल छोड़ आया. उसकी बस के आने के टाइम पर बताये हुए स्टॉप पर पहुँच गया पर बस नहीं आई. कॉल किया तो पता चला कि कावेरी मसले पर माहौल काफी गर्म हो चुका है इसलिए बस रास्ता बदल के आ रही है. ट्विटर देखा तो पता लगा कि फिर कुछ बवाल हुआ, कुछ जगह तो हिंसा भी हुई. मेरे सामने की सड़क पर ट्रैफिक अचानक बहुत बढ़ गया. हर कोई ऑफिस से निकल के घर भागने की जल्दी में था. बच्चे की बस लेट होती गयी और अंततः बच्चा बिचारा भूखा-प्यासा 5 बजे घर पहुंचा. शहर नया, कोई दोस्त नहीं और बस में अकेला था. पहुंचा तो बहुत उदास था, भूखा भी था. उसे बहलाने को सामने ही डोमिनोस पर ले गया.

जितनी देर में आर्डर आया तब तक 2002 की घटनाये जेहन में ताज़ा हो गयी. 2002 से मेरा मतलब गुजरात से कतई नहीं है. देश में 2002 में और भी बहुत कुछ हुआ था और उन्हीं में से एक छोटा सा संस्मरण ये भी है. कावेरी को पता नहीं मुझसे क्या दुश्मनी है कि उसके लफड़े में मेरा बच्चा आज फंसा रहा और आज से कई साल पहले इस नदी के विवाद के चलते मैं फंसा था पर एक अनोखा अनुभव ले उठा जिंदगी का.

एयरफोर्स से ग्राउंड ड्यूटी ऑफिसर के लिए इंटरव्यू कॉल आई थी. मैसूर में इंटरव्यू होना था. रिजर्वेशन कराया, दिल्ली से ट्रेन में बैठा, बैंगलोर पहुँच गया. यहाँ से आगे का रास्ता 3 घंटे का था और रिजर्वेशन नहीं था. पता किया तो एक ट्रेन दिन में 2.30 बजे पर और एक 4.30 बजे थी. बैंगलोर 2 बजे पहुंचा था, भूख लगी थी. 4.30 बजे वाली ट्रेन की टिकट ली और खाना कहने गया. उस टाइम नहीं पता था कि जो 2 घंटे का मैंने बफर लिया है ये  आने वाले 4 दिन मेरी लाइफ में क्या उथल-पुथल मचाने वाला है.

4 बजे ट्रेन आई और मैं बैठ गया. तकरीबन 5 – 5.15 बजे के आस-पास ट्रेन रुक गयी और काफी देर रुकी रही. ट्रेन के अगल बगल में भीड़ बढ़ रही थी, शायद लोकल थे. ट्रेन में बैठे लोगों के चेहरे पर परेशानी बढ़ रही थी. वो क्या कह रहे थे मैं समझा नहीं पर कुछ तो गड़बड़ थी. लोकल लोगों ने हमें ट्रेन से उतारना शुरू कर दिया. बाहर निकले तो थोड़ी पुलिस थी और बहुत सारी भीड़. कुछ लोग ट्रेन के एक डब्बे में आग लगाने को लोग उतारू हो रखे थे जिन्हें पुलिस ने धर रखा था. कुल-मिलाकर मैं ये समझ पाया कि कुछ कावेरी के पानी का मुद्दा है जिसपर लोग भड़के हैं. एक लड़का मिला टूटी-फूटी हिंदी अंग्रेजी बोलने वाला. उससे पूछा तो बोला पास में रामनगर होना, उधर जाना, वहां से मैसूर को बस लेना. मैं उसके साथ ही जुगाड़ करके रामनगर पहुंचा पर वहां पता चला कि कोई बस शहर से बाहर नहीं जा रही. दंगे के आसार हैं. रास्ते बंद हैं.

उन्हें मैसूर का रास्ता बंद दिख रहा था और मुझे अपने सरकारी नौकरी के करियर का. यही तो जगह थी जहाँ आरक्षण न था. सिलेक्शन न होता तो अपनी गैर काबिलियत से न हो, वजह रिज़र्व सीटें तो न होती. खैर, फौज का इंटरव्यू देने आये तो हिम्मत कैसे हारता. इधर उधर पता किया और एक टैक्सी वाला राजी हुआ ले जाने को. उसने 1500 रुपये मांगे. मैंने गिने तो मेरे पास कुछ 1200 थे. मैंने काफी रिक्वेस्ट की और टैक्सी वाला मान गया. उसने 400 रुपये मुझसे लेके डीजल भराया और हम चल पड़े.

कुछ किलोमीटर चले तो हमें रोक दिया गया. हाईवे बंद था. ड्राईवर को रास्ते पता थे और वो गाँव में से होकर निकालने लगा. अँधेरा बढ़ रहा था और मेरा डर भी क्योंकि गाँव के रास्ते में बहुत से लोगों ने टैक्सी रोकी और मुझसे कुछ-कुछ पूछा जिसका जवाब ड्राईवर दे रहा था. पर इस बार 8-10 के झुण्ड ने हमें रोक लिया और आगे ही न बढ़ने दे. जैसे ही उन्हें पता लगा कि गाड़ी में कोई नॉन-कन्नड़ है तो मुझे गाड़ी से उतार लिया. ड्राईवर ने कुछ समझाया बुझाया और कुछ देर की बहसबाजी के बाद मुझसे कहा कि सर इनको कुछ पैसे दे दो, ये जाने देगा तभी. मैंने पैसे देने को निकाले तो इन लोगों ने मेरा बटुआ ही ले लिया हाथ से. मैं झगड़ने को हुआ और वो लोग भी. ड्राईवर ने फिर बीच-बचाव किया और मुझे गाड़ी में बिठाया, उन लोगों से हाथ जोड़कर उसने शायद मेरी तरफ से माफ़ी मांगी.

गाड़ी चली तो ड्राईवर मुझे बोला – सॉरी सर, हमारे इदर लोग ऐसा नई करता पर ये सब दारु पिया और मौके का फायदा उठाता.

मैंने ड्राईवर से कहा – “वो तो ठीक है भैया पर मेरे पास जो था इन्होने ले लिया. बाकी के पैसे देने को नहीं हैं मेरे पास. पहली बार आपके स्टेट आया और क्या-क्या हो गया.” मैं काफी रुआंसा हो उठा था.

ड्राईवर ने पूछा – “कोई पैसा नहीं आपके पास?”

मैं लगभग चीख सा पड़ा – “स्टूडेंट हूँ भैया, इतने ही लेके आया था. ये थोड़ी सोचा था कि आपके स्टेट में ये सब होता हैं.”

ड्राईवर ने गाड़ी रोक ली. कुछ सेकंड सोचा और बोला – “परवाह नहीं साहब. मेरे लोगों ने आपके साथ ऐसा किया, आई ऍम सॉरी. मैं आपको मैसूर पहुचायेगा. डीजल है गाड़ी में, और पैसा नहीं मांगता पर हमारे यहाँ का लोग इतना बुरा नहीं ये यकीन करना.”

ड्राईवर ने वादे के मुताबिक मैसूर स्टेशन पहुंचा दिया. पहुंचते-पहुँचते रात के 12.30 बज चुके थे क्योंकि ये गाँव वाली समस्या कई जगह थी और ड्राईवर मुझे बचा के इधर-उधर से लाया. अब समस्या थी रात गुजारने की. खाने का तो कोई स्कोप था ही नहीं, क्योंकि मेरे पास पैसे न थे. मैं प्लेटफार्म पर पहुंचा तो सब सुनसान. एक बेंच पर बैठा कि पुलिस वाला आ गया. उसने बैठने से मना किया और जाने को कहा. अब कहाँ जाऊं?

एयरफोर्स वाले लेने के लिए सुबह 7 बजे ट्रक भेजने वाले थे और सभी कैंडिडेट्स को स्टेशन पर इकठ्ठा होने को कहा था. मैंने पुलिस वाले को हालात समझाए तो बोला डारमेट्री में सो जाओ पर प्लेटफार्म में परमिशन नहीं.

डारमेट्री वाले ने कहा – “वन बेड,सिक्सटी रुपीज.”

“नहीं है पैसे”

जवाब आया – “गुड नाईट सर. नो बेड”

बाहर जा नहीं सकता, अन्दर ये रुकने नहीं देगा. सोचते हुए माथे पर पसीने आ गये. मैंने रुमाल निकाला तो देखा एक कागज़ है और सिक्का. याद आया कि खाने के बाद खुल्ले पैसे मैंने बटुए की जगह जेब में रख लिए. आप यकीन मानिये मुझे ऐसी ख़ुशी हुई जैसे वो ईमेल पर आने वाली 5 लाख पौंड की लाटरी मैंने सच में जीत ली. पर ख़ुशी टिकी नहीं क्योंकि  जेब में एक 50 का नोट और २ रुँपये का सिक्का था. 8 रुपये कम थे. मैंने फिर मिन्नत की पर वो नहीं माना. एक दो लोग किचकिचाये कि पैसा नहीं तो जाओ रे, सोने दो हमें. एक लड़का गेट के पास वाले बेड पर सोया था, उठा और मुझे पूछा – “एयरफोर्स इंटरव्यू?” मैंने हाँ में सर हिलाया.

“How much you need?”

“Just Rs. 10”

उसने डारमेट्री वाले को 10 का नोट पकड़ाया और मुझे बोला – “You pay the rest.” उसका शुक्रिया करके मैं सो गया.


नहीं, कहानी यहाँ ख़त्म नहीं हुई. अगले 3 दिन और भी चुनौती भरे थे. कावेरी का एक ही आशिक थोड़ी है कर्नाटक. दूसरे आशिक तमिलनाडु की एंट्री बाकी थी और उसे भी हमसे ही खुन्नस निकालनी थी. पढ़िए Part 2 ये जानने को कि तमिलनाडु कैसे पहुंचा और वो कौन सा पर्सनल कांड हुआ जिसने लाइफ बदल दी.

 

मैं और कावेरी – Part 1

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