March 3, 2010 | In: Being Father
चंडीगढ़ वाले पापा
Written by Naveen Choudhary on March 3, 2010 – 9:11 am -चंडीगढ़ वाले पापा
पिछले कुछ दिन बड़े ही दुखदायी थे| एक तो मै महीने भर से अपने बेटे से जुदा था, ऊपर से ज़नाब मुझे भूल गए| उसके पहले जन्मदिन पर मै उसे जयपुर छोड़ कर आया था, उसके बाद वो अपनी नानी के घर चला गया| 1 महीने के लिए उसे छोड़ना यु तो मुश्किल था लेकिन जरूरी भी था| एक तो वो पिछले एक साल में सिर्फ एक बार अपनी नानी के घर गया था| दूसरा ये थोडा अजीब सा बच्चा है| ये लोगो के पास नहीं जाता, दूर से देख कर मुस्कुराता रहता है, आवाज भी देता है पर अगर आप उसे गोदी में लेने की कोशिश करे या छुए तो रोने लगेगा| हम दोनों के अलावा थोड़ी देर के लिए गोद में लेने की इजाजत वो सिर्फ ४ लोगो को देता है, मेरी छोटी बहन, मेरा भांजा, अनुराग भटेजा और सफ़दर |
मै चाहता था की कुछ दिन लोगो के बीच रहेगा तो ठीक रहेगा वर्ना चंडीगढ़ में तो हम दोनों ही उसे दिखते है| मुझे क्या पता था की मै मुसीबत मोल ले रहा हू | अब जब वो एक महीने के बाद वापस आ रहा था तो मुझे यही डर था की कही मुझे ही न भूल गया हो| मै एअरपोर्ट पर जब उन्हें लेने पंहुचा तो दूर से उसे देखा माँ की गोद में | वो कुतूहल भरी निगाहों से चारो तरफ देख रहा था, बाल बड़े हो गए है | पहले की तरह गंजुराम नहीं रहा, लेकिन बड़ा कमजोर लग रहा था|
जब वो लोग गेट पर पहुचे तो उसने मुझे गौर से देखा, २ सेकंड के बाद मुस्कुराया| मैंने हाथ आगे बढ़ाया तो गोद में भी आ गया | वजन सच में कम हो गया था | मैंने बीवी को ताना भी मारा की लगता है नानी ने खाने को नहीं दिया मेरे बेटे को | खैर मै इस बात पर खुश था इस भुल्ल्कड़ को मै याद हू | लेकिन ये खुशी केवल 128 सेकंड तक कायम रही| उसे याद आया की वो किसी और की गोद में है और रोता हुआ अपनी माँ के पास वापस चला गया|
घर पहुचे| मैंने पुराने तरीके अपनाने शुरू किये जिनसे वो खेलता था|सबसे पहले अपना मोबाईल उसके हाथ में दिया| जब तक वो यहाँ था मेरे मोबाइल को मेरे हाथ में रहने नहीं देता था. अगर घंटी बजे या मेसेज आये तो वो एह एह करके मुझे बताता था. मेरे मोबाइल को उसने हथोड़ा समझ रखा था, उससे टेबल पर मारता, नीचे गिरा देता, यहाँ तक मोबाइल की स्क्रीन तोड़ दी. अब वही मोबाइल से वो खेलने को राजी नहीं है. देखना ही नहीं है उसे इधर| मन कर रहा था की उसे कहू की बेटा तोड़ दे स्क्रीन फिर से पर खेल तो सही|
गाना चला देने पर वो झूमने लगता था, मोबाइल को हाथ में लेकर हिलता रहता था, अब वो सब भी कुछ नहीं| मै जब गाता था तो बड़े अच्छे से मुझे सुना करता था और मुस्कुराता था पर अब उसे संगीत भी आकर्षित नहीं कर रहा है. 
मै एमबीए हू और मेरी बीवी इंजिनियर तो बेटा भी टेक्नीकल है. उसे मेरी नेटबुक से भी बड़ा लगाव था. मै नेटबुक खोलता और वो कीबोर्ड पर हाथ चलने लगता. मै उससे बचने के लिए नेटबुक को ऊपर उठा देता तो वो भी मेरे ऊपर चढ कर उसे पकड़ने की कोशिश करता|
इस बार ये तरकीब भी काम न आई. उसने नेटबुक को अनदेखा कर दिया|
घर जाने से पहले उसने एक नया खेल शुरू किया था, हम दोनों में जो भी खड़ा रहता उसकी गोद में चला जाता और टाटा करना शुरू कर देता| मेरे साथ वो रोज सुबह दूध लेने जाता, ऑफिस जाते समय मेरे साथ कार में बैठ कर थोड़ी आगे तक जाता और अपनी माँ को चिढाता | मैंने कोशिश की उसे कार में बिठाने की पर रोने लगा| उसे टाटा किया, बाहर ले जाना चाहा पर वो टस से मस होने को राजी नहीं| टाटा करना भी भूल गया. इतने सारे शब्द बोलने लगा था सब भूल गया है भुल्ल्कड़ राम| एकदम सुस्त पद रहता है.
मेरे भांजे हर्षादित्य को तो बाल खींच कर परेशान कर देता था, पर इस बार उसके पास भी नहीं जा रहा था|
उसे पटाने के लिए मैंने क्या नहीं किया पिछले ३ दिनों में| इतनीं मेहनत तो कभी किसी लड़की के पीछे भी नहीं करी मैंने| मुझे इतना गुस्सा आ रहा है खुद पर की मैंने उसे इतने दिनों के लिए जाने ही क्यों दिया|
घर पर सब कह रहे थे की चंडीगढ़ जाके पहचानने लगेगा| आज सुबह ही चंडीगढ़ पंहुचा हू| पहला परिवर्तन तो ये देखा की कार में बैठ कर म्यूजिक सिस्टम को उसने पहले की ही तरह छेड़ना शुरू कर दिया| घर पहुचे तो मैंने गोद में आने को कहा तो आ गया और अपनी माँ को टाटा भी किया| पहले की तरह नीचे दूध लेने के लिए ले गया तो चला गया पर थोड़ी देर में रोने लगा| चलो पहले से कुछ बेहतर है, कम से कम गया तो सही| और टाटा करना याद आ गया है| सब सही कह रहे थे चंडीगढ़ जाके ठीक हो जायेगा.
अब मुझे समझ नहीं आ रहा है की चंडीगढ़ में ही मुझे पहचानेगा तो कैसे चलेगा| जयपुर जाके भूल जाता है, वहा पर उसकी माँ ही हरदम सामने रहनी चाहिए. डर है की कुछ टाइम के बाद मुझे चंडीगढ़ वाले पापा के नाम से न बुलाना शुरू कर दे, क्युकी जयपुर जाके तो सिर्फ इसकी माँ इसे याद रहती है…



5 Responses to चंडीगढ़ वाले पापा
Deepika
March 3rd, 2010 at 4:15 pm
hmmmmmmmmmmmmmm he l b use 2…..to u within few dayzz no worries chd waale papa
safdar
March 3rd, 2010 at 5:13 pm
wah ji wah….. kya baat hai… badi hi badiya satya katha likhi hai… par ab toh mujhe bhi dar lag raha hai k ARYADITYA apne chachu ko pehchanega ya nahi…????? hmmmmmm…. even i missed u BUDDHURAM….!!!!
Jitu
March 3rd, 2010 at 6:18 pm
LOL! Naveenji!!
Chinta na karein. Woh aapko bhoola nahin hai. Na TATA karna bhoola hai. ISs umr mein bachon kaa attention span kam hota hai. Toh JAb woh nayi cheezein seekhtein hain… ya naye logon se mitein hain… to puraanin cheezein aur logon ko backseat le na padta hai.
Khoon kaa rishta agar bhulaana mahinein bhar kii baat hoti… to aaj har koi harr kisi ko bhula chuka hota.
One small suggestion coming from experience.
Don’t try to make him remember things. Naye sire se uss se naataa jodiye. Kaam jaldi banega.
:D:D:D:D:D
You cannot make him rember things… cause they have no memory at this age. But you can make friendship with him anew. He’ll respond faster… Cause they can feel love and always will.
माँ | Naveen Choudhary
July 7th, 2010 at 6:36 pm
[...] अब फिर से मुझे पहचानने लगा है| अब मैं चंडीगढ़ वाले पापा से वापस परमानेन्ट पापा बन गया [...]
Parveen Jaggi
August 22nd, 2010 at 8:54 am
So touching….
Never go thru this phase of life coz m always present with my son and my Sasuraal is local so never wants to see this like situation…. But its very touching story and always applied on tiny families where both parents r working and out of their home town and grandparents…
My gud wishes are always with u and congrats that now he recoganized you easily…. be happy and be cheerful… Stay fit with your family…. Jaggi