ऐसी वैसी औरत: Short stories by Ankita Jain

 

aisi wasi aurat
ऐसी वैसी औरत

अंकिता जैन की किताब का टाइटल अपने आप में बताने को काफी है कि इस किताब में क्या मिलेगा. हमेशा की तरह मैं इस बार भी लेट हूँ और किताब आने के लगभग डेढ़ साल बाद उसे पढ़ के उसके बारे में लिख रहा हूँ वो भी तब जब अंकिता जैन की दूसरी किताब ‘मैं से माँ तक’ भी आ चुकी है. 

हमारे यहाँ फ़िल्में प्रायः सुखांत की तरफ जाती है पर जिन्दगी में हमेशा सुखांत नहीं होते, कभी परिस्थितियां विवश कर देती है तो कभी किस्मत. लेकिन कोई कोई उन सब से लड़कर अपने लिए एक सुखांत भी खोज लेता है. हमारा समाज औरतों के प्रति कई प्रकार के पूर्वाग्रह और दुराग्रह से ग्रसित है और ये किताब औरतों की उन्हीं कहानियों को सामने लाती है. औरतों के जीवन के कई हिस्से, मन की भावनाएं या तो हमें दिखती नहीं और दिखी तो हम उन्हें अपने हिसाब से ढाल लेते हैं और यहीं से एक औरत समाज के लिए ऐसी वैसी औरत बन जाती है.

10 कहानियों वाली इस किताब के बारे में किसी ने अमेजन पर कमेंट किया था कि हर पुरुष को इस किताब को पढना चाहिए और उसका ये कमेन्ट पहली ही कहानी मालिन भौजी में सही साबित होता है. अकेली रह रही मालिन भौजी का किरायेदार उनके गुम हो जाने पर पुलिस को ये नहीं बताना चाहता कि वकील साहब कभी-कभी उनसे मिलने आते थे क्योंकि उसे डर था कि पुलिस इसका अर्थ गलत निकालेगी लेकिन कहीं न कहीं वो खुद, उसे छोड़िये, पाठक के रूप में मैं ये अंदाजा लगाने लगा था कि मालिन भौजी वकील साहब के साथ भाग गयी होगी. दरअसल हुआ क्या ये जानने के लिए आप किताब पढ़ें, लेकिन इस एक कहानी के जरिये अंकिता ने उस सोच पर बड़ी नरमाई से ऐसा करारा वार किया है कि हम अपनी सोच को बदलने को विवश होते हैं.

जैसा मैंने कहा कि असल जिंदगी में हर कहानी का सुखांत नहीं होता वैसा ही इस किताब में भी है और प्लेटफार्म नंबर 2 और छोड़ी हुई औरत जैसी कहानियां डिस्टर्ब करती है. कहीं पर ये हमारे समाज के सोच पर सवाल खड़ा करती हैं तो कहीं पर ये जताती है कि परिस्थितियां हमें मजबूर कर देती हैं जहाँ हम देख कर कुछ नहीं नहीं देखते या अनदेखा कर देते हैं. प्लेटफार्म नंबर 2 की पात्र हममें से हर किसी की आँखों के आगे से रोज गुजरती है, कभी प्लेटफार्म पर, कभी ट्रेन में तो कभी रेड लाइट पर गाड़ियों के शीशे ठकठका कुछ मांगते हुए. उनको हम देखते हैं पर सोचते नहीं, कुछ हैं जो उनके लिए सोचते भी हैं पर कुछ कर सकते नहीं. कुछ पल के लिए उनको देखा और निकल गए. कभी उनकी कहानी किसी किताब में या दुर्घटना की अख़बार में पढ़ते है तो ओहो बोल आगे बढ़ जाते हैं. हम कुछ नहीं कर सकते और ये हमारे समाज का फेलियर है.

जब दुखांत है तो सुखांत भी है और दोनों में फर्क ये है कि सुखांत परिस्थितिजन्य कम होते है और उसके लिए हौसला और सोच बहुत मायने रखती है. काकू अपने सत्तरवें साल में वो उड़ान भरती हैं जो उन्हें बहुत पहले भर लेनी चाहिए थी. परिस्थिति, बच्चे, समाज की सोचते-सोचते काकू की जिंदगी के सत्तर साल गुजर गए पर जिस दिन उन्होंने अपनी उड़ान भरने की सोची, पढ़ते हुए मैं मन ही मन निश्चिन्त हो गया था. मालिन भौजी को भी जब देर से ही सही पर सही निर्णय लेते देखा तो मेरे मन में जो मैल आया था थोड़ी देर के लिए वो धुल गया.

एक कहानी ‘एक रात की बात’ का जिक्र और करना चाहूँगा जहाँ पर हर पात्र कहानी की मुख्य पात्र के प्रति एक अच्छी सोच रखे हुए है, सजग है, सहृदय है पर कहीं न कहीं उसकी अपंगता के चलते ये भूल जा रहा है कि वो एक औरत भी है, वही औरत जो भावनाओं का ज्वार अपने अन्दर समेटे रहती है. मैं इस कहानी को पढ़ते हुए सही या गलत का फैसला नहीं कर पाया और करना भी नहीं चाहता. हर चीज को सही-गलत या ब्लैक & व्हाइट में मापना नामुमकिन है.

कहानियां और भी है पर सब मैं बता दूंगा तो आप पढेंगे क्या? इस किताब को आपको जरूर पढना चाहिए और कई कारणों से. सबसे पहली की भाषा सरल है, बेवजह साहित्यिक बनाने की कोशिश नहीं की गयी है जो मेरे लिए बहुत जरूरी है. मुझे सिम्पल भाषा समझ में आती है. कहानियां छोटी है और 10-11 पेज में ख़त्म हो जाती है जिससे रूचि बनी रहती है और एक के बाद दूसरी आप बिना ब्रेक लिए पढ़ते जा सकते हैं. सबसे जरूरी और अच्छी बात कि इस कहानियों को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे अंकिता ने इन सभी पात्रों के साथ सफ़र किया है उनकी जिंदगी में और जो देखा, जो समझा वो हुबहू उतार दिया. इमोशंस को बिना कोई मसाला लगाये सादी भाषा में भी इतनी खूबसूरती से परोसा है कि आपको हर कहानी में अलग स्वाद आता है और पता ही नहीं चलता कि कब उनका स्वाद लेते हुए आप पूरी किताब चट कर गए, मतलब पढ़ गए. वो कमेन्ट दुहराना चाहूँगा कि हर पुरुष को ये किताब पढनी चाहिए और हर औरत से कहना चाहूँगा कि आपको तो मिस बिलकुल नहीं करनी चाहिए, क्योंकि किसी ऐसी वैसी औरत के मन की असली बात को आपसे बेहतर और कौन समझेगा. ये किताब अभी हाल ही में दैनिक जागरण नीलसन की बेस्टसेलर लिस्ट के टॉप 10 में जगह बना चुकी है. पढने की एक वजह ये भी हो सकती है. खरीदना चाहें तो अमेजन का लिंक ये रहा – https://amzn.to/2T8lpbc

ऐसी वैसी औरत

Post navigation


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *