वो कुछ दिन वर्किंग मम्मा के

 

मेमसाब ने नया प्रोजेक्ट शुरू किया है और उसके लिए उनको 10 दिन के लिए ग्वालियर जाना था| बड़ी चिंतित थी की कैसे होगा? एक तो पहला प्रोजेक्ट इसलिए चिंता और दूसरा छोटा सा बच्चा कैसे रहेगा इतने दिन| मुझसे तो संभलेगा नहीं| पर चिंता एक तरफ और काम एक तरफ, करना तो था ही| एक आसान तरीका था की इसे जयपुर में दादी के पास छोड़ दें| मम्मी ने भी कहा मेरे पास छोड़ दे, तू कैसे संभालेगा? मैंने कहा – अरे हो जायेगा, क्यों चिंता करते हो? बीवी ने समझाया मार्च का महीना है, आप पर काम का प्रेशर काफी है, अक्सर लेट आते हो, कैसे करोगे? पर हम मर्दों की जात आसानी से मानती तो हैं नहीं|  बीवी ने सुझाव दिया – अच्छा एक काम करते हैं मैं अपनी मम्मी को कहती हूँ वो कुछ दिन यहाँ आ जाएँ| सुनते ही हमें लगा की भैया क्या मजाक लगा रखा है, हमारा बेटा है, हम न संभाल पाएंगे तो कौन संभालेगा? और जब हमने अपनी मम्मी को नहीं दिया सँभालने को तो तुम्हारी मम्मी को कैसे दें? तो हमने चेलेंज लेकर तय कर दिया की मैडम जाएँगी और हम बच्चे को संभालेंगे और अपना दफ्तर भी|

उन्होंने आर्यादित्य को पहले से ही समझाना शुरू कर दिया था की मम्मी को जाना है इसलिए आपको पापा के साथ ही रहना पड़ेगा थोड़े दिन| वो बच्चे को मानसिक रूप से तैयार कर रही थी और मैं खुद को, की अब 10 दिन मम्मी पापा तुम्ही हो, पापा तक तो ठीक है पर अब 10 दिन वर्किंग मम्मी हो| वैसे भी जब ओखली में सर डाल दिया तो मूसल से क्या डरना|

पहला दिन

सुबह 6 बजे की ट्रेन थी| इनकी सहेली इनको पिक करने 5 बजे आ गयी| आर्यादित्य सो रहा था, मैं नीचे तक सामान छोड़ने गया| जैसे ही नीचे पहुंचा छोटे साहब के रोने की आवाज आई, शायद हमने दरवाजा जोर से बंद किया था, उससे उठ गया| मैं दौड़ा ऊपर, देखा तो बाहर वाले कमरे में आकर खिड़की से नीचे झाँक रहा है और रो रहा है| मैंने गोद में उठाया, दरवाजा खोला, बालकनी में ले गया उसे और कहा मम्मी को बाय बोलो, वो जा रही है| उसने धीरे से बाय किया| रोना बंद हो गया, जैसे ही गाड़ी निकली, मेरे को गले से पकड़ कर चिपक गया| वो मानसिक रूप से तैयार था की मम्मी जायेगी| हम दोनों वापस अपने बेड पर आये और सो गए|

7 बजे उठे, चाय बनाई, इसको दूध पिलाया, नाश्ता सुबह सुबह ही मैडम बना के गयी थी तो कोई चिंता नहीं थी| दूध का ग्लास लेकर साहब बेड पर बैठ गए| माँ तो जैसे तैसे हड़का के प्यार से दूध का ग्लास खत्म करवाती पर मेरे साथ तो साहब को मस्ती सूझ रही थी| इसी मस्ती में दूध का ग्लास बिस्तर पर गिर गया| साहब ने डर कर मेरी तरफ देखा, मैंने कहा कोई बात नहीं| बस इतना कहना था की इनकी जान में जान आई और कहते है की पापा मम्मी तो हैं नहीं तो उनको पता नहीं चलेगा, आप बताना मत और चुपचाप ये चद्दर बदल दो|

इसी तरह रोज की दिनचर्या शुरू| दूध पीता, स्कूल जाता, मैं ऑफिस से शाम 5 – 5.30 तक निकल जाता ताकि इसके डे -केयर 6 – 6.30 तक पहुँच जाऊं| शाम को इसे लेकर आते टाइम मैं कभी मोमो, तो कभी चिकन कबाब, कभी अंडा भुजिया पैक करवा लेता ताकि इसे डिनर से पहले कुछ हल्का फुल्का खिला दूँ| साहब को बड़ा मजा आता क्योंकि ये सब रूटीन का हिस्सा तो थे नहीं| डिनर के टाइम भी नखरा करता की बस इतना ही खाऊंगा तो मैं भी जिद न करता क्योंकि शाम को स्नेक्स दबा के खिला देता था| मम्मी के राज में तो स्कूल से आते ही कुछ न कुछ खाना होता और दूध पीना होता| एक दिन बोले की मैं दाल चावल नहीं खाऊंगा, कुछ और खिलाओ, फिर इनको बाहर डिनर कराने ले गया| कुल मिलाके सब सही था, शाम को स्नेक्स, फिर वो होमवर्क करे और मैं ऑफिस का काम फिर डिनर, उसके बाद हम दोनों टीवी देखते, थोडा बहुत मोबाइल/लेपटॉप पर खेलते और सो जाते|

दो दिन बड़े मजे में गुजरे, तीसरा दिन शनिवार था, और बिचारी माँ से रहा नहीं गया और वो शाम को वापस आ गयी| आई तो बेटा खुश| पर माँ तो माँ थी आते ही शुरू, दूध पियो, दाल रोटी खाओ, सब्जी खाओ| बच्चे ने शाम निकाली| पर सुबह होते होते पूछता है – मम्मी आप तो बहुत दिन में आने वाले थे न| मम्मी बोली – हाँ, पर आपसे मिलने आ गयी, कल सुबह वापस जाउंगी| बेटा बिचारा जो दूध, दाल, सब्जी से त्रस्त था, तुरंत कहता है की आप को जल्दी नहीं आना था न| आप आज ही चले जाओ| हँसी मजाक में दिन गुजरा, अगले दिन सुबह मैडम फिर ग्वालियर निकल गयीं|

पांचवां दिन

इयरली क्लोजिंग नजदीक थी, काम का प्रेशर बढ़ रहा था और अगले फाइनेंशियल इयर की प्लानिंग भी करनी थी| मैं और बॉस एक दूसरे के साथ पूरा पूरा दिन बिताते थे इस चक्कर में| अगर कोई महिला बॉस होती और इतना समय रोज साथ गुजारते तो शायद इश्क हो जाता, खैर ये तो पुरुष बॉस थे| काम करते करते ध्यान ही नहीं रहा 6.15 बज गए, अचानक याद आया की बेटे को लेने जाना है, डे केयर 7 बजे बंद होना था और इधर हमारा काम खतम ही नहीं हुआ था| मैं कुछ कहूँ तब तक बॉस ने ही पूछ लिया की बेटे को नहीं लेने जाना? बोले जाओ पर पर रिपोर्ट रात तक मेल कर देना|

डे केयर पहुँचते पहुँचते 7.30 बज गए थे| सब बच्चे जा चुके थे, मेरा बेटा एक कुर्सी पर अपना बैग कंधे पर टाँगे हुए और मुंह लटकाए रूआसा सा बैठा हुआ था| उसे लेकर चला तो रस्ते में शिकायत शुरू, आप लेने ही नहीं आये थे, मैं तो रोने लगा था, मैं तो बोर हो गया था| घर पहुंचे तो मैंने उसे कहा की अभी पापा को काम है तो आप अपना होमवर्क खतम करो, और मैं काम खतम करता हूँ| बच्चा खेलने के मूड में था, मैंने कहा होमवर्क करो फिर मोबाइल दूँगा गेम खेलने को|

मैं काम में जुट गया, लोगो से फोन पर बात करके उनकी रिपोर्ट्स मंगायी, समझी, अपनी रिपोर्ट बनायीं, बीच बीच में बेटा उछल कूद मचाता रहा, उसे धमकाया, पुचकारा, होमवर्क हो गया, तो मोबाइल दिया की खेलो| काम कर रहा था की बेटे सुबकने की आवाज आने लगी| मैंने पूछा की क्या हुआ तो बोला मम्मी की याद आ रही है| मैंने गले लगाया कहा की मम्मी आने वाली है, रोओ मत| पर वो चुप ही न हो| इसे चुप कराते कराते मुझे भूख सी लगने लगी| घड़ी देखी तो 10.15 हो रहे थे रात के| भूख का ख्याल आते ही मेरा दिमाग झन्ना गया की हे भगवन ये मैंने क्या किया| डे केयर से लौटते टाइम मैं रोज की तरह कुछ स्नेक्स लेकर नहीं आया| घर आते ही उसे काम पर लगा दिया और खाने को कुछ दिया ही नहीं| बच्चा भूखा है इतनी देर से| मैंने पूछा – भूख लगी है? सर हिलाया और बोला – बहुत जोर से| फटाफट उसके लिए खाना पैक करा के लाया, पर तब तक ये अर्धनिद्रा में आ गया, जैसे तैसे थोडा बहुत खिलाया| मैंने कहा की मम्मी को मत बताना की पापा खाना खिलाना भूल गए थे, फट से कहता है ठीक है पर आप मुझे रोज दूध मत पिलाना और चिकन लाके देना|

इस घटना से मुझे इतनी ग्लानि हुई कि तय कर लिया बस 4 दिन और बचे है बिलकुल भी गलती नहीं होगी| सुबह 5.45 – 6.00 बजे तक उठ जाता, फ्रेश होता, अपने लिए चाय बनाता, अखबार पढता| फिर बेटे के लिए दूध गरम करने को रख देता| जितनी देर में दूध गरम हो, उतनी देर में उसे उठाता| उसे उठाना भी अपने आप में जंग से कम न था, पर मेरे पास भी तरकीब थी| मैं 2-3 बार उसे उठाता, फिर उसके बगल में मोबाइल पर बाइक रेस खेलने लगता, उसकी आवाज़ सुनते ही वो ऐसे उठता जैसे करंट लगा हो| फिर एक गेम खेलता और उसकी नींद फुर्र..

उसे टूथब्रश पकड़ाता, और किचन में जाके दूध को पीने लायक ठंडा होने को छोड़ देता| फिर वापस आकर इसको ढंग से ब्रश कराता, पोट्टी कराता| उसके बाद मनुहार करके दूध पिलाता| ये सब करते करते 8 बज जाते, 8.30 बजे इसकी स्कूल वेन आ जाती थी, तब तक तैयार भी कराना है| अब नहाने के लिए नखरे, नहलाओ, फिर तैयार करो| तैयार होने में इसके काफी ड्रामे है| प्ले स्कूल है तो कोई ड्रेस तो थी नहीं, तो साहब को कोई शर्ट पसंद नहीं आती तो कोई पेंट, कभी जूते पसंद नहीं आते|और ये सब नापसंदी का इजहार तब होता जब पहन लेता, अब फिर से चेंज कराओ| नीचे आकार वेन होर्न बजाती रहती, तब जाकर ये मानता और जाता| वेन वाला भी जबरदस्त था, जिस दिन मैं इसे 8.15 तक तैयार कर देता वो आता ही 8.45 था, और जिस दिन देर हुई उस दिन टाइम से 5 मिनट पहले|

खैर इनके जाने के बाद, अपने जाने की तैयारी होती, नाश्ता बनता, सारे दरवाजे जाने से पहले चेक किये जाते, गैस  सिलिंडर चेक होता, बाथरूम के नल, गीजर सब कुछ चेक किये जाते कि बंद हैं या नहीं| ऐसा करते करते मैं 9.15 तक ही निकल पाता था| वापस आने का तय कर लिया 5.15 के बाद एक मिनट भी ऑफिस में नहीं रुकुंगा| इसे लेकर आता, स्नेक्स पैक करवाता, घर आकर इसको खिलाता, फिर होमवर्क कराता| फिर थोड़ी देर इसके साथ खेल कर 8.30 तक डिनर कराता| डिनर के बाद इसे फिर मस्ती करनी होती थी, मस्ती करते करते 9.30 – 10  तक ये सो जाता| इसके बाद मैं अपने ऑफिस का काम शुरू करता जो 11-11.30 तक खतम होता| फिर अगली सुबह 5.30 बजे से वही दिनचर्या| ओह, बताना भूल गया, आधी रात को सूसू कराने को भी तो उठाना होता था|

3 दिन में ही मुझे लगने लगा की शरीर की सारी ताकत किसी ने निचोड़ ली, शनिवार को पुष्पा को आना था और शनिवार था की आ ही नहीं रहा था| बेटे को भी शुरू में तो मजा आया, पर माँ तो माँ होती है, डांटे, फटकारे, चाहे जबर्दस्ती दाल सब्जी खिलाये, बच्चे को जो स्नेह वो दे सकती है वो बाप नहीं दे सकता| वो भी शनिवार के इंतज़ार में था|

दिन फिरे, शनिवार भी आया, मेरी होममेकर और बेटे की माँ वापस आई| ऐसा लगा की जान में जान आ गयी है|  चेलेंज तो लिया था, जैसे तैसे पूरा भी किया पर जिस तरीके से बीवी घर को संभालती है, उस तरह संभालना असंभव था| 8 दिनों तक बच्चे को सँभालने और दफ्तर सँभालने के बाद जो मेरी हालत हुई उसके बाद से मुझे समझ नहीं पा रहा हूँ की किस आधार पर हम स्त्री को ‘वीकर सेक्स’ कहते है| जो काम सिर्फ 8 दिन करके मैं इतना थक गया, वो सब काम, वो सब जिम्मेदारियां वो रोज उठाती है, साल के 365 दिन उठाती है| मैं सलाम करता हूँ इस जज्बे और ताकत को जिससे वो न सिर्फ अपना घर संभालती है, अगर कामकाजी है तो दफ्तर भी संभालती है और सबसे बड़ी बात हम जैसे माँ के बिगड़े हुए बेटों को संभालती है और साथ ही हम से जुड़े सारे रिश्तों को|

ज्ञान बहुत हुआ, मोरल ऑफ द स्टोरी है की भैया घर संभालना, बच्चे को संभालना आसान नहीं, जोश में आकर कोई ऐसा चेलेंज मत लेना| जरूरत पड़े तो बच्चे को दादी या नानी के पास छोड़ देना|

वो कुछ दिन वर्किंग मम्मा के

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