एक साल जिंदगी के

 

एक साल कैसे गुजरा पता ही नहीं. मेरी याद में मेरी जिंदगी का ये पहला ऐसा साल था जो इतनी तेजी से गुजर गया. अभी कुछ दिनों पहले की ही बात लगती है जब आर्यादित्य हमारी जिंदगी में आया था. पर वो कुछ दिन गिनती में 365 थे.  आज वो एक साल का है.  

जब आपकी अपनी संतान होती है तो उससे मोह तो होना स्वाभाविक है. लेकिन ये मोह वक़्त के साथ बढ़ता है ये मैंने अब जाना. मेरे लिए मेरा भांजा हर्षादित्य भी बेटे से कम नहीं.. जब आर्यादित्य हुआ तब भी मेरा मोह हर्षादित्य के लिए ही ज्यादा था. मैंने सुना था, देखा था की अपनी संतान होने के बाद लोग भांजे/भतीजो पर कम ध्यान देने लगते है. मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ.. हर्षादित्य (आदि) मेरे लिए उसी तरह रहा. हां मुझे आर्यादित्य (चीनू) के लिए उस तरह की फीलिंग्स आ ही नहीं रही थी जैसी आदि के लिए थी. मुझे इस बात की ख़ुशी तो थी की मै अपने भांजे के लिए नहीं बदला, पर साथ में ये ख्याल भी आता था की मुझे अपने बेटे से इतना मोह क्यों नहीं हो पा रहा.

मै जब चंडीगढ़ आने के बाद भी घर फ़ोन किया करता था तो चीनू के लिए बस पूछ लेता था की क्या है, कैसा है? पर इस पूछने में इतनी चिंता नहीं होती थी जितनी आदि के लिए पूछने में होती थी.     

चीनू जनवरी 2009 में हुआ. मार्च में मै उसे चंडीगढ़ ले आया था. उसके बाद शुरू हुआ सिलसिला रोज बढ़ते हुए  बच्चे को देखने का. जब वो आया तो सीधा लेटा रहता था, कोई खिलौना दिखाओ तो देखता था और कभी-२ मुस्कुराता था. 3-4 महीने बीतते हुए उसने उन चीजो को पकड़ने की कोशिश शुरू की. करवट लेने लगा और करवट लेकर फिर सीधा नहीं हो पाने की वजह से रोता था.

सीधा होने की कोशिश में ही उसने खिसकना भी शुरू किया. ये सब चीजे इतनी जल्दी होती लगी की पता ही नहीं चला 4 महीने निकल गए.

एक दिन सुबह मै बाथरूम में शेविंग कर रहा था और पुष्पा रसोई में. अचानक धडाम से कुछ गिरने की आवाज आई और 3 सेकंड के बाद चीनू के रोने की. हम दोनों कमरे की तरफ भागे और देखते है की करवट बदलने वाला ये बच्चा खिसकता हुआ बिस्तर से नीचे पड़ा हुआ था. इस दिन के बाद हम सतर्क तो रहने लगे और बेड के किनारों पर तकिया रख देते. लेकिन ये लड़का खिसकते-2 घुटने देने लगा और फिर २-३ बार तकिया रुपी माउन्ट एवेरेस्ट को पार कर जमीन पर आ गिरा. इन सबसे बचने के लिए मैंने सुबह ऑफिस के लिए कमरे में ही तैयार होना शुरू कर दिया ताकि उसको देखता रहू. यहाँ मैंने देखा कैसे इन बच्चो की समझ बढती है और ये भी अनुभव से सीखते है.  अब चीनू खिसकता हुआ आगे तो बढ़ता था पर बिस्तर के किनारे पर आकर रुक जाता और चादर को कस कर पकड़ लेता. एकाध बार फिसला लेकिन चादर पकडे होने से लटका रह गया, गिरा नहीं.

8 – 9 महीने का होते होते तो वो बड़ा चंचल हो उठा. अब वो अपनी माँ के अलावा मुझे भी ठीक से पहचानने लगा. और मेरे ऑफिस से वापिस आते ही उसकी खिलखिलाहट देखने वाली होती थी. पास जाते ही अपने दोनों हाथ उठा देता की गोदी में लो. गोद में आने के बाद चेहरा दरवाजे की तरफ घूम जाता. मै उसे लेकर दरवाजे की तरफ बढ़ता तो वो पलट कर अपनी माँ को देखता और एक चिढाने वाली मुस्कान देता. उस दौरान उसकी माँ कितने ही प्रलोभन दे, मजाल की वो चला जाये उसके पास. इसी तरह हर रोज एक नयी हरकत उसकी दिनचर्या में जुड़ने लगी. एक दिन उसने मेरी ऊँगली पकड़ के अपने मुह में लेकर दबा दिया. कुछ चुभा और मैंने झटके से अपनी ऊँगली बाहर खींची. देखा तो नीचे की तरफ एक छोटा सा बिलकुल राजू के दांतों की तरह (डाबर लाल दन्त मंजन वाला) मोती जैसा चमकता दांत दिखा. चलो अब अपना बेटा और बड़ा हुआ.

अब मै जब भी खाना खाने बैठता हु वो मेरे पास आ जाता है और मै छोटे-२ रोटी के टुकड़े दाल में अच्छी तरह डुबो के उसको खिलाता हु. अगर देना भूल जाऊ तो हुंकार  मार के याद दिला देता है. तीखे का इतना शौकीन की पूछो मत. इतना छोटा बच्चा मैंने तीखा खाते नहीं देखा. अब वो अपने पैरो पर खड़ा होने लगा है और सहारे के साथ चलता भी है.

पिछले हफ्ते वो अपनी नानी के घर 15 – 20 दिन के लिए चला गया है. और मै उसे याद करते हुए उसकी फोटो / विडियो मोबाइल / लैपटॉप पर देखता रहता हु. अब मुझे उसके लिए भी उतनी ही चिंता और बेचैनी होती है जितनी आदि के लिए.  मैंने शुरू में जिस भावनात्मक जुडाव के कम होने की बात की थी वो अब कितना बढ़ गया है बता नहीं सकता. पिछले 5 दिन से यही सोच रहा हु की आज क्या कर रहा होगा. अभी कैसी हरकते कर रहा होगा. यही सीखा की जैसे जैसे हम अपने बच्चे को अपने सामने बढ़ते देखते और परवरिश करते है उतना ही लगाव बढ़ता जाता है. जब आज एक साल और 7 दिन में मै उसके लिए इतना बेचैन हु तो सोचता हु मेरे माता पिता मुझे कितना याद करते होंगे जिन्होंने 31 साल तक मुझे रोज बढ़ते देखा और परवरिश की.  

आज अपने माता पिता के लिए इज्जत मन में और बढ़ गयी है. अब लगता है की अगर खुदा को ढूंढना है तो अपने माता पिता में ढूंढो, कहा मंदिर मस्जिद, गिरजे में जाते हो.

 

एक साल जिंदगी के..

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4 thoughts on “एक साल जिंदगी के..

  1. nicely written…but why zindagi and din ke spellings are wrong..n in shudh hindi feelings means bhawnayen..:)))))))
    Well done!!

  2. bahut accha likha hai Naveen…first few years of a baby’s life are very interesting..every day u notice something new…very memorable yrs..very happy birthday to Aaryaditya..:)

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