April 11, 2011 | In: Being Father

जग सूना सूना लागे

Written by Naveen Choudhary on April 11, 2011 – 3:03 pm -

जग सूना सूना लागे

 

पिछला हफ्ता बहुत व्यस्त रहा| वित्त वर्ष खत्म हुआ और शुरू हो गया आंकड़ो की चीर फाड़ का काम| पूरा दिन थकान भरा हुआ| सुबह ९ बजे से लगो, शाम तक लगे रहो| अगर बिल गेट्स ने एक्सेल शीट न बनाई होती तो न जाने क्या होता? खैर बिल गेट्स को छोड़ कर मुद्दे पर आते है| इस तरह से काम पहले भी कई बार होता रहा है पर इस बार घर आने के बाद थकान ज्यादा लगने लगी थी| ख्याल आया की एक महीने पहले ही जो उम्र का एक और साल बीत गया है कही उसका असर तो नहीं?

लेकिन नहीं, ये उम्र का असर नहीं है| ये असर मेरे जोश की दवा के दादा दादी के पास जाने है| हाँ जी, आर्यादित्य की दादी सीढियों से गिर गयी और आर्यादित्य उनका ध्यान रखने अपनी माँ के साथ जयपुर चले गए है|

जैसे जैसे वो बड़ा हो रहा है चीजे समझना लगा है और हर बात पर रिएक्शन भी देता है| ऑफिस से घर आने के बाद वोही तो है जो मेरी थकान को मीठी बातो से उड़ा देता है| घर पहुँच कर डोर बेल बजाता और अंदर से आवाज आती – “कौन ऐ” और जवाब भी खुद ही देता| माँ पापा आ गिया (गए)| अब उसका हाथ दरवाजे की कुण्डी तक पहुचता है और वो दरवाजा खुद ही खोल देता है| कई बार मैं उसे चिढाने के लिए बेल बजा के ऊपर वाले फ्लोर की सीढियों में छुप जाता और वो बाहर आकर बोलता – “पापा कहाँ गिया??” लेकिन ऐसा नहीं की वो बुद्दू बना होता था, वो भी खेल रहा होता था| एक दो बार “पापा कहाँ गिया” करने के बाद खुद ही सीढियां चढनी शुरू कर देता और फिर मुझे लेकर नीचे आता|

कमरे के अंदर आकर जैसे ही मैं दरवाजा बंद करने लगता वो मुझे याद दिलाता की मैं सीढियों की लाइट जली छोड़ आया हू| तुरंत हुक्म करता पापा लैत (लाइट) बंद क्क दो| उसके हुक्म की तामील करके जब अंदर आता तो अगला हुक्म होता हॉल का पंखा चलाने का – पापा “पक्का ऑन कर दो”| हुक्म सिर्फ मेरे लिए नहीं होते थे| जैसे ही मैं बैग रखता अगला हुक्म अपनी माँ को देता – मम्मा, पापा चाय कर दो| अभी बना दो शब्द को ठीक से पकड़ नहीं पाया है इसलिए हर चीज उसके लिए “कर दो” होती है|

इतने हुक्म के बाद अगला नंबर सेवा का होता| मुझसे पूछता पापा ईबी (टीवी) ऑन कर दूँ? ऐसा नहीं की मैं कहता की नहीं बेटा मत करो, तो ईबी यानि टीवी ऑन नहीं होता| टीवी तो ऑन होगा ही चाहे मेरा जवाब कुछ भी हो| इसके बाद शुरू होती उनकी फरमाइश| एक दो चैनल बदलने के बाद जब समझ नहीं आता तो रिमोट मेरे हाथ में पकड़ा कर फिर से हुक्म होता की पापा छिया (शीला) कर दो| शीला की जवानी गाना बड़ा पसंद है इन्हें| लेकिन जब से वर्ल्ड कप के मैच देखे है इनकी मांग बदल गयी है| अब मांग होती है की पापा हाउज देट कर दो| इसी सबके बीच में मेरी चाय बन के आ चुकी होती और साथ में इनके लिए दूध| बस यहाँ से लुका छिपी का खेल शुरू होता| पुष्पा दूध की बोतल लिए इसके पीछे पीछे भागती और ये कभी मेरे पीछे छुपता कभी दुसरे कमरे में| जब कुछ न होता तो एक चद्दर लेकर मेरे पास दौड़ा आता और उसे सर पर ओढ़ लेता और मुझे भी कहता पापा आ जाओ| और बीच हॉल में हम दोनों चादर ओढ़ कर पुष्पा से छिपे होते| मैं रात को लैपटॉप लेकर बैठता हू तो छेड़खानी शुरू कर देता और मेरे गुस्सा होने पर छोटा वाला नेटबुक लेकर खुद भी बैठ जाता था| working-on-laptop

इसी खेल के साथ कब रात गहरी हो जाती थी पता ही नहीं चलता था और थकान.. वो तो ऐसे गायब होती थी नवरत्न ठन्डे ठन्डे कूल तेल की मालिश की जरूरत ही नहीं होती|

वही घर है, शाम आता हूँ, सीढियों की लाइट अक्सर जली रह जाती है| टीवी पिछले एक हफ्ते से ऑन नहीं हुआ है| घर आकर खाना खाना, थोड़ी देर फेसबुक देखना और फिर सो जाना| आज ऑफिस भी नहीं गया, दिन में सोया पर थकान वैसी की वैसी ही है| पर इस थकान की जिंदगी थोड़ी छोटी रह गयी है, सिर्फ कल सुबह तक| कल सुबह मेरी थकान की दवा वापस आ रही है|

कल फिर से घर में घुसते ही पंखा ऑन होगा, चाय बनेगीं, टीवी ऑन होगा और काफी सारी हँसी गूँजेगी|

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