September 15, 2010 | In: Being Father

Creche

Written by Naveen Choudhary on September 15, 2010 – 9:31 am -

क्रेच

 

पहले का समय कितना अच्छा था जब माँ बाप अपना सारा समय बच्चे के लिए लगा देते थे और अब हम लोग भौतिक होते जा रहे है और किसी ना किसी बहाने से अपने बच्चो को अपने से दूर धकेल देते है|

हमने भी आर्यादित्य के साथ यही किया| हमने उसे क्रेच में भेजना शुरू किया| बहाने कई थे| सबसे पहले हमें लगता है की आजकल की महंगाई में बच्चों को अच्छा पढाने और अच्छा लाइफस्टाइल देने के लिए एक आदमी की कमाई बहुत नहीं है| पुष्पा इलेक्ट्रोनिक्स इंजिनियर है और L&T, Mysore में अच्छे प्रोफाइल पर नौकरी कर रही थी| जब आर्यादित्य का जन्म होने वाला था तो उसने छुट्टियाँ ले ली, पर उसी दौरान मेरी पोस्टिंग चंडीगढ़ में हो गयी और वो जयपुर में ही रह गयी| आर्यादित्य के होने के बाद साथ रहने के लिए वो नौकरी छोड़ कर चंडीगढ़ आ गयी| अब जब आर्यादित्य डेढ़ साल से ज्यादा का हो गया है तो हमें लगा है की फिर से नौकरी शुरू कर लेनी चाहिए वर्ना इस पढ़ाई का क्या फायदा| उसने तय किया की वो एक इंस्टीट्यूट में पढ़ाएगी| इसके लिए हमने आर्यादित्य को क्रेच में छोड़ने का सोचा|

उसे क्रेच में छोडना बहुत बड़ी समस्या थी| वो ऐसा बच्चा है जो हम दो के अलावा किसी के पास जाता ही नहीं तो सवाल ये था की वो क्रेच में रहेगा कैसे? फिर भी हम उसे पहले दिन छोड़ कर आये| छोड़ते ही उसने रोना शुरू किया और ऐसा रोया की हमें उसकी आवाज़ 200 मीटर दूर तक सुनाई देती रही| मन तो वही भारी हो गया| एक बार मन किया की पुष्पा को कहू की छोड़ ये सब, उसे घर में ही रहने दे| शाम को उसे लेने गए तो पता चला की लगातार 2.5 घंटे तक रोता रहा वो| गला बैठ गया था उसका रोते रोते| दूसरे दिन से उसे छोड़ने की जिम्मेदारी अकेले मुझ पर आ गयी क्योकि उसकी माँ से उसका रोना नहीं देखा जाता था| रोज सुबह आर्यादित्य जब मुझे तैयार होते देखता तो मेरे इर्द गिर्द घूमने लगता था और मेरे साथ गाड़ी में बैठ कर एक चक्कर लगाता था| अब वही बेटा मुझे तैयार होते देख कर इधर उधर छुपता फिरता था की ये फिर मुझे छोड़ आएगा| उसका बाप हीरो से विलेन बन गया था उसके लिए| गाड़ी में बिठाता तो वो सीट पर बैठने की जगह मेरी गोद में उल्टा बैठ कर चिपक जाता था| स्टीरिंग पर भी हाथ मार कर कोशिश करता की गाड़ी को घुमा दे| दिल ऐसा रोता था की क्या कहू, पर उसकी माँ ने तो मुझे ही उसके लिए निष्ठुर बाप बनाने की सोच ली थी|

शाम को जब उसे लेने जाओ तो ऐसा चिपक जाता था की आपका रोने का मन हो जाये| खैर पुष्पा का इंस्टिट्यूट वाला प्लान कैंसल हो गया| हमने सोचा की अब उसे क्रेच नहीं भेजेंगे|

वो ज्यादा कुछ बोलता भी नहीं था| जब से क्रेच जाने लगा था हमने देखा की कुछ शब्द अस्पष्ट से बडबडाने लगा है| एक दो दिन उसे चुप चाप क्रेच में जाकर भी देखा तो पाया की थोड़ी देर रोने के बाद वो वहाँ के बच्चों में मिक्स हो जाता था| उनके बीच में दादा की तरह अकड के घूमता रहता था| उनको इशारों से कुछ कुछ आदेश देता रहता है और बच्चे भी उसके पीछे घुमते रहते थे| हमें लगा की शायद ये उसके लिए यहाँ आते रहना बेहतर है और फिर एक बहाना मिल गया उसे क्रेच भेजने का|

मुझे अभी तक उसका ये व्यवहार समझ नहीं आया| रोज जाते हुए रोता था पर वहाँ छोड़ने के बाद मस्ती करता था| पता नहीं ये अपनी मजबूरी के कारण एडजस्ट कर रहा था, या उसे हमारे बाद ये सब लोग भी अच्छे लगने लगे थे|

 

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3 Responses to Creche

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safdar

September 15th, 2010 at 10:26 am

BAAP HAI YA KASAI….. title change karo sir….

good 1…. nicely composed…..

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Neetu

September 15th, 2010 at 10:44 am

Hi Naveen,
How touching…n almost every Kid’s story. But even though its soo common, we cant see our own child going through the phase of “Seperation anxiety” – spcly Moms. If u ask me – I sat outside Aarush’s class for a week..he cried n cried n he knew my Mom wil come n take me away. Next week I decided to leave him n to my surprise he was absolutely fine after 10min, though me at home went through a guilt of 2hrs. Looking back I feel..it was just a phase n now he loves his school, his friends & loves to interact with teachers. Kids are more adjusting then us..n be it for working or non working Moms – we have to let go our kids at some point of time..so that they grow, develop their own wings n fly independant. Infact i feel working Moms/Dads spend “Quality Time” with their Kids. So u guys are doing fine..n I am sure your son knows you are not a “Nishthur Pitaa”..watever decisions we make are usually for betterment of our Kiddos!! All the best to both of U..njoyy ur work n Family..!!

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chandan

September 15th, 2010 at 11:37 am

By no means I can truly understand the trauma Bhabhi Ji and especially u have gone in taking this step (sending Arya to Creche) but it’s only the first step to face this cut-throat competitive world.The sooner the better.

And yes, once a ‘DADA’ in childhood is always a ‘DADA’…
Cheers

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